सरकार की नई फैक्ट-चेक इकाई में दो ‘विशेषज्ञ’ और दो सरकारी प्रतिनिधि होंगे: रिपोर्ट

इस महीने की शुरुआत में अधिसूचित नए आईटी नियम कहते हैं कि सरकारी फैक्ट-चेक इकाई द्वारा ‘फ़र्ज़ी या भ्रामक’ क़रार दी गई सामग्री को गूगल, फेसबुक, ट्विटर आदि सोशल मीडिया कंपनियों और इंटरनेट सेवा प्रदाता को हटाना ही होगा. इन नियमों को सेंसरशिप बताते हुए इनकी व्यापक आलोचना की गई है.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: फेसबुक/White Oak Cremation)

इस महीने की शुरुआत में अधिसूचित नए आईटी नियम कहते हैं कि सरकारी फैक्ट-चेक इकाई द्वारा ‘फ़र्ज़ी या भ्रामक’ क़रार दी गई सामग्री को गूगल, फेसबुक, ट्विटर आदि सोशल मीडिया कंपनियों और इंटरनेट सेवा प्रदाता को हटाना ही होगा. इन नियमों को सेंसरशिप बताते हुए इनकी व्यापक आलोचना की गई है.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: फेसबुक/White Oak Cremation)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार के संशोधित आईटी नियमों के तहत सभी ऑनलाइन सामग्री की स्क्रीनिंग करने वाली ‘फैक्ट-चेक इकाई’ में सरकार के दो प्रतिनिधि और सरकार द्वारा नियुक्त दो विशेषज्ञ होंगे.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि इकाई में मीडिया विशेषज्ञ और कानूनी विशेषज्ञ के साथ केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और सांख्यिकी मंत्रालय के दो प्रतिनिधि भी शामिल होंगे.

एक अनाम वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने इस अख़बार को बताया कि इकाई को अन्य मंत्रालयों के नामित नोडल अधिकारी भी देखेंगे.

बताया गया है कि सरकार इस इकाई को 10 दिनों में औपचारिक रूप सेअधिसूचित कर सकती है.

उल्लेखनीय है कि बीते 6 अप्रैल को अधिसूचित नए आईटी नियमों में कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को एक फैक्ट-चेक इकाई का गठन करने का अधिकार होगा, जो केंद्र सरकार के किसी भी काम के संबंध में फर्जी, झूठी या भ्रामक खबर का पता लगाएगा.

इकाई के पास सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, इंटरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) और अन्य सेवा प्रदाताओं सहित मध्यस्थों को निर्देश जारी करने का अधिकार होगा कि वे ऐसी सामग्री को हटा दें. गूगल, फेसबुक, ट्विटर आदि कंपनियां सरकारी फैक्ट-चेक इकाई द्वारा ‘फर्जी या भ्रामक’ करार दी गई सामग्री इंटरनेट से हटाने को बाध्य होंगी.

नए आईटी नियमों की विपक्ष, मीडिया संगठनों समेत इंटरनेट अधिकारों को लेकर काम करने वाले लोगों ने भी आलोचना की है.

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी इस नियमों को ‘सेंसरशिप के समान’ बताते हुए कहा था कि इनका देश में प्रेस की स्वतंत्रता पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी ने भी सरकार के हाथ में किसी सामग्री को ‘फर्जी’ ठहराने की व्यापक और मनमानी शक्ति देने की बात कहते हुए इन नियमों को वापस लेने का आग्रह किया है.

वहीं, डिजिटल अधिकार समूह इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) ने कहा था कि इन संशोधित नियमों की अधिसूचना ‘बोलने और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को प्रभावित करेगी’, विशेष रूप से समाचार प्रकाशक, पत्रकार, कार्यकर्ता और अन्य प्रभावित होंगे.

बता दें कि इसी सप्ताह स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने केंद्र से इस बारे में हफ्तेभर में जवाब मांगा है कि क्या कोई तथ्यात्मक पृष्ठभूमि या तर्क है जिसके कारण इस संशोधन की आवश्यकता पड़ी है.

कामरा ने अपनी याचिका में कहा कि यह नए आईटी नियम उनके कंटेंट को मनमाने ढंग से अवरुद्ध करने या उनके सोशल मीडिया एकाउंट्स को अस्थायी या स्थायी रूप से बंद करने का कारण बन सकते हैं, जो उनके काम के लिए हानिकारक होगा.

कामरा ने अदालत से संशोधित नियमों को गैरकानूनी घोषित करने और सरकार को किसी के भी खिलाफ कानून लागू करने से रोकने का आदेश देने की मांग की है.

उनकी याचिका में कहा गया है, ‘ये नियम कानून के शासन और हमारी लोकतांत्रिक राजनीति पर हमला करते हैं, क्योंकि वे प्रतिवादी द्वारा विचार, भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला करते हैं.’

उल्लेखनीय है कि इस साल जनवरी में जब इन संशोधनों का प्रस्ताव पेश किया गया था, तब उसमें पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) को फैक्ट-चेक को लेकर व्यापक अधिकार दिए गए थे, जिसे लेकर एडिटर्स गिल्ड सहित देश भर के मीडिया संगठनों ने आलोचना की थी.

2019 में स्थापित पीआईबी की फैक्ट-चेकिंग इकाई, जो सरकार और इसकी योजनाओं से संबंधित खबरों को सत्यापित करती है, पर वास्तविक तथ्यों पर ध्यान दिए बिना सरकारी मुखपत्र के रूप में कार्य करने का आरोप लगता रहा है.

मई 2020 में न्यूज़लॉन्ड्री ने ऐसे कई उदाहरणों पर प्रकाश डाला था जिनमें पीआईबी की फैक्ट-चेकिंग इकाई वास्तव में तथ्यों के पक्ष में नहीं थी, बल्कि सरकारी लाइन पर चल रही थी.

यह नए नियम ऐसे समय में सामने आए हैं जब द वायर  समेत कई मीडिया संगठनों ने आईटी नियमों में 2021 में किए गए बदलावों की संवैधानिकता को चुनौती दी थी. इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसके इन प्रावधानों को स्थगित कर दिया था, जो सीधे डिजिटल मीडिया वेबसाइट्स पर लागू होते थे.

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