‘इस समय हिंदुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली. वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए चुपचाप बैठे हैं या धर्मांधता के बहाव में बह चले हैं. सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है?
लेकिन ऐसे नेता जो सांप्रदायिक आंदोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं. जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं. और सांप्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आई हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे. ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है.’
कुछ नहीं बदला
जून, 1928 में उस वक्त की अनूठी पंजाबी पत्रिका ‘किरती’ के लिए ‘सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ शीर्षक लेख की ये पंक्तियां लिखते हुए भगत सिंह ने (जो महज तीन साल बाद 1931 में 23 मार्च को देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर शहीद-ए-आजम कहलाए) कल्पना तक नहीं की होगी कि उनके इन्हें लिखने के 97 साल बाद पढ़ने पर भी हमें लगेगा कि इस बीच कुछ नहीं बदला और हमारे नेता अभी भी वैसी ही लीद कर रहे हैं और उनको इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि इसके चलते वह आजादी भी (जिसके बारे में उम्मीद की जाती थी कि वह शहीदों के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने का माध्यम बनेगी) देश के ज्यादातर संसाधनों पर काबिज देशी-विदेशी प्रभु वर्गों द्वारा वंचित वर्गों के शोषण का हथियार बनने लगेगी और उन वर्गों को लगने लगेगा कि जैसे गुलामी ही रूप बदल कर सामने आ खड़ी हुई हो.
ज्ञातव्य है कि भगत सिंह उक्त विचार व्यक्त कर रहे थे, तो तत्कालीन गोरी सरकार जलियांवाला बाग नरसंहार से उद्वेलित होकर स्वतंत्रता संघर्ष को नई धार देने में लगे देशवासियों को सांप्रदायिकता के जहर के हवाले करने में कुछ भी उठा नहीं रख रही थी. नतीजा यह था कि कई शहरों में भीषण दंगों का सिलसिला-सा शुरू हो गया था और विदेशी हुक्मरान उन्हें स्वतंत्रता संघर्ष के दमन के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे.
इससे स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी और अहिंसक सारी पातें चिंताकुल हो उठी थीं और अपनी-अपनी तरह से सौहार्द स्थापित करने के नाना प्रयत्न कर रही थीं. इसी सिलसिले में लिखे गए भगत सिंह के उक्त लेख में व्यक्त विचार भी उनके अकेले के न होकर क्रांतिकारी आंदोलन की समूची धारा के थे.
आज की तारीख में उनके आईने में यह देखना बहुत दुखद है कि जहां उक्त आंदोलन द्वारा दिखाई गई राह पूरी तरह भुला दी गई है, वहीं न सिर्फ नेता व सरकारों बल्कि पत्रकारों और नौकरशाहों को भी स्वतंत्र देश की जरूरतों के अनुसार बदलना नहीं ही गवारा हुआ है.
कई निर्वाचित सरकारें और उनके सहयोगी संगठन तो सांप्रदायिक घृणा फैलाने के प्रयत्नों में गुलामी के दौर की गोरी सरकार की ‘बांटो और राज करो’ की नीयत को भी मात किए दे रही हैं.
पत्रकारिता भी नहीं
इसे यों समझ सकते हैं कि भगत सिंह ने अपने उक्त लेख में तत्कालीन पत्रकारिता और पत्रकारों का हाल कुछ यों बयान किया था:
पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था. आज बहुत ही गंदा हो गया है. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं. एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं. ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शांत रहा हो.
इसी लेख में उन्होंने आगे लिखा था:
अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है…. इसके चलते देश की वर्तमान दशा पर विचार करने पर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
कौन कह सकता है कि आज की मीडिया नामधारी पत्रकारिता ने अपने लिए उस वक्त से किंचित भी बेहतर ‘कर्तव्य’ निर्धारित कर रखा है? कई मायनों में तो वह उस वक्त से भी बदतर आचरण करती दिखाई देती है.
उस वक्त नेताओं के साथ पत्रकारों के भी कर्तव्यपथ से विचलित होकर धर्मांधता के प्रवाह में बह जाने का नतीजा, बकौल भगत सिंह, यह हुआ था कि स्वराज्य आंदोलन के जोर के दौरान जिस जनविरोधी व निरंकुश नौकरशाही के अस्तित्व को ऐसा खतरा पैदा हो गया था कि लगता था कि वह आज गई या कल गई, उसने अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर ली थीं कि उसे हिलाना भी कोई मामूली काम नहीं रह गया था.
निस्संदेह, भगत सिंह हमारे बीच होते तो यह स्थिति देखकर कतई खुश नहीं होते, लेकिन हम खुश हो सकते हैं कि वे अपने वक्त में ही इस निष्कर्ष पर पहुंच गए थे कि सांप्रदायिकता आर्थिक कारणों, दूसरे शब्दों में कहें तो आर्थिक तनावों, के कारण ही रक्तबीज हो गई है और देश की आर्थिक दशा सुधारने, साथ ही देशवासियों में वर्ग चेतना लाने से ही उसका इलाज हो सकता है.
वर्गचेतना भी नहीं
भगत सिंह के अनुसार:
लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है. गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं. इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए. संसार के सभी गरीबों के चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं.
इसलिए वे चाहते थे कि सारे गरीब धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेद मिटाकर एकजुट हो जाएं और सरकार की ताकत अपने हाथों में लेने के प्रयत्न करें. इससे किसी दिन उनकी जंजीरें कट जाएंगी और उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिल जाएगी.
उन्होंने इस विडंबना की ओर भी ध्यान खींचा था कि उस वक्त देश के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब थी कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता था. साथ ही दु:ख जताया था कि उस वक्त वांछित दिशा में आर्थिक सुधार अत्यंत कठिन था क्योंकि विदेशी सरकार लोगों की स्थिति सुधारने में दिलचस्पी नहीं ले रही थी. अतएव उन्होंने आह्वान किया था कि देशवासी हाथ धोकर उस सरकार के पीछे पड़ जाएं और जब तक वह बदल न जाये, चैन की सांस न लें.
लेकिन उन हालात का आज़ादी के पचहत्तर साल बाद के हालात से मिलान करें तो हम क्या पाते हैं? गरीबी और गैरबराबरी जाने को तैयार नहीं हैं तो वर्ग चेतना अभी भी दिवास्वप्न बनी हुई है. सरकारें हैं कि इसकी शर्म तक महसूस करने को तैयार नहीं है.
तब भगत सिंह ने उम्मीद जताई थी कि भारत के सच्चे हमदर्द उनके बताए इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का उस समय जो आत्मघात हो रहा था, उससे बचा लेंगे. आज हम यह तो नहीं कह सकते कि वे सच्चे हमदर्द बचे ही नहीं हैं, लेकिन हम देख रहे हैं कि उन्हें इस कदर असहाय व निरुपाय बना दिया गया है कि उनकी कहीं कोई भूमिका ही नजर नहीं आती.
जहां तक भगत सिंह की शहादत के मूल्यों की बात है, उनको तिरस्कृत व कलंकित करने के प्रयास तो शहादत के फौरन बाद से ही शुरू कर दिए गये थे. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से उनके क्रांतिकारी जीवन का बहुत गहरा नाता था और उसके दैनिक ‘प्रताप’ के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी के सानिध्य में ढाई साल तक बलवंत सिंह के छद्मनाम से संपादन व लेखन जैसे काम करते हुए उन्होंने समझा था कि विचारों की ताकत हथियारों की ताकत से बड़ी होती है और उसके बल पर बहुत कुछ किया और बदला जा सकता है. उनकी यही समझदारी बाद में उनके इस बयान के रूप में सामने आई थी कि क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और बम व पिस्तौल क्रांति नहीं लाते.
लेकिन कानपुर को उनकी शहादत के वक्त ही भीषण दंगों की आग में झोंक दिया गया था. हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मांध शक्तियों द्वारा गोरी हुकूमत से मिलीभगत कर लगाई गई इस आग से, और तो और, गणेशशंकर विद्यार्थी भी नहीं बच पाए थे.
शहादत के तुरंत बाद
यह गणेशशंकर विद्यार्थी ही थे, जिन्होंने कानपुर में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त और निजात कुमार सिन्हा की मुलाकात करायी थी. भगत सिंह ने अपने परिजनों के शादी कर लेने के दबाव से नाराज होकर अपना घर छोड़ा तो विद्यार्थी जी के पास आकर कानपुर को अपनी कर्मभूमि बना लिया था. स्वाभाविक ही था कि सुखदेव व राजगुरु के साथ उनकी शहादत के बाद इस कर्मभूमि के उद्वेलित लोग गोरी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल देते. लेकिन जैसे ही उन्होंने यह मोर्चा खोला, दुश्मन धर्मांध शक्तियां मिलकर उसके आड़े आने लगी.
जानकार बताते हैं कि अंग्रेज कलेक्टर जार्ज बेली ने देखा कि कर्फ्यू लगाने के बावजूद हालात नियंत्रण में नहीं आ रहे तो उसने अपनी सीआईडी को हिंदुओं व मुस्लिमों को आपस में भिड़ा देने के षड्यंत्र रचने को कह दिया. उसके कहे मुताबिक सीआईडी ने परेड चौराहे पर गाय काटे जाने की अफवाह फैला दी तो अंग्रेजपरस्त धर्मांधों ने दोनों समुदायों को एक दूसरे की जान का दुश्मन बना देने में कतई देर नहीं की.
जानकार यह भी बताते हैं कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत के बाद कांग्रेस ने 24 मार्च को एक दिन की आम हड़ताल का आह्वान किया तो कुछ दुकानदारों द्वारा अपनी दुकानें बंद न करने को लेकर विवाद बढ़ा और उसने देखते ही देखते सांप्रदायिक रंग ले लिया .
इससे ब्रिटिश सत्ताधीशों को बेमांगी मुराद मिल गई और उन्होंने दंगे रोकने के लिए कोई गंभीर प्रयास करना गवारा नहीं किया. फिर तो कानपुर शहर लगातार कई दिनों तक दंगों से जूझता रहा.
उसका यह जूझना इस बात का ऐलान-सा था कि धर्मांध शक्तियों को न भगत सिंह के जीवन से कुछ सीखना गवारा है, न विचारों से और न शहादत से. आज की तारीख में इस सिलसिले में हम जो कुछ भी देख रहे हैं, यकीनन, वह उसी ‘हम नहीं सुधरेंगे’ का चरम पर पहुंच जाना है. ऐसे में उनके अरमानों को मंजिल भला कैसे मिल सकती है? उनकी दिशा में तो अब कहीं कोई यात्रा ही नहीं दिखाई देती.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
