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साहस के बिना जनतंत्र का बने रहना असंभव है

साधारण लोग सहज रूप से साहसी होते हैं. मज़दूर अपने हक़ के लिए उठ खड़े होते हैं, किसान मोर्चे निकालते हैं, आदिवासी निहत्थे हथियारबंद राज्य के सामने खड़े हो जाते हैं, लेकिन जो भाषा का सजग अभ्यास करने का दावा करते हैं, उनका गला रुंध जाता है. कविता में जनतंत्र स्तंभ की पच्चीसवीं क़िस्त.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)
(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

अब समय पास है
जब हमें सिर झुकाना पड़ेगा,
अभिवादन में नहीं, न प्रार्थना में—
शर्म से :
भले हमारे बोलने से शायद ही फ़र्क पड़ता,
पर हम चुप रहे यह चतुराई है.
हमें कोशिश तो करनी थी.
कि हमारे शोर से चैन की नींद न सो सके आततायी
और उसे गोलियां खानी पड़ें.
हमारे पास जो अंतःकरण था
उसे किसी लोककथा की घटना की तरह
हम किसी पिछले मुक़ाम पर भूल आए हैं
और हमें अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं लगती.
वह पास होता तो हम व्यर्थ ही असहज अनुभव करते.
हम कह भले न रहे हों,
मन ही मन मना रहे हैं
कि वह आततायी बहुत क्रूर न हो,
मन ही मन मना रहे हैं
कि वह आततायी बहुत क्रूर न हो,
हमारी उपेक्षा करे और हमसे बदला लेने की बात भूल जाए,
हमारी उस तक पहुंच तो कभी नहीं हो पाएगी—
पर दूर से हमारे अभिवादन को वह अनदेखा न करे
अपने विरुद के लोकार्पण के समय,
ऐसी अभिलाषा बनी रहेगी.

तब शायद हमें याद आएगा कि हमारे पास
शब्दों का नहीं आत्मविश्वास का अभाव था,
साधनों की नहीं साहस की कमी थी,
हम ऐसे मुक़ाम पर पहुंचेंगे
जब कविता में पछतावे की जगह तक न बचेगी :
बची होगी सिर्फ़ शर्म,
जिसमें हम क़ैद होंगे पर जिसमें
कोई अर्थ या मर्म न होगा.
शर्मसार लोग अक्सर कविता नहीं लिख पाते.

कविताओं पर अपने वक्त की छाप होती है, लेकिन वही उसका महत्त्व तय नहीं करती. फिर भी कुछ कविताओं में उनका समय इस कदर बिंधा होता है कि उसको समझे बिना कविता को समझना कठिन होता है.

अशोक वाजपेयी की यह कविता 2014 में लिखी गई थी. यह साल भारतीय जनतंत्र के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण वर्ष के रूप में देखा जाएगा. इस साल पहली बार भारत ने जानते बूझते हुए एक ऐसे व्यक्ति को अपने नेता के रूप में चुना जिसकी तानाशाही प्रवृत्तियों के बारे में उन सबको पता था जिन्हें जानने वाला माना जाता है. जनतंत्र बहुत कुछ इन जानने वालों के सहारे चलता है. उनका काम ही है राजनीतिक प्रवृत्तियों, घटनाओं और व्यक्तियों के बारे में जानना.

जानना और फिर जनता को अपना जाना हुआ बतलाना. जानने वाला यह समुदाय जब अपना काम बंद कर देता है तो जनतंत्र का क्षरण शुरू हो जाता है. बोलना कई तरह से किया जा सकता है. 2014 में भारत की जनता ने जो फ़ैसला किया उसकी एक वजह यह भी थी कि भारत के लोगों को नरेंद्र मोदी के बारे में वह सब कुछ नहीं बतलाया गया जो उसे जानना चाहिए था ताकि वह सुचिंतित निर्णय कर सकती. ऐसे लोग भी थे जो अपने इस धर्म का निर्वाह कर रहे थे.

जैसे सामाजिक मनोवैज्ञानिक आशिस नंदी ने 2002 में ही यह बतलाया था कि नरेंद्र मोदी में एक फासीवादी नेता के सारे लक्षण पाए जाते हैं. यह निष्कर्ष उन्होंने 2002 से भी 10 साल पहले नरेंद्र मोदी से एक लंबे इंटरव्यू के बाद निकाला था. 2002 में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की शह पर गुजरात में मुसलमानों का जो जनसंहार हुआ उसके बाद आशिस नंदी ने कोई 10 वर्ष पहले नरेंद्र मोदी के बारे में उनकी जो धारणा बनी थी, उसे उन्होंने लोगों को बतलाया.

2014 में भारतीय जनता पार्टी के बहुमत में आने और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद अख़बारवालों ने आशिस नंदी से पूछा कि क्या वे मोदी के बारे में अपनी राय बदलना चाहेंगे, अब जबकि लोगों ने उन्हें अपना नेता चुन लिया है. आशिस नंदी ने उत्तर दिया कि उनकी राय एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक की पेशेवर राय थी, कोई राजनीतिक राय नहीं थी.

आशिस नंदी ने 2008 में गुजरात के विधानसभा चुनाव के बाद, जिसमें नरेंद्र मोदी की भाजपा को फिर से जीत हासिल हुई थी लिखा कि गुजराती मध्य वर्ग को खून का स्वाद लग गया है. यह ख़ुद हिंसा नहीं करता, लेकिन उसकी योजना बनाता है, उसे आयोजित करने के लिए आर्थिक संसाधन देता है और हिंसा का संयोजन करता है. शिक्षा संस्थान हों या मीडिया, सब उसके पास हैं और वे नफ़रत पैदा करने वाले कारख़ाने हैं.

आशिस नंदी को इसकी क़ीमत चुकानी पड़ी. उन्होंने बोलना बंद नहीं किया जैसा 2014 के उनके बयान से ज़ाहिर है लेकिन जो वे कर रहे थे वह अपवाद बन गया.

2002 के बाद गुजरात में और 2014 के बाद पूरे भारत में जाने हुए को बताना ख़तरनाक काम हो गया. बोलना साहस का काम बन गया. और जैसा दिखलाई पड़ा, साहस की समाज में सख़्त कमी थी. लोग जानते थे, लेकिन चुप थे.

साहस का मतलब है पहले इसका पूरा बोध कि किए हुए या बोले हुए की क़ीमत हो सकती है. यह निजी, पारिवारिक या दूसरे प्रसंग में नुक़सानदेह हो सकता है. भारत में ही क्यों, अभी अमेरिका में बोलने के साहस के क़ीमत विश्वविद्यालयों के वे छात्र और अध्यापक चुका रहे हैं जो फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार पर चुप नहीं हैं.

साहस के बिना जनतंत्र का बने रहना असंभव है. क्या यह अपवाद है या नियम, इससे तय होगा कि किस जनतंत्र में कितनी जीवनी शक्ति है. अमेरिका हो या रूस, ईरान हो या इज़रायल, हर जगह जनतंत्र के लिए साहस ऑक्सीजन है. जनता का साहस दिखता है जब वह सड़कों पर होती है. वही उसका बोलना है. जैसा वियतनाम युद्ध या इराक़ पर हमले के वक्त अमेरिका की जनता का युद्ध विरोधी आंदोलन.

जनतंत्र में हमेशा इसका ध्यान रखना होता है कि जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार उसी पर हुकूमत न करने लगे. यह प्रवृत्ति हर समय, हर देश में देखी गई है, देखी जा सकती है. वह ऐसे क़ानून बनाती है जिससे जनता की शक्ति कम हो और उसकी ताक़त बढ़े. अमेरिका में ‘पेट्रियट एक्ट’, भारत में ‘यूएपीए’ जैसे क़ानून जनतांत्रिक सरकारें बनाती हैं. ऐसे कदम उठा सकती है जिससे उसके संसाधन लेकर पूंजीपतियों के हवाले कर दिए जाएं. चुनी हुई सरकारें छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की ज़मीन या वहां की खदानें पूंजीपतियों के हवाले कर रही हैं.

इसलिए यह नियम ही है कि जनतंत्र की प्रक्रियाएं जनता के विरुद्ध ही इस्तेमाल की जाती हैं. फिर जनहित की रक्षा कैसे हो?

वह जनता को सजग करके, उसे उसके अधिकार और उस अधिकार की रक्षा के कर्तव्य की याद दिलाते रहकर ही की जा सकती है. हर जनतांत्रिक सरकार में राजशाही के रुझान मिलते हैं और हर जनता के प्रजा बन जाने की संभावना बनी रहती है. जिस वक्त यह प्रवृत्ति गहरी होती दिखलाई दे, उस वक्त बोलना आवश्यक होता है, उसी वक्त बोलने के मायने हैं.

जनतंत्र में तंत्र पर क़ब्ज़ा करने का सबसे कारगर तरीक़ा जनता को अलग-अलग हितों के समुदायों में विभाजित करके किया जाता है. सरकार ख़ुद को उनमें से एक समूह के हितों की संरक्षक ही तरह पेश करती है ताकि उसके क़ब्ज़े के लिए वह समूह उसकी तरफ़ से लड़े. इस वक्त बोलने वाले का फर्ज बोलने का है. इस वक्त जो चुप्पी साध लेता है, वह अपने पेशे और अपने कर्तव्य के साथ घात करता है.

इसी वक्त साहस की जांच होती है. लेकिन साहस है क्या? डेविड ह्वाइट की काव्य-पंक्तियां देखीं:

‘साहस ज़िंदगी में, दूसरे के जीवन में, एक समुदाय के साथ, एक कार्य में, भविष्य में हमारी हार्दिक भागीदारी का पैमाना है. साहसी होने के लिए कहीं और जाने, कुछ और करने की ज़रूरत नहीं, बल्कि जिन चीज़ों को हम गहराई से महसूस करते हैं उन्हें सिर्फ़ ज़ाहिर करना है और फिर उनके नतीजों की अंतहीन असुरक्षा के साथ जीना है.’

प्रायः हम देखते हैं कि साधारण लोग सहज रूप से साहसी होते हैं. मज़दूर अपने हक़ के लिए उठ खड़े होते हैं, किसान मोर्चे निकालते हैं, आदिवासी निहत्थे हथियारबंद राज्य के सामने खड़े हो जाते हैं, लेकिन जो भाषा का सजग अभ्यास करने का दावा करते हैं, उनका गला रुंध जाता है. तो वह क्या है जो किसानों, मज़दूरों, आदिवासियों, छात्रों के पास है और भाषा के अभ्यासियों के पास जिसकी कमी है? वह है साहस! कविता कहती है,

हमारे पास
शब्दों का नहीं आत्मविश्वास का अभाव था,
साधनों की नहीं साहस की कमी थी,

शब्द होते हैं लेकिन उनसे जान निकल जाती है क्योंकि उन्हें प्राण देने वाले साहस की कमी है. अशोक वाजपेयी के लगभग समकालीन कवि केदारनाथ सिंह की कविता एक दूसरे ढंग से यही बात कहती है:

ठंड से नहीं मरते शब्द
वे मर जाते हैं साहस की कमी से

यह साहस व्यक्तिगत और सामूहिक है. इसका अभ्यास भी रोज़ाना करना पड़ता है. और जब वह एकदम ज़रूरी हो तभी उसका प्रयोग करना पड़ता है. वैसा न करने पर ‘ठंड से नहीं मरते शब्द वे मर जाते हैं साहस की कमी से’

हम ऐसे मुक़ाम पर पहुंचेंगे
जब कविता में पछतावे की जगह तक न बचेगी:
बची होगी सिर्फ़ शर्म,
जिसमें हम क़ैद होंगे पर जिसमें
कोई अर्थ या मर्म न होगा.

जिस भाषा में साहस नहीं है उसमें कोई अर्थ नहीं और न कोई मर्म है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)

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