नई दिल्ली: विदेश मंत्रालय ने लगभग एक दशक से अपने दुभाषिया (इंटरप्रेटर) कैडर में कोई नई भर्ती नहीं की है और अब इस कैडर को पूरी तरह समाप्त किया जा रहा है.
इस कैडर की शुरुआत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुई थी. द हिंदू ने मंत्रालय के सूत्रों के हवाला से लिखा है कि अब इसे समाप्त करने का निर्णय लिया गया क्योंकि मंत्रालय को अनुवाद की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं लग रही थी.
बताया गया है कि अब भारत सरकार दुभाषियों को नियुक्त करने की जगह भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के नए अधिकारियों को ही भाषा प्रशिक्षण का विकल्प उपलब्ध करा रही है.
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के साथ काम करने वाले दुभाषिये
विदेश मंत्रालय के दुभाषिया कैडर ने कई दशकों तक राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विदेशी नेताओं से मुलाकात के दौरान अक्सर दुभाषियों का उपयोग करते हैं. हाल ही में, जब पीएम मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बैठक हुई थी, तब भी दुभाषियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
हालांकि, विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि समय के साथ यह स्पष्ट हो गया कि ‘अधिकांश दुभाषिये केवल शब्दशः अनुवाद कर रहे थे, जबकि सटीक और प्रभावी व्याख्या एक अत्यधिक विशिष्ट कौशल है.’ अब युवा आईएफएस अधिकारियों को विदेशी भाषाओं में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि वे अनुवाद के अतिरिक्त व्याख्या कौशल भी विकसित कर सकें.
आईएफएस में दुभाषिया कैडर की शुरुआत
भारतीय विदेश सेवा की स्थापना अक्टूबर 1946 में अंतरिम सरकार के दौरान हुई थी. शुरुआती वर्षों में इस सेवा में कोई अलग से दुभाषिया कैडर नहीं था. उस समय भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) और अन्य पृष्ठभूमि से आए अधिकारी अपने पूर्व प्रशिक्षण के आधार पर विदेशी भाषा सीखे होते थे.
धीरे-धीरे, विदेश मंत्रालय में एक अनौपचारिक दुभाषिया विभाग विकसित हुआ, जो बाद में एक औपचारिक दुभाषिया कैडर के रूप में स्थापित किया गया. आईएफएस में शामिल होने वाले नए अधिकारियों को संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की प्रतियोगी परीक्षा में कम से कम एक ‘अनिवार्य विदेशी भाषा’ और एक ‘वैकल्पिक भाषा’ सीखने की आवश्यकता थी. इसके अलावा, उनकी मातृभाषा का ज्ञान भी अनिवार्य था.
आईएफएस अधिकारियों के लिए छह चरणों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में एक ‘अनिवार्य विदेशी भाषा’ भी शामिल थी, जिसके तहत उन्हें विदेश में प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता था. लेकिन 1970 के दशक के मध्य तक जब पहले बैच के अधिकारी सेवानिवृत्त होने लगे और वैश्विक परिस्थितियां बदलने लगीं, तब रूसी, अरबी, चीनी और जापानी जैसी भाषाओं के ज्ञान की आवश्यकता महसूस हुई. इस कारण 1970 के दशक के मध्य में दुभाषिया कैडर स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हुई और 1984 में इसके लिए भर्तियां शुरू हुईं.
