मणिपुर हिंसा: मुख्यमंत्री ने कहा- किसी भी कीमत पर अलग प्रशासन नहीं बनने देंगे

मणिपुर में बीते 3 मई से जारी जातीय हिंसा के बाद सत्तारूढ़ भाजपा सहित प्रदर्शनकारी कुकी विधायकों और आदिवासी संगठन अलग प्रशासन की मांग कर रहे हैं. मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने कहा कि जातीय हिंसा के पीछे अंतरराष्ट्रीय हाथ की पुष्टि या खंडन करना संभव नहीं है, लेकिन यह पूर्व नियोजित लगता है.

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एन. बीरेन सिंह. (फोटो साभार: फेसबुक)

मणिपुर में बीते 3 मई से जारी जातीय हिंसा के बाद सत्तारूढ़ भाजपा सहित प्रदर्शनकारी कुकी विधायकों और आदिवासी संगठन अलग प्रशासन की मांग कर रहे हैं. मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने कहा कि जातीय हिंसा के पीछे अंतरराष्ट्रीय हाथ की पुष्टि या खंडन करना संभव नहीं है, लेकिन यह पूर्व नियोजित लगता है.

एन. बीरेन सिंह. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: मणिपुर में पिछले दो महीने से जारी जातीय हिंसा के बीच मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने कहा है कि वह राज्य को विभाजित नहीं होने देंगे.

मणिपुर में बीते 3 मई को जातीय हिंसा बहुसंख्यक मेईतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति (एसटी) के दर्जे की मांग के कारण भड़की थी, जिसे पहाड़ी जनजातियां अपने अधिकारों पर अतिक्रमण के रूप में देखती हैं.

इस​ हिंसा के बाद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सहित प्रदर्शनकारी कुकी विधायकों और आदिवासी संगठन अब अलग प्रशासन की मांग कर रहे हैं.

यह मुद्दा तब फिर उभर गया था, जब मणिपुर हाईकोर्ट ने बीते 27 मार्च को राज्य की भाजपा नेतृत्व वाली एन. बीरेन सिंह सरकार को निर्देश दिया था कि वह मेईतेई समुदाय को एसटी में शामिल करने के संबंध में केंद्र को एक सिफारिश सौंपे.

मणिपुर में मेईतेई समुदाय आबादी का लगभग 53 प्रतिशत है और ज्यादातर इंफाल घाटी में रहते हैं. आदिवासी, जिनमें नगा और कुकी शामिल हैं, आबादी का 40 प्रतिशत हिस्सा हैं और ज्यादातर पहाड़ी जिलों में रहते हैं, जो घाटी इलाके के चारों ओर स्थित हैं.

एसटी का दर्जा मिलने से मेईतेई सार्वजनिक नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के हकदार होंगे और उन्हें वन भूमि तक पहुंच प्राप्त होगी. लेकिन राज्य के मौजूदा आदिवासी समुदायों को डर है कि इससे उनके लिए उपलब्ध आरक्षण कम हो जाएगा और सदियों से वे जिन जमीनों पर रहते आए हैं, वे खतरे में पड़ जाएंगी.

ऐसा माना जाता है कि हाईकोर्ट के आदेश से मणिपुर के गैर-मेईतेई निवासी, जो पहले से ही अनुसूचित जनजातियों की सूची में हैं, चिंतित हो गए, जिसके परिणामस्वरूप 3 मई को आदिवासी संगठनों द्वारा निकाले गए निकाले गए एक विरोध मार्च के दौरान जातीय हिंसा भड़क उठी.

बीते 17 मई को सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार को अनुसूचित जनजातियों की सूची में मेईतेई समुदाय को शामिल करने पर विचार करने के निर्देश के खिलाफ ‘कड़ी टिप्पणी’ की थी. शीर्ष अदालत ने इस आदेश को तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत बताया था.

इससे पहले बीते 8 मई को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में हुई हिंसा को एक ‘मानवीय समस्या’ बताया था. अदालत ने कहा था कि किसी समुदाय को अनुसूचित जाति (एससी) या अनुसूचित जनजाति (एसटी) के रूप में नामित करने की शक्ति हाईकोर्ट के पास नहीं, बल्कि राष्ट्रपति के पास होती है.

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, बीते शनिवार (1 जुलाई) को समाचार एजेंसी एएनआई के साथ दिए गए एक इंटरव्यू में मेईतेई समुदाय के सदस्य मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने कहा, ‘मैं बिना किसी अलग प्रशासन के निर्माण के मणिपुर की क्षेत्रीय एकता को अक्षुण्ण रखने का प्रयास करूंगा. मैं एक मुख्यमंत्री के रूप में और भाजपा की ओर से अपना वचन देता हूं कि मैं एक अलग प्रशासन के निर्माण के लिए मणिपुर को विभाजित नहीं होने दूंगा और राज्य की एकता के लिए सभी बलिदान दूंगा.’

सिंह ने कहा, ‘हम एक हैं. मणिपुर एक छोटा राज्य है, लेकिन हमारे पास 34 जनजातियां हैं. इन सभी जनजातियों को एक साथ रहना होगा.’

झड़पों के पीछे के कारण के बारे में पूछे जाने पर मुख्यमंत्री ने कहा, ‘मैं उलझन में हूं कि झड़पों पीछे क्या कारण है. यह (मणिपुर) हाईकोर्ट का एक आदेश था, जिसमें राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर सिफारिशें प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था कि क्या मेईतेई को एसटी श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए.’

उन्होंने कहा कि वह भी ‘भ्रम’ में हैं और केवल वे लोग ही इस सवाल का जवाब दे सकते हैं, जिन्होंने (3 मई की) रैली का आयोजन किया था, जिसके कारण झड़पें हुईं.

उन्होंने कहा, ‘हाईकोर्ट ने हमारी सरकार से इस सवाल पर चार सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा था कि मेईतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किया जाना चाहिए या नहीं. मैंने कहा था कि आम सहमति महत्वपूर्ण है. इससे पहले कि हम कोई निर्णय ले सकें, यह सब हो गया.’

मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पर आरोप लगाया

इंटरव्यू के दौरान मुख्यमंत्री ने विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए कहा, ‘हम ‘जहरीले फल’ खा रहे हैं, जिसके बीज उन्होंने बोए थे.’

उन्होंने कहा, ‘ये समस्याएं कहां से आई हैं? ये अपनी जड़ें गहराई तक जमाए हुए हैं. ये आज की समस्याएं नहीं हैं. जो लोग कांग्रेस की तरह आरोप लगा रहे हैं, हम ‘जहरीले फल’ खा रहे हैं, जिसके बीज उन्होंने बोए थे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘पूरी दुनिया जानती है कि गलती किसकी थी. कुकी और मेईतेई के बीच दो-तीन साल तक जातीय संघर्ष जारी रहा, नुकसान और मौतें हुईं, इसीलिए उस समय कुकी उग्रवादियों का उभार हुआ, उन्हें 2005-2018 तक 13 वर्षों के लिए खुली छूट दी गई, इसीलिए आज ऐसा हो रहा है.’

शांति की एक और अपील करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि मणिपुर की सभी 34 जनजातियों को एक साथ रहना चाहिए, भले ही उनमें से कुछ बाद में राज्य में आए हों या मूल निवासी हों.

उन्होंने कहा, ‘सभी मेईतेई, कुकी, नगा, मेईतेई पंगल और अन्य को एक साथ रहना होगा, लेकिन हमें सावधान रहना होगा कि बाहर से लोग बड़ी संख्या में यहां आकर बस न जाएं, क्योंकि इससे उन पुराने लोगों की पहचान को नुकसान पहुंच सकता है, कोई जनसांख्यिकीय असंतुलन नहीं है और यह (स्वदेशी लोगों की) आर्थिक कमजोरी का कारण बनता है.’

अंतरराष्ट्रीय हाथ की पुष्टि या खंडन करना संभव नहीं

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने शनिवार को कहा कि हालांकि राज्य में मेईतेई और कुकी समुदायों के बीच चल रही जातीय झड़पों में अंतरराष्ट्रीय हाथ की पुष्टि या खंडन करना संभव नहीं है, लेकिन यह पूर्व नियोजित लगता है.

मुख्यमंत्री से जब राज्य में चल रहे जातीय संघर्ष में संभावित अंतरराष्ट्रीय हाथ के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘मणिपुर म्यांमार के साथ पड़ोसी है और चीन भी पास में है. हमारे पास 398 किलोमीटर लंबी ‘सुराखदार’ और बिना सुरक्षा वाली सीमा है. भारतीय सुरक्षा बल हमारी सुरक्षा कर रहे हैं, लेकिन वे संभवत: हर चीज को कवर नहीं कर सकते. कोई भी कल्पना कर सकता है कि वहां क्या हो सकता है. अब क्या हो रहा है, हम इसमें अंतरराष्ट्रीय हाथ से इनकार या पुष्टि नहीं कर सकते.’

उन्होंने कहा, ‘यह पूर्व नियोजित लगता है, लेकिन इसका कारण स्पष्ट नहीं है.’