कोल्हापुर में छात्र सांप्रदायिक भीड़ में तब्दील हो रहे हैं: फैक्ट-फाइंडिंग टीम

महाराष्ट्र में कोल्हापुर के कई शैक्षणिक संस्थानों में हाल ही में सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया है. पुलिस पर उन शिक्षकों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज करने का दबाव है, जो दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी समूहों पर सवाल उठाते हैं. ऐसे कई संगठनों को इस क्षेत्र में मजबूत आधार मिल रहा है, जिससे मुस्लिम समुदाय पर हिंसक हमलों सहित क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा मिला है. 

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

महाराष्ट्र में कोल्हापुर के कई शैक्षणिक संस्थानों में हाल ही में सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया है. पुलिस पर उन शिक्षकों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज करने का दबाव है, जो दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी समूहों पर सवाल उठाते हैं. ऐसे कई संगठनों को इस क्षेत्र में मजबूत आधार मिल रहा है, जिससे मुस्लिम समुदाय पर हिंसक हमलों सहित क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा मिला है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

मुंबई: पश्चिमी महाराष्ट्र के कोल्हापुर और इसके पड़ोसी जिलों में पिछले कुछ महीनों से एक नया ट्रेंड देखा जा रहा है. केवल दो महीनों (जुलाई और अगस्त) में शिक्षकों और स्कूल प्रशासन को भीड़ द्वारा डराने-धमकाने की एक दर्जन से अधिक घटनाएं सामने आ चुकी हैं. लेकिन इससे भी अधिक परेशान करने वाली बात इस ‘भीड़’ की संरचना है.

ज्यादातर मामलों में, ये छात्र ही हैं जो अचानक से खुद को एक भीड़ में तब्दील कर देते हैं. ऐसा एक फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में सामने आया है, जिसे महिला कार्यकर्ताओं के एक समूह ‘वीमेन प्रोटेस्ट फॉर पीस’ (डब्ल्यूपीएफपी) ने तैयार किया है.

लिंग अधिकार कार्यकर्ताओं और शिक्षकों वाले समूह डब्ल्यूपीएफपी ने सांप्रदायिक उपद्रव की बढ़ती प्रवृत्ति को समझने के लिए कोल्हापुर और पड़ोसी जिलों सतारा और सांगली के विभिन्न संस्थानों की यात्रा की. समूह ने इस सप्ताह की शुरुआत में कोल्हापुर जिला कलेक्टर राहुल रेखावार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है.

कोल्हापुर शाहू महाराज (19वीं सदी के राजा जो अपनी प्रगतिशील जाति-विरोधी नीतियों के लिए जाने जाते थे) के समय से ही अपनी जाति-विरोधी विरासत के लिए जाना जाता है, लेकिन हाल के दिनों में यहां सांप्रदायिक तनाव देखा गया है.

कई कट्टरपंथी जातिवादी-हिंदुत्ववादी संगठनों को इस क्षेत्र में मजबूत आधार मिला है, जिससे मुस्लिम समुदाय पर हिंसक हमलों सहित क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा मिला है. हालिया मामला इस साल जून में राजा शिवाजी के राज्याभिषेक दिवस की सालगिरह के जश्न पर देखा गया था.

कुछ ही दिनों के भीतर एक स्थानीय इंजीनिरिंग कॉलेज – गोकुल शिरगांव स्थित कोल्हापुर इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी – में एक महिला प्रोफेसर को छात्रों के एक समूह ने घेर लिया, क्योंकि वह कक्षा में ‘लिंग भेदभाव’ विषय पर चर्चा करने लगी थीं. कथित तौर पर कक्षा में छात्रों के एक समूह द्वारा ‘मुसलमान बलात्कारी हैं’, ‘हिंदू कभी भी किसी भी तरह के दंगों में शामिल नहीं होते’ और ‘बाबरी मस्जिद को सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ध्वस्त कर दिया गया था’ जैसे बयान दिए गए थे.

महिला प्रोफेसर ने हस्तक्षेप किया और छात्रों की गलती को ठीक करने का प्रयास किया. उन्होंने कहा, ‘बलात्कार किसी धर्म या जाति तक सीमित नहीं है. बलात्कारियों का कोई धर्म या जाति नहीं होती. बलात्कार महिलाओं के खिलाफ अपराध का सबसे जघन्य रूप है.’

ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता सुधा पाटिल कोल्हापुर जिला कलेक्टर राहुल रेखावार से शैक्षणिक संस्थानों में डराने-धमकाने के मुद्दे पर बात करती हुईं. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

प्रोफेसर के रुख से चुनौती महसूस कर रहे छात्रों ने उनके व्याख्यान को फिल्माया, उसे संपादित किया और छेड़छाड़ किए गए हिस्सों को सामने रखा, जिससे उनके बयान को हिंदू विरोधी बना दिया गया.

कुछ ही समय में एडिटेड क्लिप वायरल हो गई और कई स्थानीय हिंदुत्व समूह संस्थान आ गए. बिना सोचे-विचारे प्रतिक्रिया देते हुए संस्थान ने फैकल्टी को जबरन छुट्टी पर भेज दिया और बाद में महिला प्रोफेसर से माफी मंगवाने पर जोर दिया.

हालांकि, प्रोफेसर ने माफी मांगने से इनकार कर दिया. इस पर प्रोफेसर को घर से काम करने (वर्क फ्रॉम होम) और केवल अगस्त के अंत में शुरू होने वाले नए शैक्षणिक वर्ष से काम पर आने के लिए कहा गया.

फैक्ट-फाइंडिंग की कवायद का नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों में से एक श्रमिक फाउंडेशन की डॉ. मेघा पानसरे ने कहा कि ज्यादातर मामलों में संस्थान अपने शिक्षकों के खिलाफ डर के कारण कड़ी कार्रवाई कर देते हैं.

उन्होंने कहा, ‘यहां तक कि शिक्षकों की कोई गलती न होने पर भी उनके खिलाफ उपद्रवियों का गुस्सा शांत करने के लिए कार्रवाई कर दी जाती है.’

रिपोर्ट के हिस्से के रूप में टीम द्वारा अध्ययन किए गए 10 से अधिक मामलों में यही व्यवहार साफ तौर पर देखा गया. रिपोर्ट में उल्लिखित ऐसा एक और उदाहरण कोल्हापुर के सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट स्कूल का है. 4 अगस्त को परीक्षा दे रहे एक छात्र ने अपनी उत्तर पुस्तिका पर ‘जय श्री राम’ लिख दिया. सख्त परीक्षा नियम का पालन करते हुए पर्यवेक्षक ने छात्र से कहा कि उत्तर पुस्तिका पर इस तरह के धार्मिक चिह्न की अनुमति नहीं है.

वीमेन प्रोटेस्ट फॉर पीस की सदस्य कोल्हापुर जिला कलेक्टर को फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट सौंपते हुए. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

इससे कथित तौर पर छात्र उत्तेजित हो गया और उसने अन्य छात्रों को अपनी उत्तर पुस्तिकाओं पर इसी तरह के शब्द लिखने के लिए उकसाने का प्रयास किया. कुछ ही समय में छात्र ने स्कूल के बाहर 40-50 और लोगों को जुटा लिया, जो नारे लगाते हुए स्कूल परिसर में घुस गए. पुलिस जल्द ही मौके पर पहुंच गई और एक स्थानीय शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) विधायक ने भी हस्तक्षेप किया.

रिपोर्ट बताती है कि यहां स्कूल प्रबंधन ने शिक्षक के खिलाफ कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की, लेकिन उन्होंने उपद्रवी छात्र के खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं की. उसी स्कूल में एक और घटना की सूचना मिली थी, जहां ईसाई समुदाय से ताल्लुक रखने वाले एक सफाईकर्मी को स्कूल में ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने के लिए दबाव डाला गया.

पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में कई कट्टरपंथी हिंदू संगठन पनपे हैं.

पानसरे बताती हैं कि ये संगठन लोगों को संगठित करने के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से खासकर युवाओं पर मजबूत पकड़ बनाते हैं.

वह कहती हैं, ‘जब जून में कोल्हापुर में दंगे भड़के, तो हिंसा में भाग लेने वाले कई युवा एक-दूसरे को केवल सोशल मीडिया पर जानते थे. वॉट्सऐप पर प्रसारित संदेश एक आह्वान की तरह काम करते हैं.’

इन हिंदू संगठनों की असहिष्णुता स्पष्ट है और कॉलेज एवं जिला प्रशासन दोनों उनके दबाव में आ गए हैं. हाल ही में सतारा के यशवंतराव चव्हाण कॉलेज में एक अतिथि वक्ता ने गोविंद पानसरे की पुस्तक ‘शिवाजी कौन थे?’ (हू वाज़ शिवाजी) के बारे में बात की. पानसरे उन चार तर्कवादियों में से एक हैं, जिनकी कथित तौर पर हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा हत्या कर दी गई थी.

वक्ता ने पुस्तक का शीर्षक शिवाजी के नाम के साथ ‘राजे’ या ‘महाराज’ (मराठी में दोनों का अर्थ राजा) लगाए बिना पढ़ा था और स्थानीय ग्रामीणों ने वक्ता के खिलाफ विरोध जताना शुरू कर दिया था.

स्पीकर के साथ-साथ एक महिला शिक्षक को भी निशाना बनाया गया. जब शिक्षक ने माफी मांगने से इनकार कर दिया, तो स्थानीय पुलिस ने उनके खिलाफ ‘अनुशासनात्मक कार्रवाई’ शुरू करने को कहा. कॉलेज ने महिला शिक्षक के खिलाफ प्रशासन को पत्र भेज दिया है.

वीमेन प्रोटेस्ट फॉर पीस की सदस्य कोल्हापुर जिला कलेक्टर को फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट सौंपते हुए. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

स्कूलों और कॉलेजों में भी सोशल मीडिया के जरिये भीड़ जुटाई जाती है. रिपोर्ट ऐसे कई उदाहरणों को चिह्नित करती है जहां एडिटेड वीडियो तुरंत इन सोशल मीडिया ग्रुप पर प्रसारित किए जाते हैं और कुछ ही समय में वे वायरल हो जाते हैं. जैसा कि कोल्हापुर के हुपारी गांव में चंद्राबाई-शांतप्पा शेंदुरे कॉलेज के मामले में हुआ था.

इस साल जून में वंचित बहुजन अघाड़ी के अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर के औरंगजेब की कब्र पर जाने के तुरंत बाद शेंदुरे कॉलेज के एक लेक्चरर ने सोशल मीडिया पोस्ट लिखकर कहा था कि ‘चूंकि मुसलमानों और दलितों दोनों के साथ अन्याय हो रहा है, इसलिए उन्हें एकजुट होना चाहिए.’

यह पोस्ट ग्रामीणों को पसंद नहीं आई और सोशल मीडिया मंचों पर इसे नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली. लेक्चरर को भीड़ ने घेर लिया और पुलिस पर उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करने का दबाव डाला गया. ग्रामीणों और अन्य हिंदू संगठनों के दबाव पर अंततः उनका तबादला कर दिया गया.

बहरहाल, जिला कलेक्टर को रिपोर्ट सौंपने के लिए 60-70 से अधिक महिलाएं एकत्रित हुई थीं. जिनमें कुछ शिक्षक समूहों का प्रतिनिधित्व करती थीं, कुछ ट्रांस अधिकार कार्यकर्ताओं के रूप में शामिल हुई थीं और कुछ अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित थीं.

समूह ने कलेक्टर से भविष्य में ऐसी घटनाओं के मामले में एक प्रोटोकॉल बनाने का आग्रह किया. पानसरे ने समूह की मांग के बारे में बताते हुए कहा, ‘ऐसे खराब माहौल में यह महत्वपूर्ण है कि शैक्षणिक संस्थानों, शिक्षकों और पुलिस के पास भविष्य में ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए एक स्पष्ट प्रोटोकॉल हो.’

श्रमिक फाउंडेशन के साथ-साथ महिला दक्षता समिति, संग्राम संस्था, अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति, मुस्कान और महाराष्ट्र अल्पसंख्यक ईसाई विकास परिषद जैसे अधिकार संगठनों के सदस्यों ने भी जिला कलेक्टर के साथ चर्चा में भाग लिया.

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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