पत्रकार को अधिकारों से वंचित किया, पीएसए लगाते वक़्त दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया गया: कोर्ट

जम्मू कश्मीर की समाचार वेबसाइट ‘द कश्मीर वाला’ के संपादक फ़हद शाह के ख़िलाफ़ जन सुरक्षा क़ानून के तहत कार्यवाही को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने इसके तहत उनके हिरासत के आधार को ‘केवल संदेह के आधार पर’ और ‘मामूली दावा’ क़रार दिया. फरवरी 2022 में फ़हद को आतंकवाद का महिमामंडन करने, फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाने और जनता को भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.

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फहद शाह. (फोटो साभार: ट्विटर/@pzfahad)

जम्मू कश्मीर की समाचार वेबसाइट ‘द कश्मीर वाला’ के संपादक फ़हद शाह के ख़िलाफ़ जन सुरक्षा क़ानून के तहत कार्यवाही को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने इसके तहत उनके हिरासत के आधार को ‘केवल संदेह के आधार पर’ और ‘मामूली दावा’ क़रार दिया. फरवरी 2022 में फ़हद को आतंकवाद का महिमामंडन करने, फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाने और जनता को भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.

फहद शाह. (फोटो साभार: ट्विटर/@pzfahad)

श्रीनगर: जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि सरकारी अ​धिकारियों ने कश्मीरी पत्रकार और समाचार वेबसाइट ‘द कश्मीर वाला’ के संपादक फहद शाह को उनके ‘संवैधानिक और कानूनी अधिकारों’ से वंचित कर दिया है.

इस दौरान अदालत ने विवादास्पद जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत उनकी हिरासत के आधार को ‘केवल संदेह के आधार पर’ और ‘मामूली दावा’ करार दिया.

पीएसए, जिसे एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा ‘एक कानूनविहीन कानून’ करार दिया गया है – के तहत कार्यवाही को रद्द करते हुए जस्टिस वसीम सादिक नरगल के नेतृत्व वाली जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने फैसला सुनाया कि अधिकारियों ने पीएसए का आदेश जारी करने के दौरान ‘अपने विचारों को सावधानीपूर्वक मूल्यांकित और लागू नहीं किया’.

संविधान में अनुच्छेद 22 को विशेष रूप से डाला गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकार के अधिकारी निवारक हिरासत (Preventive Detention) की ‘असाधारण और यहां तक कि कठोर शक्तियों’ का इस्तेमाल न करें.

अदालत ने 13 अप्रैल को पारित अपने आदेश में कहा, ‘मौजूदा मामला दिमाग न लगाए जाने का एक स्पष्ट उदाहरण है.’

अदालत ने कहा कि एक जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) को सामान्य परिस्थितियों में कानून और व्यवस्था के रखरखाव में नहीं, बल्कि ‘सार्वजनिक व्यवस्था को तोड़ने से रोकने के लिए’ संदिग्धों की निवारक हिरासत का आदेश देने का अधिकार है.

अदालत ने कहा कि शाह के मामले में, जो 2022 से जेल में बंद है, जिला मजिस्ट्रेट ने ‘अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया है’.

जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि एक जिला मजिस्ट्रेट को जन सुरक्षा कानून के तहत संदिग्धों की हिरासत को सही ठहराने के लिए ‘बाध्यकारी परिस्थितियों’ को प्रस्तुत करना होता है.

जस्टिस नरगल ने 27 पन्नों के आदेश में फैसला सुनाया, ‘हिरासत में लिए गए व्यक्ति (फहद शाह) के खिलाफ आदेश पारित करते समय हिरासत में लेने वाले प्राधिकरण द्वारा कोई ठोस कारण नहीं दिया या दिखाया गया है, जबकि वह पहले से ही एफआईआर 70/2020 में हिरासत में थे, जिसमें कोई जमानत नहीं दी गई थी. किसी भी ठोस कारण के अभाव में हिरासत का आदेश कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है.’

एजेंसियों ने फहद शाह के खिलाफ जन सुरक्षा अधिनियम – जिसे अब रद्द कर दिया गया है – समेत पांच आतंकवाद विरोधी केस में मामला दर्ज किया है, अगर वे दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें अलग-अलग सजाओं का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें उम्रकैद तक की सजा शामिल हो सकती है.

अदालत ने उन्हें चार में से तीन आपराधिक मामलों में जमानत दे दी है.

पीएसए के तहत उनकी हिरासत को रद्द करते हुए अदालत ने कहा कि फहद शाह को उनकी हिरासत का डोजियर प्रदान नहीं किया गया था, जो कानून के अनुसार उन्हें ‘संबंधित अधिकारियों के समक्ष प्रभावी प्रतिनिधित्व’ करने की अनुमति देता. अदालत ने फैसला सुनाया, ‘डोजियर प्रदान न करना (शाह की) हिरासत की मुख्य खामियों में से एक है.’

अपने पीएसए डोजियर में जम्मू कश्मीर पुलिस ने दावा किया था कि शाह ‘भारत संघ के खिलाफ घृणा से भरे हुए थे’, ‘उन्होंने अलगाववाद को बढ़ावा दिया’ और उनकी ‘गतिविधियां केंद्रशासित प्रदेश जम्मू कश्मीर और भारत संघ की भी संप्रभुता, सुरक्षा, अखंडता, शांति आदि के लिए हानिकारक प्रतीत होती हैं.’

उन्हें सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा करार देते हुए पुलिस डोजियर ने फहद शाह पर ‘राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के लिए रसद सहायता’ उपलब्ध कराने और ‘हिंसा भड़काने जिससे सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ी’ का आरोप लगाया.

सार्वजनिक व्यवस्था और ‘राष्ट्र की सुरक्षा’

इस सवाल पर विचार करते हुए कि क्या ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ और ‘राज्य की सुरक्षा’ ‘अलग-अलग हैं या इन्हें एक-दूसरे स्थान पर इस्तेमाल किया जा सकता है’, अदालत ने कई आदेशों पर विचार किया, जिनमें एक सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी शामिल था, जिसमें कहा गया था कि दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं, ‘हालांकि हमेशा अलग नहीं.’

अदालत ने कहा कि शांति भंग से कानून और व्यवस्था की समस्या हो सकती है, लेकिन इस तरह के उल्लंघन से हमेशा सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी नहीं होती है और हर सार्वजनिक अव्यवस्था ‘राज्य की सुरक्षा’ को प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं कर सकती है.

अदालत ने आदेश दिया कि सार्वजनिक व्यवस्था का रखरखाव और देश की सुरक्षा व संप्रभुता दो अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं, जिससे बिना संदेह के यह साबित होता है कि हिरासत में लेने वाले प्राधिकरण ने नजरबंदी का आदेश पारित करते हुए अपना दिमाग नहीं लगाया है. इसलिए यह आदेश कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और रद्द किया जाता है.

अदालत ने सार्वजनिक अव्यवस्था की आशंकाओं को ‘हिरासत में लेने वाले प्राधिकरण’ का मात्र संदेह करार दिया.

अदालत ने फहद शाह की हिरासत को ‘अवैध करार’ देते हुए कहा कि ‘इस केस में हिरासत के आदेश से सात महीने पहले रिपोर्ट किए गए अपराध के कारण सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी की आशंका का वास्तव में कोई आधार नहीं है.’

यह फैसला सुनाते हुए कि फहद शाह के खिलाफ आरोपों की प्रकृति ‘गंभीर’ है, अदालत ने हालांकि कहा कि उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ‘निवारक हिरासत की वेदी पर केवल इसलिए बलिदान नहीं किया जा सकता है, क्योंकि एक व्यक्ति को एक आपराधिक कार्यवाही में फंसाया गया है.’

लेख को लेकर ‘राजद्रोह’ का आरोप

पिछले महीने समाचार वेबसाइट ‘द कश्मीर वाला’ में आला फजिली द्वारा लिखित एक लेख – जिसका शीर्षक ‘गुलामी की बेड़ियां टूट जाएंगी’ था – के प्रकाशन के बाद राज्य जांच एजेंसी ने फहद शाह और कश्मीर विश्वविद्यालय के स्कॉलर फजिली के खिलाफ राजद्रोह के एक मामले में आरोप-पत्र दायर किया था.

समाचार वेबसाइट द्वारा 2011 में ‘राष्ट्रविरोधी’ लेख प्रकाशित किए जाने के लगभग 11 साल बाद 4 अप्रैल 2022 (एफआईआर संख्या 01/2022) को आतंकवाद-रोधी एजेंसी के जम्मू स्थित सीआईजे पुलिस थाने द्वारा मामला दर्ज किया गया था. मामले में शाह और फजिली दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है.

इस मामले में फहद शाह पर विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम 2010 की धारा 35 (एफसीआरए के प्रावधानों के उल्लंघन में विदेशी योगदान स्वीकार करना) और 39 (एफसीआरए का उल्लंघन) के तहत आरोप लगाए गए हैं. आतंकवाद विरोधी एजेंसी ने अपने आरोप-पत्र में दावा किया था कि डिजिटल मीडिया के सब्सक्रिप्शन मॉडल का इस्तेमाल ‘हंगामा भड़काने’ के लिए किया जा सकता है.

आरोप-पत्र में पेरिस स्थित प्रेस फ्रीडम वॉचडॉग रिपोर्टर्स सैंस फ्रंटियर्स (आरएसएफ) पर ‘पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को नष्ट करने’ का आरोप लगाया गया है. 2022 की रिपोर्ट में आरएसएफ ने मीडिया स्वतंत्रता के मामले में भारत को 180 देशों में से 150वें स्थान पर रखा था.

‘गलत रिपोर्टिंग’

फहद शाह को पहली बार पिछले साल 4 फरवरी को सोशल मीडिया पर ‘आतंकवादी गतिविधियों का महिमामंडन’ करने और दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में एक मुठभेड़ की कथित ‘गलत रिपोर्टिंग’ द्वारा ‘देश के खिलाफ असंतोष’ पैदा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. पुलवामा की उक्त घटना में एक शीर्ष कमांडर समेत तीन आतंकवादी मार गिराए गए थे.

जिस घर में गोलाबारी हुई थी, उसके मालिक का बेटा इनायत अहमद मीर भी मारा गया था. जहां जम्मू कश्मीर पुलिस ने कहा था कि वह हाल ही में आतंकवादियों में शामिल हो गया था, वहीं उसके परिवार ने दावों को खारिज किया था. कुछ घंटों बाद इनायत की बहन का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया, जिसमें उन्होंने अपने भाई की मासूमियत के दावों को खारिज करने की बात कही थी.

उनके खुलासे के बाद जम्मू कश्मीर पुलिस ने इनायत के परिवार पर आईपीसी, शस्त्र अधिनियम और यूएपीए की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया था.

फहद शाह उन चार पत्रकारों में शामिल थे, जिन्हें मामले में गवाह के रूप में गवाही देने के लिए बुलाया गया था और वे एकमात्र पत्रकार बन गए, जिन्हें आरोपी के रूप में नामित किया गया.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, फहद शाह ने जून 2017 और जनवरी 2021 के बीच डराने-धमकाने के छह मामलों का सामना किया है. 30 जनवरी 2021 को शाह पर आईपीसी की विभिन्न धाराओं में एक रिपोर्ट प्रकाशित करने के संबंध में मामला दर्ज किया गया था.

रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि सेना शोपियां में एक निजी स्कूल के प्रबंधन पर गणतंत्र दिवस समारोह आयोजित करने के लिए ‘दबाव’ डाल रही थी.

सेना ने आरोप से इनकार किया था और पुलिस से शिकायत की थी, जिसने एफआईआर दर्ज की थी. इस मामले में एक अदालत ने शाह को जमानत दे दी है.

तीसरा आपराधिक मामला 19 मई 2020 को श्रीनगर के नवा कदल इलाके में हुई एक मुठभेड़ से संबंधित है, इस दौरान दर्जन भर से अधिक मकानों को ढहा दिया गया था.

‘द कश्मीर वाला’ ने इसका कवरेज किया था, इसलिए उन पर मामला दर्ज हुआ.

स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया था कि घरों में आग लगाने से पहले सुरक्षा बलों ने नकदी और आभूषण लूट लिए थे, अधिकारियों ने इस आरोप से इनकार किया था. ‘द कश्मीर वाला’ के साथ-साथ स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया द्वारा आरोपों और आधिकारिक खंडन पर रिपोर्ट की गई थी.

बता दें कि पुलवामा पुलिस ने चार फरवरी 2022 को फहद शाह को आतंकी गतिविधियों का महिमामंडन करने और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की छवि खराब करने के अलावा देश के खिलाफ दुर्भावना और असंतोष पैदा करने के लिए सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए गिरफ्तार किया था.

उन्हें 22 दिनों की हिरासत के बाद एनआईए एक्ट के तहत विशेष अदालत ने जमानत दे दी थी. इसके बाद उन्हें शोपियां पुलिस ने गिरफ्तार किया और मार्च 2022 की शुरुआत में जमानत दी गई. फिलहाल वह श्रीनगर के सफाकदल पुलिस थाने में बंद हैं.

तब एक महीने में तीन बार फहद की गिरफ्तारी के बाद अमेरिकी मीडिया एडवोकेसी समूह कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) ने भारतीय प्रशासन से राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पत्रकारिता का अपराधीकरण बंद करने को कहा था, जबकि कई अन्य ने इसे देश की लोकतांत्रिक साख पर हमला बताया था.

फहद शाह को एक महीने के भीतर तीसरी बार गिरफ्तार करने से पहले दो बार जमानत मिल गई थी. फहद को बार-बार गिरफ्तार करने और उन पर यूएपीए के तहत मामला दर्ज करने का बड़े पैमाने पर विरोध होता रहा है.

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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