कुछ लेखकों-बुद्धिजीवियों, निरपराधों की हत्या के बाद लगभग दस वर्ष पहले लगभग साठ लेखकों ने देश की बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में साहित्य अकादमी और अन्य राज्यों की अकादमियों द्वारा उन्हें दिए गए पुरस्कार लौटाए थे. उनके समर्थन में लगभग चार सौ कलाकारों-कलाविदों ने, लगभग पांच सौ वैज्ञानिकों ने भी देश में बढ़ती असहिष्णुता का विरोध किया था. तबके राष्ट्रपति, रिजर्व बैंक के गवर्नर और एक प्रमुख उद्योगपति ने अपने सार्वजनिक वक्तव्यों में असहिष्णुता के विस्तार और उससे विकास और समाज को होनेवाली हानि का ज़िक्र किया था.
चूंकि इस ‘अवॉर्ड वापसी’ को हुए एक दशक होने जा रहा है, यह उचित होगा कि इसका विशद विश्लेषण और आकलन किया जाए कि अब हम समाज, लोकतंत्र, सत्ता और राजनीति में असहिष्णुता के मामले में कहां हैं.
इस मुक़ाम पर यह तो ज़ाहिर है कि इस बीच असहिष्णुता को झूठ-घृणा-हिंसा के लगातार फैलाव ने, मीडिया के एक बड़े हिस्से ने अपनी निर्लज्ज सत्ता-भक्ति में, हिंदू-मुसलमान के बीच भेदभाव बढ़ाते हिंदुत्व ने कई गुना पोसा-बढ़ाया-फैलाया है. यह निरी अटकल नहीं है अगर मोटा अंदाज़ लगाते हुए यह कहा जाए कि इस एक दशक में असहिष्णुता कम से कम दस गुना बढ़ी और गहरायी है. वह समाज के अन्य हलकों, शैक्षणिक और अन्य संस्थाओं में भी बहुत फैल गई है.
इसकी विवेचना तथ्यपरक ढंग से होना बाक़ी है कि यह असहिष्णुता सामाजिक समरसता को खंडित करने के साथ-साथ कैसे विषमता, बेरोज़गारी, भुखमरी आदि बढ़ा रही है. शिक्षा के स्तर में जो लगातार गिरावट आ रही है, उसमें कम से कम एक कारक तत्व यह असहिष्णुता है. असहिष्णुता वितान इतना समावेशी हो गया है कि अब उसमें ज्ञान-सत्य-अध्यात्म सभी के प्रति असहिष्णुता विकसित हो रही है. विश्वविद्यालय ज्ञान के ज्योतित केंद्र नहीं, अज्ञान के अंधेरे द्वीप में बदल रहे हैं.
जिन लेखकों ने अपने पुरस्कार वापस किए थे, वे कोई बाक़ायदा गठित समूह नहीं थे, वे आपस में परिचित भी नहीं थे और न ही उन्होंने पुरस्कार लौटाने का निर्णय किसी से सलाह-मशविरा करके लिया था. जो कुछ हुआ स्वतःस्फूर्त था. वे बढ़ी असहिष्णुता को लेकर बेचैन थे. यह और बात है कि फिर उन्हें सत्ता के सर्वोच्च स्तर से एक गैंग क़रार दिया गया.
यह पता करना दिलचस्प होगा कि पुरस्कार वापसी के बाद वे उसी असहिष्णुता के लगातार भयावह विस्तार के दौरान क्या करते-बोलते-लिखते रहे हैं. उनमें से कुछ दुर्भाग्य से इस बीच दिवंगत हुए, पर बाक़ी तो हैं. एकाध घटना यह याद है कि किसी हिंदी लेखक ने पुरस्कार लौटाने के अपने निर्णय को बदलकर पुरस्कार नहीं, उसे लौटाने के निर्णय को ही वापस ले लिया था.
यह भी स्पष्ट रहा है कि बहुसंख्यक लेखकों ने पुरस्कार भले न लौटाए हों वे असहिष्णुता के विस्तार से चिंतित और बेचैन थे. इस बीच इन लेखकों ने इस मुद्दे पर कुछ किया-लिखा है?
विश्व कविता
हिंदी कविता संसार में विश्व कविता से परिचय की शुरूआत की लगभग एक शताब्दी बीत चुकी है. 1940 के बाद ऐसे अनेक हिंदी कवि हुए हैं जिन्होंने अपनी कविता के अलावा विदेशी कविता का भी, अधिकांशतः अंग्रेज़ी से, अनुवाद किया है. उनकी सूची लंबी है जिनमें अज्ञेय, बच्चन, दिनकर, शमशेर, धर्मवीर भारती, कुंवर नारायण, श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, कमलेश, रमेशचन्द्र शाह, सोमदत्त, विष्णु खरे, अरुण कमल, अशोक पांडे, सुरेश सलिल, केदारनाथ सिंह, गिरधर राठी, प्रयाग शुक्ल, असद जै़दी, मंगलेश डबराल, उदयन वाजपेयी, तेजी ग्रोवर, गगन गिल आदि शामिल हैं.
भारत में शायद हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जिसमें कवि वंशी माहेश्वरी के संपादन में एक पत्रिका ‘तनाव’ निकलती है जो लगभग चार दशकों से विश्व कविता के हिंदी अनुवाद पर एकाग्र है. कुछ वर्ष पहले संभावना प्रकाशन से, रज़ा पुस्तकमाला के अंतर्गत, ‘तनाव’ में प्रकाशित 105 कवियों के हिंदी अनुवाद का एक बृहत् संचयन तीन ज़िल्दों में ‘दरवाज़े में कोई चाबी नहीं’, ‘प्यास से मरती एक नदी’, ‘सूखी नदी पर ख़ाली नाव’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है, वंशी माहेश्वरी के संपादन में ही.
यह सब याद आया जब हाल ही में नई दिल्ली में एक आयोजन में जादवपुर विश्वविद्यालय प्रेस से प्रकाशित अनुवाद में विश्व कविता का एक बड़ा संचयन अंग्रेज़ी में ‘दि ड्रैगन्स हार्ट’ का लोकार्पण हुआ. संपादन किया है प्रिया सरूकाई छाबड़िया और मृणालिनी हरचन्दराय ने और उसमें भारतीय और विदेशी मिलाकर 68 कवियों के अनुवाद हैं जो 33 भाषाओं से आते हैं. यह संचयन कविता की एक सुप्रतिष्ठित पत्रिका ‘पोएट्री एट संगम’ से चुने गए हैं जिसके त्रैमासिक अंकों को 2018 से 2023 तक रज़ा फाउंडेशन से वित्तीय समर्थन मिला.
भारत के संबंध में देखें तो दो बड़ी घटनाएं अनुवाद के कारण ही संभव हुईं: उपनिषदों और कबीर का विश्व-प्रवेश. दारा शिकोह ने उपनिषदों का फ़ारसी अनुवाद किया था जिसकी एक प्रति एक फ्रेंच यात्री अपने साथ पेरिस ले गया. वहां पहले इसका अनुवाद फ़ारसी से फ्रेंच में और बाद में लैटिन में हुआ. यह लैटिन अनुवाद जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर ने पढ़ा और उपनिषदों के गहन आध्यात्मिक चिंतन में उसकी दिलचस्पी हुई. इस दिलचस्पी के कारण यूरोप की कई भाषाओं में अनुवाद और व्याख्याएं हुईं.
इससे पहले उपनिषद् विश्व-अज्ञात थे. इसी तरह कबीर की सौ कविताओं का रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेज़ी में अनुवाद किया जो 1914 में लंदन में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ. इस अनुवाद के बाद यूरोप की कई भाषाओं में कबीर के अनुवाद हुए. इससे पहले कबीर विश्व-अज्ञात थे.
पहले यह धारणा बड़ी लोकप्रिय हो गई थी कि ‘कविता वह है जो अनुवाद में खो जाती है’. आक्तावियो पाज़ ने इसके बरक़्स यह कहा कि ‘कविता वह है जो अनुवाद के बाद भी जीवित रहती है’. पाज़ ने यह भी कहा कि बीसवीं शताब्दी मनुष्य के इतिहास में अनुवाद की सबसे बड़ी शताब्दी रही है: उसमें न सिर्फ़ साहित्य, ज्ञान, दर्शन, सूचना आदि के विश्वव्यापी अनुवाद हुए हैं पर भोजन-पोशाक-जीवनशैली-व्यवहार आदि के अनुवाद भी होते रहे हैं. आज तो यह और भी स्पष्ट है कि हम एक अनूदित संसार में रहते हैं.
हिंदी में विश्व कविता के तीन और संचयन याद आते हैं. पहला धर्मवीर भारती का ‘देशान्तर’, जो 1960 के करीब निकला था. दूसरा ‘पुनर्वसु’, जो भारत भवन द्वारा आयोजित विश्व कविता समारोह के अवसर पर प्रकाशित हुआ था. तीसरा ‘रोशनी की खिड़कियां’, जो सुरेश सलिल द्वारा बीसवीं शताब्दी की विश्व कविता का बृहत् संचयन है.
यह भी नोट करने की बात है कि विश्व कविता के अनुवाद में दिलचस्पी भारत के अंग्रेज़ी जगत् में देर से जागी है जबकि हिंदी और अन्य कई भाषाओं जैसे मलयालम, बांग्ला, मराठी, गुजराती आदि में विश्व कविता की उपस्थिति, बोध और अनुवाद की लगभग एक सदी हो गई है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
