अमरमणि की रिहाई पर मधुमिता शुक्ला की बहन ने कहा- मैं डरी हुई हूं, जान से मारने की धमकी मिल रही है

कवयित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी म​धुमणि को समय से पहले रिहा कर दिया है. इस आदेश को मधुमिता के बहन निधि शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. उन्होंने कहा कि यूपी सरकार ने गृह मंत्रालय के दिशानिर्देशों को ‘नज़रअंदाज़’ करते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया.

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अमरमणि त्रिपाठी. (फोटो साभार: फेसबुक/ट्विटर/एएनआई)

कवयित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी म​धुमणि को समय से पहले रिहा कर दिया है. इस आदेश को मधुमिता के बहन निधि शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. उन्होंने कहा कि यूपी सरकार ने गृह मंत्रालय के दिशानिर्देशों को ‘नज़रअंदाज़’ करते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया.

अमरमणि त्रिपाठी. (फोटो साभार: फेसबुक/ट्विटर/एएनआई)

नई दिल्ली: कवयित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा काट रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी को समय से पहले रिहा किए जाने के बाद मधुमिता की बहन निधि शुक्ला ने कहा है कि उन्हें अपनी जान का खतरा है और उन्हें जान से मारने की धमकी मिल रही है.

द वायर से बात करते हुए निधि ने कहा कि जिस दिन से अम​रमणि की रिहाई का आदेश जारी हुआ है, तब से उन्हें अपनी जान का डर सता रहा है.

उन्होंने कहा, ‘24 अगस्त के बाद से मुझे धमकी भरे छह फोन कॉल आए हैं. मैं बहुत डरी हुई हूं, क्योंकि मुझे नहीं पता कि मैं कब तक जिंदा रहूंगी. एक बार वो बाहर आ जाए, मुझे छोड़ेगा नहीं.’

अमरमणि त्रिपाठी की पत्नी मधुमणि को भी 24 वर्षीय मधुमिता शुक्ला की हत्या का दोषी ठहराया गया था.

कवयित्री मधुमिता उस समय गर्भवती थीं, जब 9 मई, 2003 को लखनऊ की पेपर मिल कॉलोनी में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. अमरमणि त्रिपाठी को सितंबर 2003 में उनकी हत्या के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था, जिसके साथ वह कथित तौर पर रिश्ते में थे.

‘अच्छे व्यवहार’ का हवाला देकर समय से पहले रिहा किया गया

बीते शुक्रवार (25 अगस्त) को त्रिपाठी दंपति की समय-पूर्व रिहाई का निधि शुक्ला ने विरोध किया था. इस संबंध में दाखिल रिट याचिका पर शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार, अम​रमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी को नोटिस जारी कर आठ सप्ताह के भीतर जवाब मांगा था, लेकिन उनकी रिहाई पर रोक नहीं लगाई थी.

उत्तर प्रदेश जेल विभाग ने इससे एक दिन पहले बीते 24 अगस्त को राज्य की 2018 की छूट नीति का हवाला देते हुए उनकी समय से पहले रिहाई का आदेश जारी किया, क्योंकि उन्होंने अपनी सजा के 16 साल पूरे कर लिए हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई ने गोरखपुर जेल अधीक्षक दिलीप पांडेय के हवाले से बताया था कि रिहाई के लिए जेल विभाग ने उनके ‘बुढ़ापे’ और ‘अच्छे व्यवहार’ का भी हवाला दिया था, क्योंकि अमरमणि 66 साल के हैं और मधुमणि 61 साल की हैं.

देहरादून की एक अदालत ने अक्टूबर 2007 में मधुमिता की हत्या के लिए अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि त्रिपाठी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. बाद में नैनीताल में उत्तराखंड हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने सजा को बरकरार रखा. मामले की जांच सीबीआई ने की थी.

उभरती कवियित्रि मधुमिता शुक्ला हत्या मामले की जांच कर रही सीबीआई ने अपनी जांच में पाया था कि अमरमणि और मधुमिता रिश्ते में थे. एक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला था कि हत्या के समय मधुमिता सात महीने की गर्भवती थीं.

सीबीआई के अनुसार, तत्कालीन मंत्री अमरमणि ने उन पर गर्भपात कराने के लिए दबाव डालने की कोशिश की थी, ऐसा न करने पर उन्होंने और उनकी पत्नी ने उनकी हत्या की साजिश रची थी.

दिसंबर 2007 में देहरादून की विशेष सीबीआई अदालत ने दंपति को हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. साथ ही दो अन्य लोगों रोहित चतुर्वेदी (अमरमणि के भतीजे) और संतोष कुमार राय (उनके करीबी रिश्तेदार) को भी सजा सुनाई था.

इसके बाद नैनीताल में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सजा को बरकरार रखा. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिली. 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें दी गई उम्रकैद की सजा की पुष्टि की थी.

गृह मंत्रालय के दिशानिर्देशों को ‘नजरअंदाज’ किया

सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिट याचिका में निधि शुक्ला ने त्रिपाठी दंपति को रिहा करने के यूपी सरकार के फैसले का विरोध किया था.

द वायर द्वारा प्राप्त याचिका में कहा गया है कि यूपी सरकार ने ‘आजादी के 75वें वर्ष’ के उपलक्ष्य में कैदियों को विशेष छूट देने पर गृह मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों को ‘पूरी तरह से नजरअंदाज’ किया है, जिसमें उन दोषियों को विचार के दायरे से बाहर रखा है, जो अपनी सजा के 14 साल पूरे होने के बाद भी जघन्य अपराधों के लिए आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं.

दिवंगत कवयित्री मधुमिता शुक्ला की बहन निधि शुक्ला. (फोटो साभार: एएनआई वीडियोग्रैब)

याचिका में कहा गया है कि मधुमिता की मौत के बाद मामला ‘एक शक्तिशाली राजनेता की संलिप्तता और हस्तक्षेप के कारण’ सीबीआई को सौंप दिया गया था.

अमरमणि त्रिपाठी यूपी में चार बार विधायक रहे हैं और राज्य के सभी चार प्रमुख राजनीतिक दलों से जुड़े रहे हैं, जिनमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शामिल हैं.

उन्होंने अपना आखिरी चुनाव 2007 में जीता था, जब वह जेल में थे.

मधुमिता की हत्या के समय वह राज्य में मायावती के नेतृत्व वाली बसपा सरकार में मंत्री थे और हत्या के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था.

याचिका में कहा गया है कि जब अमरमणि नौतनवा निर्वाचन क्षेत्र से विधायक थे, तब उनका यूपी और गोरखपुर में ‘मजबूत प्रभाव’ था, जो उनका स्थायी निवास है.

नौतनवा गोरखपुर मंडल के तहत आता है और गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का निर्वाचन क्षेत्र भी है.

याचिका में कहा गया है कि अमरमणि और उनकी पत्नी मधुमणि को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बावजूद 2015-16 में अखबारों की रिपोर्ट और स्टिंग ऑपरेशन से पता चला था कि ‘वे अपने गृह जिले के पास एक अस्पताल में विलासितापूर्ण जीवन का आनंद ले रहे हैं’. न्याय का पूरी तरह से मखौल उड़ाते हुए, वे केवल नाम के लिए आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे.

यह भी कहा गया है, ‘यहां तक कि जब उन्हें अस्पताल से वापस जेल में स्थानांतरित किया गया, तब भी जेल अधिकारियों ने उन्हें मोबाइल फोन और लैपटॉप सहित सभी सुविधाएं प्रदान कीं. वास्तव में उन्हें दो बैरक उपलब्ध कराए गए थे, जबकि आमतौर पर प्रत्येक बैरक में 150 से 200 आम कैदियों/दोषियों को रखा जाता था.’

याचिका में यह भी कहा गया है कि निधि शुक्ला द्वारा अस्पतालों और जेल में बिताए गए समय के बारे में दायर की गई कई सूचना का अधिकार (आरटीआई) अपीलें अभी भी लंबित हैं. 2021 में प्राप्त एक उत्तर के अनुसार, अमरमणि और मधुमणि दोनों ने जेल में रहने के बजाय लगभग छह साल अस्पतालों में बिताए थे.

याचिका में कहा गया है कि दंपति ने अदालत के फैसले का ‘मजाक’ बनाया है.

इसमें यह भी कहा गया है कि निधि शुक्ला ने अमरमणि के बेटे अमनमणि त्रिपाठी से ‘लगातार धमकियां’ मिलने के बाद अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस अधीक्षक (एसपी) और प्रमुख सचिव (गृह) लखनऊ को कई अभ्यावेदन दिए थे.

अमनमणि त्रिपाठी 2017 में नौतनवा सीट से निर्दलीय चुनाव जीतकर विधायक भी रह चुके हैं. उन्होंने 2022 का चुनाव भी लड़ा, लेकिन असफल रहे थे.

अमनमणि अपनी पत्नी सारा की हत्या के सिलसिले में 2016 में गिरफ्तार किया गया था, जिनकी 2015 में एक कथित सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. उन्हें 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जमानत दे दी गई थी.

निधि की याचिका में कहा गया है कि इसे सुप्रीम कोर्ट में दायर किया जा रहा है, क्योंकि त्रिपाठि दंपति की समय-पूर्व रिहाई के खिलाफ उनके कई अभ्यावेदन ‘अनुत्तरित’ रहे हैं.

राज्यपाल को गुमराह किया गया: निधि शुक्ला

द वायर से बात करते हुए निधि शुक्ला ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके दस्तावेजों को ठीक पाया है, लेकिन राज्य सरकार ने नहीं.

मधुमिता शुक्ला और अमरमणि त्रिपाठी. (फोटो साभार: फेसबुक)

उन्होने कहा, ‘राज्यपाल को गुमराह किया गया है. सभी अधिकारियों के पास सारे दस्तावेज हैं. हमारे पास आरटीआई दस्तावेजों सहित सबूत हैं. हमने अपने सारे कागजात सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दिए हैं. इन दस्तावेजों के आधार पर अदालत ने मेरी याचिका स्वीकार कर ली और कागजातों में सच्चाई पाई, लेकिन राज्य सरकार ने ऐसा नहीं किया और रिहाई का आदेश दे दिया.’

उन्होंने दावा किया कि हालांकि वृद्धावस्था और बीमारी का हवाला देते हुए रिहाई का आदेश दिया गया है, लेकिन यह व्यापक रूप से ज्ञात है कि अमरमणि बीमार नहीं हैं.

उन्होंने कहा कि उन्हें उत्तर प्रदेश में न्याय की कोई उम्मीद नहीं है.

निधि ने कहा, ‘वर्षों पहले जब हमें उत्तर प्रदेश में न्याय नहीं मिल रहा था, तो हम सुप्रीम कोर्ट गए और मामला उत्तराखंड स्थानांतरित कर दिया गया. यह वर्षों से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में न्याय संभव नहीं होगा.’

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के पास माफी की याचिका आने के कारण त्रिपाठी दंपति को रिहा कर दिया गया है.

2013 में तत्कालीन सपा सरकार ने कहा था कि चूंकि मामला उत्तराखंड स्थानांतरित हो गया है, इसलिए वे इस पर (छूट याचिका) फैसला नहीं कर सकते. उत्तराखंड में भी मामला कई बार राज्यपाल के पास जा चुका है.

उन्होंने कहा, ‘राज्य सरकार (यूपी) जो उन्हें जेल नहीं भेज पाई थी, उन्होंने अब उन्हें रिहा करने का फैसला किया है.’

उन्होंने कहा, ‘पिछले 12 वर्षों में हर 15 दिन में मैंने राज्य सरकार को पत्र लिखा है, जब मुझे यकीन हो गया कि मुझे उत्तर प्रदेश में न्याय नहीं मिलेगा, तब मैं सुप्रीम कोर्ट गई.’

उन्होंने कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री के साथ-साथ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी पत्र लिखा है. उन्होंने कहा, ‘लेकिन मुख्यमंत्री यह भी क्यों नहीं पूछ रहे हैं कि (मीडिया में) किन दस्तावेजों के बारे में बात की जा रही है?’

योगी आदित्यनाथ मेरे अभिभावक: अमरमणि के बेटे

अमरमणि के बेटे अमनमणि त्रिपाठी ने कहा कि उनके माता-पिता के इलाज में सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है.

उन्होंने द वायर को बताया, ‘राज्य सरकार की ओर से कोई दबाव नहीं दिया गया है. एक कानून है और मैं भारतीय संविधान के तहत एक भारतीय नागरिक हूं और मेरे पास अन्य सभी नागरिकों के समान अधिकार हैं. हमारे सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद राज्य सरकार ने अपना फैसला दिया है.’

हालांकि, उन्होंने कहा कि उनके परिवार का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ वर्षों से घनिष्ठ संबंध रहा है.

अमनमणि ने कहा, ‘मैं 2017 में एक निर्दल विधायक रहा हूं, उस समय योगी जी मुख्यमंत्री के रूप में चुने गए थे. इससे पहले वह गोरखपुर से सांसद थे. मेरे आवास और गोरखनाथ मंदिर (जहां आदित्यनाथ मुख्य पुजारी थे) के बीच की दूरी लगभग 500 मीटर है. हमारे बीच बहुत अच्छे संबंध हैं.’

उन्होंने कहा कि वह बचपन से ही मंदिर जाते रहे हैं और उनके पिता और दादा भी वहां जाते रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘जब मेरे माता-पिता जेल में थे तो मुझे पता था कि मेरे पास कोई है जिसके साथ मैं व्यक्तिगत, राजनीतिक और पारिवारिक समस्याएं साझा करता. वह एक अभिभावक की तरह मुझे सलाह देते थे और गोरखपुर मंदिर के कई ऐसे संरक्षक हैं, जो मुझे सलाह देते थे. लेकिन हां, योगी जी मेरे अभिभावक हैं.’

अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी. (फाइल फोटो साभार: फेसबुक)

उन्होंने निधि शुक्ला के आरोपों का खंडन करते हुए कहा, ‘जेल में ही एक अस्पताल है और अगर जेल अस्पताल उनका इलाज करने में सक्षम नहीं है, तो वे उन्हें एक उच्च केंद्र में रेफर कर देते हैं, जो या तो सिविल अस्पताल या जिला अस्पताल होता है. यह कानून है और इसे इसी तरह किया जाता है.’

उन्होंने कहा, ‘अगर कोई व्यक्ति जेल में है और उसका इलाज चल रहा है, तो एक विशिष्ट संगठन होता है, जो हर पहलू को देखता है और निर्णय लेता है. अगर वे ठीक पाए जाते हैं, तो वे उन्हें वापस जेल भेज देते हैं. कोई भी ऐसे ही अस्पताल नहीं जा सकता और वहां रुक नहीं सकता.’

उन्होंने कहा कि रिहाई आदेश के बावजूद उनके माता-पिता गंभीर रूप से बीमार हैं और अस्पताल में भर्ती हैं.

उन्होंने कहा, ‘वे अभी भी अस्पताल में हैं, क्योंकि वे गंभीर रूप से बीमार हैं. मेरे पिता स्पाइनल न्यूरोलॉजिकल समस्या से पीड़ित हैं. वह चलते हैं तो गिर पड़ते हैं. मेरी मां को गंभीर मानसिक समस्याएं हैं.’

हालांकि रिहाई का आदेश त्रिपाठी परिवार और समर्थकों के लिए ‘सपने के सच होने’ कर तरह है.

उन्होंने कहा, ‘यह एक सपने के सच होने जैसा लगता है. हमारे परिवार, समर्थकों और शुभचिंतकों को विश्वास था कि एक दिन हम जीतेंगे और जब हमें उनकी रिहाई के आदेश के बारे में पता चला, तो हम बहुत खुश थे.

अमनमणि ने इन आरोपों का खंडन किया कि उनके माता-पिता की रिहाई का 2024 में आगामी आम चुनाव से कोई लेना-देना है, जहां उनके पिता का राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है.

उन्होंने कहा, ‘अभी हम राजनीति के बारे में नहीं सोच रहे हैं. हम एक परिवार के रूप में इस पल का आनंद उठा रहे हैं.’

उन्होंने कहा कि पिछले 20 साल से वह राजनीति से दूर हैं. उन्होंने अपना आखिरी चुनाव 2007 में जीता था. तब से मैं उनकी सीट से चुनाव लड़ रहा हूं. बीच में कई चुनाव आए और चले गए.

जेल में हजारों कैदी हैं, जिनका आचरण अच्छा है, उन्हें क्यों नहीं रिहा जाता: निधि 

मधुमिता शुक्ला की बहन निधि शुक्ला ने कहा कि अमनमणि त्रिपाठी यह दावा कर सकते हैं कि मुख्यमंत्री के साथ उनके पुराने पारिवारिक संबंध हैं, लेकिन वह महज एक सामान्य नागरिक हैं.

उन्होंने कहा, ‘मैं यह नहीं कह सकता कि मेरे योगी जी के साथ पारिवारिक संबंध हैं क्योंकि मैं नहीं हूं। जैसे वह आम लोगों के लिए मुख्यमंत्री हैं, वैसे ही वह मेरे लिए भी मुख्यमंत्री हैं, लेकिन अमनमणि गर्व से कह रहे हैं कि उनके योगी आदित्यनाथ से पारिवारिक संबंध हैं.’

निधि ने कहा कि अब उनकी एकमात्र मांग यह है कि त्रिपाठी दंपति की रिहाई वापस ली जानी चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘मैं केवल सत्ता में बैठे लोगों से अनुरोध कर सकता हूं कि वे हमें अपने दस्तावेज दिखाने का मौका दें और उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करें, जिन्होंने अपनी रिहाई को मंजूरी दे दी है.’

निधि ने कहा, ‘राज्यपाल (आनंदीबेन पटेल) के पास विशेष शक्तियां हैं. वह दस्तावेजों के दो सेटों का अवलोकन कर सकती हैं, जो राज्य सरकार द्वारा दिए गए हैं और जो मेरे द्वारा भेजे गए हैं. वह अमरमणि की रिहाई पर स्वयं निर्णय ले सकती हैं. मैं दस्तावेज फिर से दिखाने और बिंदु दर बिंदु बहस के लिए भी तैयार हूं.’

उन्होंने कहा, ‘ऐसे हजारों कैदी हैं, जो 80 साल की उम्र में भी वर्षों से जेलों में बंद हैं और उनका आचरण अच्छा है. उन्हें रिहा क्यों नहीं किया जा रहा है?’

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