आईआईटी छात्र मौत: परिवार ने कहा- जातिगत भेदभाव ने उसे आत्महत्या के लिए प्रेरित किया

अहमदाबाद के रहने वाले दर्शन सोलंकी की मौत बीते 12 फरवरी को आईआईटी-बॉम्बे परिसर में एक छात्रावास की इमारत की सातवीं मंजिल से कथित तौर पर छलांग लगाने से हो गई थी. वह बीटेक के पहले वर्ष का छात्र थे.

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आईआईटी-बॉम्बे परिसर. (प्रतीकात्मक फोटो साभार: फेसबुक)

अहमदाबाद के रहने वाले दर्शन सोलंकी की मौत बीते 12 फरवरी को आईआईटी-बॉम्बे परिसर में एक छात्रावास की इमारत की सातवीं मंजिल से कथित तौर पर छलांग लगाने से हो गई थी. वह बीटेक के पहले वर्ष का छात्र थे.

आईआईटी-बॉम्बे परिसर. (फोटो साभार: फेसबुक)

मुंबई: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बॉम्बे में प्रथम वर्ष के छात्र 18 वर्षीय दर्शन सोलंकी ने कथित रूप ते आत्महत्या कर लिया. उनके परिवार ने बुधवार को आरोप लगाया कि जातिगत भेदभाव ने उन्हें यह कदम उठाने के लिए प्रेरित किया.

दर्शन सोलंकी की 12 फरवरी को आईआईटी परिसर के एक छात्रावास की इमारत की सातवीं मंजिल से कथित तौर पर छलांग लगाने से मौत हो गई थी. वह अहमदाबाद के रहने वाले थे और बी.टेक (केमिकल) के पहले वर्ष के छात्र थे.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, छात्र के 47 वर्षीय पिता रमेशभाई सोलंकी ने बताया कि दर्शन ने अपनी बड़ी बहन जाह्नवी और चाची दिव्याबेन से संस्थान में होने वाले जातिगत भेदभाव के बारे में बात की थी.

उन्होंने कहा, ‘उसने कहा था कि अनुसूचित जाति के छात्रों को यहां (आईआईटी बॉम्बे) विभिन्न रूपों में जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है, उनके साथ तमाम तरह की रैगिंग होती है. हमें पढ़ाई में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. जब हम सीनियर्स से बात करते हैं तो वे ठीक से जवाब नहीं देते.’

प्लंबर का काम करने वाले और महीने में करीब 15,000 रुपये कमाने वाले रमेशभाई ने कहा, ‘यहां तक कि उसके दोस्तों ने भी उससे बात करना बंद कर दिया था, जब उन्हें पता चला कि वह अनुसूचित जाति से है.’

दर्शन ने अपने पिता से 12 फरवरी को दोपहर 12 बजकर 20 मिनट पर फोन पर बात की थी, इसके कुछ ही देर बाद बाद उन्होंने कथित तौर पर अपने छात्रावास की आठवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी. वह दोस्तों के साथ दो दिन की यात्रा के बाद घर जाने की योजना बना रहे थे.

दर्शन की बहन जाह्नवी ने कहा, ‘मरने से ठीक एक घंटे पहले दर्शन ने पापा को फोन किया था. हमारी चचेरी बहन को उसके जन्मदिन पर बधाई देने के लिए यह एक सामान्य कॉल थी. वह छुट्टी मनाने के लिए घर आने की प्लानिंग कर रहा था और इस बारे में उसने पिता से बात की थी. हम यह जानना चाहते हैं कि उस फोन कॉल के बाद क्या हुआ.’

अहमदाबाद में एमसीए कर रहीं जाह्नवी ने बताया कि दर्शन ने कैंपस में जाति-आधारित भेदभाव के बारे में उनसे बात की थी. उन्होंने कहा, ‘यह एक सामान्य बात थी कि कैसे आरक्षित सीटों पर प्रवेश पाने वाले छात्रों को साथी छात्रों द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता है. मैंने भी इसका सामना किया है.’

उन्होंने यह भी कहा कि दर्शन केवल यह जानकारी दे रहा था कि आईआईटी परिसर में इस तरह का भेदभाव मौजूद है.

उन्होंने कहा, ‘आईआईटी ओरिएंटेशन सत्र में भाग लेने के बाद दर्शन और मेरे माता-पिता को यह जानकर राहत मिली थी कि परिसर में कोई भेदभाव नहीं होता. हमें बताया गया कि सभी के साथ समान व्यवहार किया जाता है और ऐसे मंच हैं, जहां छात्र किसी समस्या का सामना करने पर संपर्क कर सकते हैं.’

रमेशभाई ने कहा कि 11 फरवरी को जब उसकी परीक्षा समाप्त हुई तो वह खुश था.

उन्होंने कहा, ‘वह दो दिनों के लिए अपने दोस्तों के साथ यात्रा पर जा रहा था. उन्होंने मेरे बड़े भाई की बेटी और उसकी चाची को भी जन्मदिन की बधाई दी और वादा किया कि वह 14 फरवरी को घर आने पर उनसे मिलने आएगा.’

उन्होंने दर्शन की यात्रा के लिए अपनी पत्नी तारिकाबेन के बैंक खाते में 3,000 रुपये जमा किए थे. रमेशभाई ने कहा, ‘दर्शन के पास एटीएम कार्ड नहीं था और उसने अपनी मां का कार्ड इस्तेमाल करता था.’

13 फरवरी की रात रमेशभाई ने दर्शन को आईआईटी से अपने साथ घर लाने की योजना बनाई थी.

उन्होंने कहा, ‘14 फरवरी को वह हमारे साथ घर पर होता. वह घर आने को लेकर बहुत उत्साहित था और कम से कम 15 दिनों के छुट्टी की उम्मीद कर रहा था.’

अहमदाबाद के मणिनगर में रहने वाले दर्शन के चाचा हरीशभाई ने कहा, ‘जब हम उत्तरायण (मकर संक्रांति) के दौरान उसे लेने गए थे तो उसने मेरी पत्नी से कहा था कि छात्र उससे पूछते हैं कि वह मुफ्त में क्यों पढ़ रहा है, जबकि उन्हें बहुत अधिक भुगतान करना पड़ता है. बड़े घर के लोगों को यह अच्छा नहीं लगता और जलन होती है कि हमारे जैसे लोग वहां फ्री में पढ़ते हैं और उन्हें महंगी फीस देनी पड़ती है.’

दर्शन आखिरी बार 14 व 15 जनवरी को उत्तरायण पर्व के लिए घर आए थे और 16 जनवरी को वापस लौट गए थे.

उनके परिवार ने कहा कि दर्शन को पढ़ाई में बहुत रुचि थी और उन्होंने कभी कोई निजी ट्यूशन नहीं की. 11वीं कक्षा में पढ़ाई छोड़ने वाले रमेशभाई ने कहा, ‘वह देर रात तक कभी-कभी भोर तक पढ़ाई करता था. वह जीवन में कुछ बड़ा हासिल करना चाहता था और अपने परिवार को गौरवान्वित करना चाहता था.’

दर्शन के चाचा गौतम परमार, जिन्होंने उनसे तब बात की थी जब वह उत्तरायण पर्व के लिए अपने घर आए थे, ने कहा, ‘परिवार से दूर रहने और मेस का खाना खाने के संघर्ष के बावजूद हमें यह जानकर खुशी हुई कि उन्हें अपने कुछ सहपाठियों से अच्छा साथ मिल रहा है.’