आज़ादी के समय सेंगोल को ‘सत्ता हस्तांतरण’ का प्रतीक बताना एक ‘झूठ’ है: वरिष्ठ पत्रकार एन. राम

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने दावा किया है कि ‘सेंगोल’ नामक स्वर्ण राजदंड 15 अगस्त, 1947 को सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सौंपा था. इस राजदंड को नई संसद में स्थापित किया गया है.

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सेंगोल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: फेसबुक)

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने दावा किया है कि ‘सेंगोल’ नामक स्वर्ण राजदंड 15 अगस्त, 1947 को सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सौंपा था. इस राजदंड को नई संसद में स्थापित किया गया है.

सेंगोल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: अनुभवी पत्रकार और ‘द हिंदू ग्रुप पब्लिशिंग प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशक एन. राम ने बीते बुधवार (31 मई) को आरोप लगाया कि केंद्र सरकार द्वारा नए संसद भवन में बड़ी धूमधाम से स्थापित ‘सेंगोल’ (राजदंड) के बारे में किए गए कई दावे झूठ हैं.

नरेंद्र मोदी सरकार ने हाल ही में दावा किया है कि ‘सेंगोल’ नामक स्वर्ण राजदंड 15 अगस्त, 1947 को सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सौंपा था.

एन. राम ने कहा कि देश की आजादी के समय सेंगोल को ‘सत्ता हस्तांतरण’ का प्रतीक बताना एक ‘झूठ’ है.

द हिंदू में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, वह तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में नेशनल थिंकर्स फोरम द्वारा आयोजित ‘14-15 अगस्त, 1947 को वास्तव में क्या हुआ?’, विषय पर एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे.

राम ने कहा कि इन दावों के समर्थन में कोई सबूत नहीं है कि भारत के अंतिम वायसरॉय माउंटबेटन ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से (सत्ता के हस्तांतरण को दर्शाने के लिए होने वाली किसी रस्म के बारे में) पूछा था. तब नेहरू ने सी. राजगोपालाचारी या राजाजी (भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल) से इस संबंध में सलाह मांगी थी.

उन्होंने कहा, ‘इस तरह के दावे का मुख्य सार यह है कि अंतिम वायसरॉय माउंटबेटन एक विशिष्ट उद्देश्य के साथ भारत आए थे. उन्हें अंग्रेजों को भारत से जल्द से जल्द ​निकालना और भारतीयों को सत्ता सौंपना था. तब उन्होंने जल्द ही प्रधानमंत्री बनाए जाने वाले जवाहरलाल नेहरू से पूछा था कि सत्ता के हस्तांतरण के इस क्षण को कैसे आयोजित किया जाना चाहिए, क्या कोई समारोह होगा. हालांकि इसके लिए (सेंगोल को लेकर) बिल्कुल कोई सबूत नहीं है.’


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एन. राम ने आगे कहा, ‘माउंटबेटन के बारे में और विशेष रूप से भारत के वायसरॉय और गवर्नर-जनरल के रूप में उनके छोटे कार्यकाल के बारे में कई किताबें हैं. 1968 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज में माउंटबेटन द्वारा ‘ट्रांसफर ऑफ पावर एंड जवाहरलाल नेहरू’ शीर्षक से दिए गए दूसरे जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल लेक्चर में उनके द्वारा नेहरू से पूछे गए किसी भी समारोह का कोई संदर्भ नहीं है.’

उन्होंने कहा कि यह दावा कि नेहरू ने राजाजी से मदद मांगी और तिरुववदुथुरई अधीनम (तमिलनाडु में स्थित एक शैव मठ) के प्रतिनिधि एक विशेष विमान में नई दिल्ली गए और नेहरू से मिलने से पहले माउंटबेटन से मिले, ‘पूर्ण रूप से कल्पना’ है.

उन्होंने कहा, ‘कोई रास्ता नहीं था कि अधीनम के प्रतिनिधि दिल्ली में माउंटबेटन से मिल सकते थे. यह सच है कि वे नेहरू से मिले थे, इसके प्रमाण हैं; लेकिन यह दावा कि नेहरू ने राजाजी से सलाह मांगी, जिन्होंने फिर थिरुववदुथुरई अधीनम से परामर्श लिया, इसका प्रमाण नहीं है. सेंगोल वुम्मिदी बंगारू चेट्टी (एक स्वर्णकार) द्वारा बनाया गया था; यह क्यों और कब दिया गया और क्या इसका ‘सत्ता हस्तांतरण’ से कोई संबंध था, इसका भी कोई सबूत नहीं है.’

एन. राम के अनुसार, ‘उस समय कोई भी इसे सत्ता हस्तांतरण नहीं मानता था. ब्रिटिश संसद में पारित भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम कहता है कि 15 अगस्त को भारत स्वतंत्र हुआ और ‘सत्ता हस्तांतरण’ का क्षण तब आया, जब माउंटबेटन ने नेहरू को वायसरॉय के रूप में प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई थी.’

अधीनम के प्रतिनिधि माउंटबेटन से क्यों नहीं मिल सकते थे, इस पर तर्क देते हुए एन. राम ने कहा, ‘14 अगस्त के माउंटबेटन के कार्यक्रम के अनुसार, वह सत्ता हस्तांतरण की देखरेख के लिए कराची के लिए उड़ान भरेंगे और शाम 7 बजे नई दिल्ली पहुंचेंगे. इस तरह ऐसा कोई तरीका नहीं था कि नेहरू से मिलने से पहले अधीनम प्रतिनिधिमंडल उनसे मिल सकता था.’


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उन्होंने आगे कहा, ‘एक और दावा है कि नई दिल्ली जाने के लिए अधीनम प्रतिनिधिमंडल के लिए एक विशेष विमान की व्यवस्था की गई थी. यह पूरी तरह से कल्पना है. अधीनम ने 29 अगस्त 1947 के द हिंदू के संस्करण में एक विज्ञापन दिया था, जिसका शीर्षक था, ‘नेहरूजी को स्वर्ण राजदंड की थिरुववदुथुरई अधीनकारथार्स प्रस्तुति’, जिसमें तीन तस्वीरें थीं.’

एन. राम ने कहा, ‘द हिंदू में 11 अगस्त 1947 को एक छोटी सी खबर प्रकाशित हुई थी कि रात 11 बजे नेहरू को एक सुनहरा राजदंड भेंट किया जा रहा है. यह तथ्य है. क्या वे हवाई जहाज से गए थे? 11 अगस्त को मद्रास सेंट्रल स्टेशन छोड़ने से पहले स्वर्ण राजदंड पेश करने के लिए अधीनम द्वारा प्रतिनियुक्त पार्टी की एक तस्वीर है. इसमें श्री कुमारसामी थम्बिरन, मनिका ओधुवर, श्री केपी रामालिंगम पिल्लई, श्री सुब्बैया भारथियार और श्री टीएन राजारथिनम पिल्लई शामिल थे.’

वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि अधीनम के वर्तमान पुजारी ने भी एक वीडियो में स्वीकार किया है कि ऐसा कोई (फोटोग्राफिक) सबूत नहीं था कि अधीनम के प्रतिनिधि माउंटबेटन से मिले थे.

उन्होंने कहा, ‘सरकार के दावे का सार यह है कि ‘यह सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक और पवित्रीकरण’ है. यहां भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम का कोई संदर्भ नहीं है. भारत तब गणतंत्र नहीं बना था. यह संविधान की घोषणा के बाद गणतंत्र हुआ था. नेहरूजी की चुनी हुईं कृतियों के संपादक और इतिहासकार माधवन पलट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि नेहरू इसे सत्ता हस्तांतरण के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते थे, क्योंकि स्वर्ण राजदंड की प्रस्तुति और माउंटबेटन से कोई संबंध नहीं था.’

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष केएस अलागिरी ने कहा कि ‘सेंगोल कोई गर्व की बात नहीं है’.

उन्होंने कहा, ‘लोकतंत्र की विशेषता राजशाही को हटाना है. लोगों ने लोकतंत्र पर खुशी मनाई और सेंगोल को भी हटा दिया गया. सेंगोल, जो राजाओं के हाथ में था, ‘पवित्र’ नहीं था और इसी कारण राजशाही को समाप्त कर दिया गया, लेकिन (प्रधानमंत्री नरेंद्र) मोदी राजशाही को फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं और राजशाही के प्रतीक के रूप में उन्होंने ‘सेंगोल’ का इस्तेमाल किया है.’

तमिलनाडु कांग्रेस के उपाध्यक्ष ए. गोपन्ना और माकपा नेता जी. रामकृष्णन भी कार्यक्रम में मौजूद थे.

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