‘ह्वाइल वी वॉच्ड’ लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़े एक निहत्थे पत्रकार की वेदना है

‘ह्वाइल वी वॉच्ड’ डॉक्यूमेंट्री घने होते अंधेरों की कथा सुनाती है कि कैसे इसके तिलस्म में देश का लोकतांत्रिक ढांचा ढहता जा रहा है और मीडिया ने तमाम बुनियादी मुद्दों और ज़रूरी सवालों की पत्रकारिता से मुंह फेर लिया है.

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'व्हाइल वी वॉच्ड' डॉक्यूमेंट्री का पोस्टर. (साभार: IMDb)

‘ह्वाइल वी वॉच्ड’ डॉक्यूमेंट्री घने होते अंधेरों की कथा सुनाती है कि कैसे इसके तिलस्म में देश का लोकतांत्रिक ढांचा ढहता जा रहा है और मीडिया ने तमाम बुनियादी मुद्दों और ज़रूरी सवालों की पत्रकारिता से मुंह फेर लिया है.

‘ह्वाइल वी वॉच्ड’ डॉक्यूमेंट्री का पोस्टर. (साभार: IMDb)

रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और देश के जाने-माने पत्रकार रवीश कुमार पर केंद्रित डॉक्यूमेंट्री ‘ह्वाइल वी वॉच्ड’ को देखने की पहली तयशुदा और शायद आख़री वजह भी मेरे लिए रवीश ही थे, चाहें तो कह सकते हैं कि मुरीद होने की हद तक मैं उनकी पत्रकारिता और किसी हद तक लेखनी (‘इश्क़ में शहर होना’, ‘बोलना ही है’) का भी प्रशंसक रहा हूं, अब भी हूं. हालांकि, जब इस फ़िल्म से आंखों का रिश्ता क़ायम हुआ तो एहसास हुआ कि हम अपने समय में सियासी तौर पर थोपी गई यातनाओं से गुज़र रहे हैं, एक अजीब सी यातना…, शायद जानी-पहचानी सी, मगर किसी अदृशय नज़रबंदी की अज़िय्यत में मुब्तला – जिसपर रवीश कई बार मुस्कुरा रहे हैं, क़हक़हे लगा रहे हैं, ‘सारे जहां से अच्छा…’ गा रहे हैं, और कई बार बस चुप हैं…,और कई जगहों पर उनकी आंखों के ख़ालीपन में गोया बहुत सारे गुमशुदा और लगातार गुम होते दृश्यों की चुभन को छुपा लेने की कोई थकी हुई ख़्वाहिश अपनी ही उंगली के स्पर्श और ओट में हमारे भीतर भीग जाती है, वहीं उनके गिर्द कुछ जलती हुई और बहती हुई आंखें भी हैं, जिनकी ताब लाए नहीं बनती कि-

ताब लाए ही बनेगी ‘ग़ालिब’
वाक़िया सख़्त है और जान अज़ीज़

कई मानों में इस बेहद डिस्टर्बिंग डॉक्यूमेंट्री को देखते हुए एक तरह के ब्लैक-आउट से भर गया हूं, और बक़ौल शायर कि, ‘आवाज़ मिरी लौट के आती है मुझी तक/ये शहर मिरा काश बयाबां नहीं होता’ की कैफ़ियत से दोचार अपने बेकल मन की खिड़की से बाहर किसी शून्य को निहार रहा हूं.

आख़िर इस डॉक्यूमेंट्री में ऐसा क्या है कि एक ख़ौफ़ का साया भी रेंगता हुआ सा महसूस होता है? असल में ये जो कुछ भी है सबसे पहले एक पत्रकार की मनोदशा को गिरफ़्त में लेने की हुनरमंद कोशिश है, चाहें तो इसे अलग से साहसिक भी कह सकते हैं – जहां न्यूज़-रूम में उसके सहकर्मियों-सहयोगियों के बीच की दुनिया और निजी जीवन में भी सत्ताधारियों के उगले विष और शासकीय द्वेष का अवसाद फैला हुआ है, वहीं मुख्यधारा के मीडिया के रसातल में जाने या रवीश के ही शब्दों में कहें तो ‘गोदी मीडिया’ और सरकारी भोंपू बन जाने की खीज हमारी आंखों में भी उतर आई है.

ये कहानी रात और उसके अंधेरे से शुरू होती है, एक ऐसी रात से जो आम दिनों की तरह किसी शाम के ढलने पर नहीं आती, बल्कि राष्ट्रवाद के झूठे और नक़ली नारों, टेलीविज़न स्क्रीन से चिपकी प्रोपगैंडा मशीनरी के तमाशों और सियासी नफ़रत के बेहंगम शोर-शराबे के गर्भ से पैदा होती है. ये डॉक्यूमेंट्री हमें उसी रात और उसके घने होते अंधेरों की कथा सुनाती है कि कैसे इसके तिलस्म में देश का लोकतांत्रिक ढांचा ढहता जा रहा है और तमाम बुनियादी मुद्दों और ज़रूरी सवालों की पत्रकारिता से मीडिया ने मुंह फेर लिया है.

यूं भी कह सकते हैं कि इस डॉक्यूमेंट्री में हमें एक तरफ़ ‘ज़ीरो टीआरपी’ वाले उस ‘बेबस’ और शायद ‘थके’ हुए एंकर की पत्रकारिता की जद्दोजहद बल्कि कशमकश नज़र आती है जिसे ‘हम लोग’, ‘रवीश की रिपोर्ट’, ‘देस की बात’,‘प्राइम टाइम’ और प्राइम टाइम भी क्या जहां हमने तमाम ज़रूरी मुद्दों के साथ विश्वविद्यालयों की बदहाली के क़िस्सों से लेकर नौकरी सीरीज़ तक में उत्कृष्ट पत्रकारिता के नमूने देखे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ पत्रकारिता और इस पत्रकारिता के ख़िलाफ़ देश में पक्षकारिता की अंधी होड़ को भी इसमें बड़े सलीक़े से चित्रित और संदर्भित किया गया है.

सत्ता और कॉरपोरेट की सांठगांठ या उनके इस प्रायोजित खेल में रवीश के नज़रिये से ‘ह्वाइल वी वॉच्ड’ को अपने ही भीतर चलते हुए और हर दिन निहत्थे कर दिए जाने की क़वायद में किसी किरदार के नित्य पिसते रहने की यंत्रणा कहिए या रेत की तरह ढहती दीवारों से टिकी हुई पत्रकारिता की छत को थाम लेने की कोई कोशिश-  ये डॉक्यूमेंट्री हमें झिंझोड़ देती है.

लगातार ट्रोल्स के निशाने पर रहना, धमकियों को सुनना और टीआरपी के पायदान पर बैठे गला-फाड़ चैनलों के बीच हर दिन ‘नमस्कार, मैं रवीश कुमार…’ से आगे लिखने की तैयारी करने की यातना को इस डॉक्यूमेंट्री में देखना दरअसल उसी अंधकार में आख़िरी सांसें गिन रही ‘रोशनी’ में घुल जाने जैसे किसी बेहद पीड़ादायक अनुभव से गुज़रना भी है.

ये डॉक्यूमेंट्री उन दिनों की कहानी कहती है जब रवीश ने अभी एनडीटीवी से इस्तीफ़ा नहीं दिया था और हर तरह से सरकार की आंखों की किरकिरी बने हुए थे. अब भी बने हुए हैं, लेकिन शायद हुक्मरानों को इस बात की तसल्ली हो कि हमने कम से कम इसका ‘घोंसला’ तो उजाड़ ही दिया. हालांकि, बिजली गिरने के बाद भी जले हुए तिनके की बू बाक़ी रहती है, और जैसा कि रवीश ने कहा था कि थक जाने तक उनके सामने एक खुला आसमान मौजूद है.

बहरहाल, मैंने शुरू में अधिनायकवादी सियासत और तंत्र की तरफ़ से थोपी गई जिन यातनाओं की ओर इशारा करने की कोशिश की है, उनमें गालियों और मौत की धमकियों से इतर संस्थान के साथ-साथ रवीश व्यक्तिगत तौर पर भारत के कई शहरों में एनडीटीवी के स्क्रीन को फ्रीज किए जाने की तकलीफ़ से त्रस्त हैं और उसी वक़्त अपनी बिटिया के साथ हंसते-खेलते और गाते हुए जिस तरह इसमें नज़र आते हैं या अपनी इस नन्ही-सी जान को साइकिल दिलाने के क्रम में अचानक पत्रकारिता के समक्ष इसी राजनीति द्वारा पैदा की जाने वाली एक और चुनौती की वजह से इस मासूम सी ख़्वाहिश को आने वाले कल के वादे पर उठा रखते हैं, तो महसूस होता है कि शायद इस लोकशाही व्यवस्था में बाप-बेटी के हंसने-खेलने के लम्हे भी क़ैद कर लिए गए हैं और अब इसमें बच्चों के खेल-खिलौनों की गुंजाइश तक नहीं बची.

ख़ैर, ये डॉक्यूमेंट्री हमें बताती है कि पत्रकारिता किसी प्रायोजित मत से सम्मत का रिश्ता जोड़ना नहीं, बल्कि जब आपको सुनने वाला कोई न हो तब भी सच बोलना और सच दिखाना ही है.

ऐसे में रवीश जब कई बार शहर में लटके मीडिया के बड़े-बड़े आउटलेट/होर्डिंग-बैनर की चकाचौंध को निहारते हैं या अपने ख़िलाफ़ कहीं कोई बैनर-पोस्टर लटका हुआ पाते हैं तो सहसा ही लगता है कि पत्रकारिता की गुमशुदगी का कोई अदृश्य फ़रमान उनके चेहरे की शिकन पर उग आया है और किसी दिशासूचक की तरह ये हमें बहुत कुछ बता रहा है, शायद ये कि नदी सूख रही है और मरुस्थल आगे है.

मुझे कोई अंदाज़ा नहीं है कि फ़िल्मकार विनय शुक्ला ने इस डॉक्यूमेंट्री को किस जतन और मशक़्क़त से तैयार किया है, लेकिन ये ज़रूर कह सकता हूं कि उन्होंने हर ज़रूरी संदर्भ, मानी-ख़ेज़ इशारे और भाव को कैमरे की भाषा में बड़ी ख़ूबी से उतार दिया है. मैं इसके तकनीकी पक्ष पर ज़्यादा बात नहीं कर सकता, मगर एक दर्शक के तौर पर कहना चाहिए कि किसी आंसू गैस के गोले की तरह ये फ़िल्म आंखों में जल रही है और सांसों में ख़राश अब तक बाक़ी है.

अंत में बस ये कि शायद कई लोगों को ये डॉक्यूमेंट्री रवीश के हौसले और साहस की रुदाद लगे. हां, यहां एक तरह के डर को महसूस करते हुए मुझे भी ये ऐसी ही दास्तान लगती है, लेकिन ये उससे कहीं आगे हमारे समय के भयावह सच पर नंगे पांव बैठकर अपने धैर्य को टटोलने और अपने ही भीतर निरंतर चलने की एक ज़रूरी सरगुज़श्त है.

और वो जो ख़ुद रवीश ने कहा है न कि ‘हर जंग जीतने के लिए नहीं लड़ी जाती, कुछ सिर्फ़ इसलिए लड़ी जाती हैं कि दुनिया को बताया जा सके कि कोई था जो जंग के मैदान में खड़ा था…’. और शायद ‘ह्वाइल वी वॉच्ड’ उसी रणभूमि में लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़े एक निहत्थे पत्रकार की वेदना है.