नीट के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार, कहा- परीक्षा संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन

राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (नीट) के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में तमिलनाडु सरकार ने कहा है कि परीक्षा ने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले और राज्य बोर्ड के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है क्योंकि नीट परीक्षा सीबीएसई/एनसीईआरटी पाठ्यक्रम पर आधारित है, जो तमिलनाडु बोर्ड द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम से काफ़ी अलग है.

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(फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमंस)

राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (नीट) के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में तमिलनाडु सरकार ने कहा है कि परीक्षा ने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले और राज्य बोर्ड के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है क्योंकि नीट परीक्षा सीबीएसई/एनसीईआरटी पाठ्यक्रम पर आधारित है, जो तमिलनाडु बोर्ड द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम से काफ़ी अलग है.

(फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमंस)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा को लेकर तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है.

द हिंदू के मुताबिक, शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में एक मुकदमा दायर करके तमिलनाडु सरकार ने कहा है कि चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए एकमात्र प्रवेश द्वार के रूप में नीट संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है, समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन और संघवाद के सिद्धांतों के लिए अभिशाप है.

संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत अधिवक्ता सबरीश सुब्रमण्यम के माध्यम से दायर मुकदमे में प्रतिवादी के रूप में भारत संघ को दोषी ठहराया है.

इसमें कहा गया है कि अदालत को ‘चिकित्सा और संबद्ध पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए नीट में प्राप्त अंकों के अनिवार्य मानदंड को भारतीय संविधान के प्रावधानों के विपरीत, संविधान की मूल संरचना के उल्लंघनकर्ता और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघनकर्ता होने के नाते मनमाने घोषित करना चाहिए.’

इसमें कहा गया है कि तमिलनाडु शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए विवश था क्योंकि नीट परीक्षा की शुरुआत और उसके जारी रहने ने तमिलनाडु में छात्रों, विशेष तौर पर ग्रामीण इलाकों के छात्रों और तमिलनाडु राज्य शिक्षा बोर्ड से संबद्ध स्कूलों के छात्रों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है.

तमिलनाडु सरकार ने 2020 के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए शीर्ष अदालत से यह घोषणा करने की मांग की कि शीर्ष अदालत का फैसला राज्य पर बाध्यकारी नहीं है क्योंकि यह तमिलनाडु में सरकारी सीटों पर प्रवेश के लिए नीट की प्रयोज्यता (Applicability) को बरकरार रखता है.

राज्य सरकार ने कहा, फैसले ने नीट को इस आधार पर बरकरार रखा था कि अनुचित अभ्यासों- उम्मीदवारों की भुगतान क्षमता के आधार पर प्रवेश देना, कैपिटेशन शुल्क वसूलना, बड़े पैमाने पर कदाचार, छात्रों का शोषण, मुनाफाखोरी, व्यावसायीकरण और प्रवेश परीक्षाएं जो अनुचित हैं, पारदर्शी नहीं हैं और शोषणकारी हैं- को रोकने के लिए इसकी जरूरत है.

राज्य ने कहा कि सरकारी सीटों पर प्रवेश के संबंध में यह तर्क खड़ा ही नहीं होता. मुकदमे में कहा गया है, ‘यह तर्क सरकारी सीटों पर लागू नहीं होता है और केवल उन निजी कॉलेजों की सीटों पर लागू होता है जहां कैपिटेशन शुल्क, शोषण, मुनाफाखोरी आदि बुराइयां व्याप्त हैं.’

मुकदमे में तर्क प्रस्तुत किया गया है, ‘नीट शुरू करना संघीय ढांचे का भी उल्लंघन है क्योंकि यह मेडिकल कॉलेजों में सरकारी सीटों पर छात्रों को प्रवेश देने संबंधी राज्यों की शक्ति को छीन लेता है. शिक्षा एक ऐसा विषय है, जिस पर कानून बनाना राज्य की क्षमता के भीतर आता है, और राज्यों को राज्य विश्वविद्यालयों के लिए शिक्षा नियंत्रित करने का अधिकार है. सभी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए नीट की शुरुआत, चाहे वे निजी हों या राज्य सरकार के या केंद्र सरकार के कॉलेज हों, संघीय ढांचे और शिक्षा के संबंध में निर्णय लेने की राज्यों की स्वायत्तता का उल्लंघन है.’

राज्य सरकार की ओर से साथ ही कहा गया, ‘नीट ने वादी राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले और राज्य बोर्ड के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की बड़ी संख्या को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है. इन छात्रों को नीट परीक्षा में बैठने के दौरान भारी नुकसान हुआ है क्योंकि नीट परीक्षा सीबीएसई/एनसीईआरटी पाठ्यक्रम पर आधारित है, जो तमिलनाडु राज्य शिक्षा बोर्ड द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम से काफी अलग है.’

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि ये छात्र कई अन्य कारकों- जैसे कि आर्थिक संसाधनों और कोचिंग कक्षाओं तक पहुंच की कमी, एक साल का ड्रॉप लेकर वापस परीक्षा देना- के चलते वंचित हैं.

मुकदमे में कहा गया है, ‘इसलिए, ये छात्र प्रतिभाशाली होने और बारहवीं कक्षा की परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने के बावजूद अधिक संसाधनों वाले शहरी और अर्द्धशहरी छात्रों के साथ समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ हैं.’

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