संशोधित आईटी नियम व्यंग्य और पैरोडी को आवश्यक सुरक्षा प्रदान नहीं करते: हाईकोर्ट

स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने हाल ही में अधिसूचित नए आईटी नियमों को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है. उनकी याचिका ख़ारिज करने की मांग करते हुए सरकार ने कहा है कि नए नियमों के तहत बनने वाली फैक्ट-चेक इकाई सोशल मीडिया से किसी व्यंग्य या किसी राय को नहीं हटाएगी.

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बॉम्बे हाईकोर्ट. (फोटो साभार: एएनआई)

स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने हाल ही में अधिसूचित नए आईटी नियमों को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है. उनकी याचिका ख़ारिज करने की मांग करते हुए सरकार ने कहा है कि नए नियमों के तहत बनने वाली फैक्ट-चेक इकाई सोशल मीडिया से किसी व्यंग्य या किसी राय को नहीं हटाएगी.

बॉम्बे हाईकोर्ट. (फोटो साभार: एएनआई)

मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सोमवार को कहा कि संशोधित आईटी नियम व्यंग्य और पैरोडी के लिए आवश्यक सुरक्षा प्रदान नहीं करते हैं.

कामरा ने संशोधित आईटी नियमों के दो खंडों को चुनौती दी है जो सरकार द्वारा नियुक्त निकाय द्वारा ‘फेक या भ्रामक’ ठहराई गई सूचना को सोशल मीडिया मंचों से हटाने का आदेश देते हैं.

6 अप्रैल को अधिसूचित सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में बदलाव केंद्र सरकार के संबंध में ऑनलाइन पोस्ट की गई जानकारी से संबंधित हैं. विशेषज्ञ और कार्यकर्ता इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संभावित खतरा मानते हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, जस्टिस गौतम पटेल और जस्टिस नीला गोखले की खंडपीठ ने सोमवार को कहा, ‘आपका हलफनामा कहता है कि आप पैरोडी, व्यंग्य को प्रभावित नहीं कर रहे हैं. लेकिन आपके नियम ऐसा नहीं कहते हैं. कोई सुरक्षा (प्राप्त) नहीं है.’

गौरतलब है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सोमवार को कामरा की याचिका के जवाब में एक हलफनामा दायर किया था.

कामरा की याचिका में जिन खंडों की वैधता को चुनौती दी गई है, उनमें से एक यह है कि ‘सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज (प्लेटफॉर्मों/मध्यस्थों)- जैसे कि ट्विटर और फेसबुक- ऐसी किसी सूचना, जिसे केंद्र सरकार की फैक्ट-चेक इकाई द्वारा केंद्र के किसी कामकाज के संदर्भ में फर्जी, झूठ या भ्रामक करार दिया गया है, को ‘होस्ट, प्रदर्शित, संशोधित, प्रकाशित, प्रसारित, प्रेषित, स्टोर, अपडेट या साझा’ न करने दें.’

कामरा ने अदालत से अनुरोध किया था कि सूचना प्रौद्योगिकी नियमों (आईटी नियमों) के नियम 3(1)(बी)(v) को असंवैधानिक घोषित किया जाए. उक्त नियम मध्यस्थों (सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म) को यूज़र को ‘गलत’ या ‘भ्रामक जानकारी’ अपलोड करने या साझा करने से रोकने के लिए उचित प्रयास करने के लिए बाध्य करता है.

कामरा को डर था कि नियम संभावित रूप से सोशल मीडिया से उनकी सामग्री को मनमाने ढंग से हटा सकता है या इसके परिणामस्वरूप उनके सोशल मीडिया एकाउंट्स को ब्लॉक किया जा सकता है. उक्त संशोधन को रद्द करने की मांग करते हुए उन्होंने यह भी आशंका जताई कि यदि सरकार की फैक्ट-चेक इकाई ने उनकी सामग्री को ‘फर्जी’ माना तो मध्यस्थ आसानी से उनकी सामग्री को हटा सकता है.

हालांकि, सरकार ने अपने हलफनामे में कामरा के डर को निराधार माना और उनकी याचिका ख़ारिज करने की मांग की.

सोमवार को केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने पीठ से अनुरोध किया कि सुनवाई एक सप्ताह के लिए स्थगित कर दी जाए क्योंकि मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश होंगे.

लेकिन, कामरा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता नवरोज सीरवई ने अनुरोध का विरोध किया और कहा कि मीडिया में आई खबरों के अनुसार फैक्ट-चेकिंग यूनिट की अधिसूचना और इसके गठन की जल्द ही घोषणा की जानी है और इसलिए हाईकोर्ट को रोक लगानी चाहिए.

सीरवई ने तर्क दिया कि हालांकि मंत्रालय द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया है कि संशोधित नियम राय व्यक्त करने या व्यंग्य को प्रभावित नहीं करेंगे, लेकिन संशोधन स्पष्ट तौर पर ऐसा नहीं कहता है और इसलिए नागरिकों पर इसके भयावह प्रभाव हैं.

सीरवई ने कहा, ‘वे कह रहे हैं कि सरकार की कार्रवाई की जांच किसी के द्वारा नहीं की जा सकती है. क्या वे लोकतंत्र में ऐसा कह सकते हैं? इस देश में लोग डरे हुए हैं और ऐसा तब नहीं होना चाहिए जब कानून का शासन लागू हो. मेरी चुनौती यह है कि संशोधित नियमों द्वारा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और (जी) और 14 का उल्लंघन होता है.’

उन्होंने साथ ही कहा कि नियमों में भी उचित प्रतिबंधों का उल्लेख नहीं किया गया है.

कामरा ने यह कहते हुए याचिका दायर की है कि वह एक व्यंग्यकार हैं और सरकार के फैसलों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियां पोस्ट करते हैं और संशोधित नियमों से टिप्पणियों को पोस्ट करने की उनकी क्षमता पर अंकुश लगेगा क्योंकि उन्हें झूठा करार दिया जाएगा और उनकी सामग्री या उनके एकाउंट को मनमाने ढंग से ब्लॉक भी किया जा सकता है.

दोनों पक्षों को सुनने के बाद पीठ ने एक सप्ताह के लिए स्थगन के सिंह के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया और कहा कि उसे विश्वास है कि वह इस मामले में खुद बहस कर सकते हैं. अदालत याचिका पर अगली सुनवाई 27 अप्रैल को करेगी.