झारखंड: खाद्य सुरक्षा अधिकार मंच ने कहा- मध्याह्न भोजन योजना में केंद्रीकृत किचन व्यवस्था फेल

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम ज़िले में खाद्य सुरक्षा जन अधिकार मंच की ओर से मध्याह्न भोजन के लिए लागू केंद्रीकृत किचन व्यवस्था पर एक सर्वे किया गया है. सर्वे में कहा गया है कि स्कूल में पहले रसोइये द्वारा तैयार भोजन केंद्रीकृत किचन से मिल रहे भोजन से बेहतर था. वर्तमान व्यवस्था के तहत मिल रहे भोजन की गुणवत्ता और स्वाद अच्छा नहीं होता.

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(प्र​तीका​त्मक फोटो साभार: विकिपीडिया/Ministry of Information & Broadcasting)

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम ज़िले में खाद्य सुरक्षा जन अधिकार मंच की ओर से मध्याह्न भोजन के लिए लागू केंद्रीकृत किचन व्यवस्था पर एक सर्वे किया गया है. सर्वे में कहा गया है कि स्कूल में पहले रसोइये द्वारा तैयार भोजन केंद्रीकृत किचन से मिल रहे भोजन से बेहतर था. वर्तमान व्यवस्था के तहत मिल रहे भोजन की गुणवत्ता और स्वाद अच्छा नहीं होता.

(प्र​तीका​त्मक फोटो साभार: विकिपीडिया/Ministry of Information & Broadcasting)

नई दिल्ली: झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के चार प्रखंडों (सादर, झिंकपानी, खुंटपानी, तांतनगर) के सभी सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन (Mid Day Meal) के लिए लागू केंद्रीकृत किचन व्यवस्था पर खाद्य सुरक्षा जन अधिकार मंच की ओर से एक सर्वे किया गया है.

बीते 17 दिसंबर को जारी इस सर्वे रिपोर्ट में पाया गया है कि बच्चे इस नई व्यवस्था से त्रस्त हैं और पुरानी मध्याह्न भोजन व्यवस्था को पुनः लागू करने की मांग कर रहे हैं.

इसे लेकर मंच की ओर से जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार, चारों प्रखंडों (Blocks) के 370 सरकारी स्कूलों (अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र में हैं) में जनवरी-अप्रैल 2023 से मध्याह्न भोजन में केंद्रीकृत किचन व्यवस्था लागू की गई है.

यह किचन अन्नामृत फाउंडेशन द्वारा चलाया जा रहा है, जो इस्कॉन मंदिर की संस्था है. चाईबासा में केंद्रीकृत किचन की स्थापना टाटा स्टील व जिला प्रशासन के सहयोग से की गई है, जिसमें खाना बनकर गाड़ी के माध्यम से स्कूलों में भेजा जाता है.

केंद्रीकृत किचन से मिल रहे मध्याह्न भोजन की व्यवस्था को समझने के लिए मंच द्वारा सितंबर व नवंबर 2023 में चारों प्रखंडों के 23 पंचायतों के 42 स्कूलों का सर्वे किया गया. इस दौरान छात्रों, शिक्षकों और रसोइयों से विस्तृत चर्चा की गई.

सर्वेक्षण के नतीजे चौकाने वाले हैं. सभी 42 स्कूलों के छात्रों ने कहा कि स्कूल में पहले रसोइये द्वारा तैयार मध्याह्न भोजन केंद्रीकृत किचन से मिल रहे भोजन से बेहतर था.

सर्वे में शामिल 92 प्रतिशत शिक्षकों ने भी कहा कि स्कूलों में ही बन रहे भोजन की गुणवत्ता व स्वाद केंद्रीकृत किचन के भोजन से बेहतर था. 90 प्रतिशत शिक्षकों ने यह भी कहा कि अभी की तुलना में बच्चे पहले ज्यादा खाते थे. अब खराब गुणवत्ता और स्वाद पसंद न आने के कारण बच्चों द्वारा भोजन फेंकना आम बात हो गई है.

सर्वे में शामिल स्कूली बच्चों ने कहा कि केंद्रीकृत किचन के खाने में एक अजीब महक रहती है. स्वाद घर के खाने से बिलकुल अलग होता है. साग कभी नहीं मिलता है. सब्जी में केवल आलू-परवल रहता है, जो कभी-कभी पूरा पकता भी नहीं है. कई बार चावल बासी हो जाता है. दाल पानी जैसी रहती है और कई बार खट्टी भी हो जाती है.

विज्ञप्ति के अनुसार, अधिकांश शिक्षकों और रसोइयों ने भी ऐसी ही टिप्पणियां कीं. उनका कहना था कि चूंकि खाना बिना प्याज, लहसुन और स्थानीय पसंद अनुरूप मसाले के बिना मशीन में बनता है और ताजा नहीं मिलता है, इसलिए स्वाद सही नहीं होता है और जल्दी खराब हो जाता है.

उन्होंने कहा कि गर्मी के मौसम में भोजन (चावल/दाल) अक्सर खराब हो जाते हैं, जिसके कारण बच्चे खा नहीं पा रहे थे.

यह बात भी सामने आई कि केंद्रीकृत किचन व्यवस्था लागू होने के बाद सर्वे में शामिल लगभग एक चौथाई स्कूलों में बच्चों को नियमित रूप से दो अंडा प्रति सप्ताह मिलना बंद हो गया है.

अन्नामृत फाउंडेशन अंडा नहीं देती है. अंडे का पैसा अभी भी स्कूलों को भेजा जाता है. चूंकि अब स्कूलों में भोजन नहीं बनता है और अंडा पकाने के लिए अलग से पैसा नहीं दिया जाता है, इसलिए बच्चों को अंडा नहीं मिल पाता है.

सर्वे से स्पष्ट है कि केंद्रीकृत किचन के कारण बच्चों के सेहत, पोषण व स्कूल आने की इच्छा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. मध्याह्न भोजन में बच्चों को सही पोषणयुक्त भोजन न मिलना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का उल्लंघन भी है.