रचनाकार का समय: ‘आज बौद्धिक और रचनात्मक आंदोलन की ज़रूरत है’

हिंदी भाषी समाज देश का सबसे बड़ा भाषाई समाज है. लेकिन उसका साहित्य से जीवंत संबंध कभी न बन सका. वह रामचरितमानस और हनुमान चालीसा से आगे न जा सका. फिल्में ही उसके मनोरंजन का जरिया बनी रहीं. रचनाकार का समय में पढ़िए आलोचक जवरीमल्ल पारख को.

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जवरीमल्ल पारख (फोटो साभार: फेसबुक/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

जैसा कि सभी के साथ होता है, जो दुनिया हमें बचपन में मिलती है, युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते वह दुनिया वैसी नहीं रहती जैसी बचपन में थी. कुछ दुनिया बदल जाती है, कुछ हमारा देखने का नज़रिया बदल जाता है. उम्र के साथ-साथ दुनिया भी बदलती जाती है और हमारा दुनिया को देखने का नज़रिया भी. युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते यह एहसास होने लगता है कि इस दुनिया को बदलने की ज़रूरत है. बीस साल की उम्र तक यह एहसास होने लगा कि यह वह दुनिया नहीं है, जिसका सपना आज़ादी की लड़ाई के दौरान देखा गया था.

वह सपना उन लेखकों और कलाकारों ने भी देखा था, जो चाहते थे कि देश न केवल आज़ाद हो बल्कि हर तरह की गैरबराबरी, शोषण और उत्पीड़न खत्म हो. घर की चारदीवारी में अपनी पूरी ज़िंदगी गुजारती कई तरह के बंधनों में कैद औरतें, छुआछूत और ऊंच-नीच की भयावह दीवारें और भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा और अभावों में ही संतुष्ट रहने वाली अधिसंख्य आबादी. लेकिन इस विशाल देश को एक साथ लेकर चलने की, सबको इस बात का एहसास कराने की कि यह देश सभी का है और प्रगति में सबकी हिस्सेदारी भी होगी, इसकी कोशिशें आज़ादी के साथ शुरू हो चुकी थीं. जो संविधान बनाया गया, वह उन्हीं सपनों को साकार करने का एक अमूल्य दस्तावेज था. लेकिन काग़जों पर लिखना आसान था, उन्हें व्यवहार में उतारना मुश्किल था.

इरादा बराबरी का समाज बनाने का था लेकिन अमीरों को और अधिक अमीर बनने की आज़ादी भी दे दी गई थी. इस आज़ादी ने गैरबराबरी को न कम किया न कमज़ोर. वह मुश्किल इसलिए भी था कि वे ताकतें चुप-सी तो हो गई थीं जिनके हाथों महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, लेकिन उन्होंने अपने न इरादे बदले थे और न ही अपना लक्ष्य. लेकिन उनकी चुप्पी और बाहरी तौर पर दिखने वाली निष्क्रियता ने उन प्रगतिशील ताकतों को भी लंबे समय तक इस भ्रम में रखा कि वे कमज़ोर हो चुके हैं और लोकतंत्र, धर्मनिर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के मूल्य भारतीय समाज में बहुत गहरे तक जा चुके हैं. रचनाकार और बुद्धिजीवी भी इसी भ्रम के शिकार हुए.

आपातकाल के अनुभव ने उन्हें ये तो बताया कि लोकतंत्र को जितना सुरक्षित समझा जा रहा था वैसा है नहीं, लेकिन हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य को जिनसे वास्तविक खतरा था, उन्हें ही लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में सहभागी बना लिया गया. नतीजतन आपातकाल का एक दशक बीतते-बीतते प्रतिगामी सांप्रदायिक ताकतों ने बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि आंदोलन के द्वारा बहुसंख्यक हिंदू जनता को लामबंद करना शुरू कर दिया. इस लामबंदी ने सबसे बड़े अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को उसी तरह निशाने पर लेना शुरू कर दिया जैसा हिटलर के राज में यहूदियों को लिया गया था. लोग अपने ही पड़ोसी को शंका और संदेह की दृष्टि से देखने लगे. उन्हें देश का सबसे बड़ा दुश्मन समझने लगे.

इस सांप्रदायिक ज़हर ने बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक ताकतों को राजसत्ता के शिखर पर पहुंचा दिया. आज सत्ता पर बैठी ताकतें वे हैं जिन्होंने संविधान की जगह हमेशा मनुस्मृति को तरजीह दी. वे केवल बहुसंख्यकवादी ही नहीं है, ब्राह्मणवादी भी हैं. उनके हिंदू राष्ट्र का अर्थ धार्मिक अल्पसंख्यकों को संविधान में मिली बराबरी के अधिकार से वंचित कर दोयम दर्जे का नागरिक बनाना ही नहीं है, उनके हिंदू राष्ट्र में सभी हिंदू भी बराबर नहीं होंगे. वह एक सवर्णपरस्त हिंदू राष्ट्र होगा जहां दलित भी दोयम दर्जे के नागरिक से ज़्यादा कुछ नहीं होंगे.

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जो देश हमें मिला था विभाजन के बावजूद उसमें एक दूसरे के प्रति वैसी नफ़रत और अविश्वास नहीं था, जैसी आज हर तरफ देखने को मिल रही है. हां, उस पुरानी दुनिया में बहुत कुछ ऐसा था जिन्हें खत्म होना चाहिए था. गरीबी खत्म होनी चाहिए थी, गैर बराबरी खत्म होनी चाहिए थी, जातिवाद और हर तरह की ऊंच-नीच की भावना खत्म होनी चाहिए थी. औरतों को कई तरह की जंजीरों से आज़ाद होना चाहिए था. सबको शिक्षा और सबको काम मिलना चाहिए था. इनमें से कुछ काम हुए भी, कुछ आधे-अधूरे ढंग से हुए. साहित्य ने जैसी भी दुनिया उनके आसपास थी, उसे अपने अंतर्विरोधों और विरोधाभासों के साथ व्यक्त किया. यथार्थ को यथार्थ की तरह पेश किया और उस भावी दुनिया का स्वप्न भी जिसे अभी साकार होना था. लेकिन इस उम्मीद के साथ कि किसी दिन वह स्वप्न जरूर साकार होगा.

जिस परिवार का मैं सदस्य था वह धार्मिक और सामाजिक रूप से रूढ़िवादी था. लेकिन आज की तरह अन्य समुदायों के प्रति नफ़रत से नहीं भरा था. जिस मोहल्ले में रहता था, वहां मुसलमान ज़्यादा रहते थे. जिस स्कूल में पढ़ता था वह आर्य समाजियों का था. घर-परिवार के लोग कट्टर जनसंघी नहीं थे लेकिन वोट जनसंघ को ही देते थे क्योंकि वे मानते थे कि भारतीय जनसंघ हिंदुओं की पार्टी है. लेकिन कभी-कभार कांग्रेस को भी वोट दे देते थे. पाठ्यपुस्तकों और धार्मिक पुस्तकों के अलावा कुछ भी पढ़ने की परंपरा नहीं थी. घर में अख़बार भी नहीं आता था. ऐसे घर में मुझे पढ़ने का शौक लग गया.

घर से लगभग एक किलोमीटर दूर पब्लिक पार्क में बच्चों की लाइब्रेरी थी. अपने एक पड़ोसी मित्र के साथ संभवतः पांचवी-छठी कक्षा में सदस्य बना. पाठ्यक्रमों से बाहर किताबों की नई दुनिया बन गई. पहले बच्चों का साहित्य, फिर कुछ मनोरंजक और लोकप्रिय साहित्य और नौवीं-दसवीं तक आते-आते प्रेमचंद, शरतचंद्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर और फिर देश-विदेश का साहित्य जो भी हिंदी में उपलब्ध हुआ उसे पढ़ता चला गया. एक बड़ी-सी सार्वजनिक लाइब्रेरी का सदस्य बना और इसी पढ़ने के क्रम में ही कब दर्शनशास्त्र, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, राजनीति विज्ञान की किताबें भी पढ़ना अच्छा लगने लगा.

जो पढ़ता उस पर अपने छोटे भाइयों और दोस्तों से बहस भी करता. और ऐसा करते-करते कई चीज़ें पीछे छूटने लगीं. पिता के अनुकरण में किया जाने वाला पूजा-पाठ खत्म हुआ. आस्तिक से नास्तिक हुआ. पहले हिंदू वैष्णव, फिर आर्यसमाजी और बाद में समाजवादियों के प्रभाव में भी आया. विचार की यह सारी यात्रा 20-21 साल तक पूरी हो गई और अंतिम पड़ाव मार्क्सवाद में दिखाई दिया. धीरे-धीरे समझ आने लगा कि हम सबका सबसे बड़ा शत्रु पूंजीवाद है और उसका सरगना साम्राज्यवाद है. कांग्रेस है तो पूंजीवाद है और अमेरिका है तो साम्राज्यवाद. कांग्रेस के कमज़ोर पड़ने से पूंजीवाद कमज़ोर होगा और अमेरिका के कमज़ोर होने से साम्राज्यवाद. सर्वहारा क्रांति से ही इन दोनों से मुक्ति मिलेगी.

लेकिन क्रांति जब तक नहीं होती तब तक के लिए कांग्रेस-विरोधी एक बड़ा गठजोड़ जरूरी था. और ऐसा एक गठजोड़ बना भी. इस गठजोड़ ने अंततः कांग्रेस को कमज़ोर किया, वाम दलों को लगभग खात्मे के कगार पर ला खड़ा किया और जो जनता का वास्तविक शत्रु था, सांप्रदायिक फासीवाद का प्रतिनिधि आरएसएस, वह मजबूत होता चला गया क्योंकि कांग्रेस विरोधी मुहिम में वह भी एक सहयात्री था. वामपंथ ने आरएसएस की पहचान तो सही-सही कर ली थी, लेकिन उसे कभी ऐसे ख़तरे के रूप में नहीं देखा गया जिसके विरुद्ध वैचारिक और सांगठानिक रूप से लगातार तैयारी की ज़रूरत हो.

पिता की इच्छा थी इंजीनियर बनाने की लेकिन साहित्य के प्रति लगाव ने साहित्य का विद्यार्थी बनाया, फिर अध्यापक बना. लेखन में रूचि जग चुकी थी. कविताएं लिखीं, कहानियां भी और एक उपन्यास भी. लेकिन प्रकाशन से पहले ही एहसास हो गया कि रचनात्मक लेखन मेरा क्षेत्र नहीं है. आलोचना ही वह क्षेत्र है जिसे अपनी सीमित क्षमताओं के साथ किया जा सकता है.

पच्चीस साल की उम्र में आलोचना लिखना शुरू किया. तीस साल की उम्र में मीडिया और सिनेमा पर लेखन की शुरुआत की. लेखन ही बदलाव का साधन था और लेखन ही राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता का माध्यम. फिर भी थोड़ा-बहुत अवसर मिलने पर किसानों, मज़दूरों और अध्यापकों के बीच भी काम किया. स्वतंत्रता प्राप्ति के शुरुआती चार दशकों तक जनता के जिस मुख्य शत्रु की ओर से आंखें मूंदे रखी गईं, साहित्य भी कमोबेश उसकी ओर पीठ किए रहा.

साहित्य में किसान थे, मज़दूर थे, मध्यवर्ग था, उनकी चिंताएं थीं, उनके हर तरह के सुख-दुख थे. साथ ही बदलाव की तीव्र इच्छा भी थी. गैरबराबरी को खत्म करने और एक समतावादी समाज बनाने के स्वप्न थे. हो रहे बदलावों ने दलितों और महिलाओं को भी साहित्य के माध्यम से अपनी बात कहने का साहस दिया और वे आंदोलन भी बन सके. लेकिन बिल्कुल बगल में बैठा हुआ वह फासीवादी संगठन नज़र नहीं आ रहा था, जिसकी शाखाएं नियमित रूप से आसपास के पार्कों में और स्कूलों में लग रही थीं. जो युवा होती कई पीढ़ियों के मानस को अपनी जहरीली विचारधारा द्वारा विषाक्त बनाते जा रहे थे.

जवरीमल्ल पारख की पुस्तकें. (साभार: संबंधित प्रकाशन)

प्रेमचंद ने कभी लिखा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है लेकिन आज़ादी के बाद का साहित्य या तो राजनीति का पिछलग्गू बना रहा या राजनीति को त्याज्य समझकर मध्यवर्ग की आत्मग्रस्त दुनिया की जुगाली करता रहा. हिंदी भाषी समाज जो देश का सबसे बड़ा भाषाई समाज है, उसका साहित्य से जीवंत संबंध कभी न बन सका. वह रामचरितमानस और हनुमान चालीसा से आगे न जा सका, और फिल्में उसके मनोरंजन का जरिया बनी रहीं. अच्छी बात यह थी कि हिंदी सिनेमा ने जिस मिली-जुली संस्कृति को हमेशा प्रोत्साहित किया उसने हिंदी समाज को काफी हद तक सांप्रदायिकता के दलदल में धंसने से रोके रखा.

यह महज संयोग नहीं है कि मौजूदा सत्ता के निशाने पर हिंदी सिनेमा तो है लेकिन हिंदी साहित्य नहीं है. उनसे उनको कोई डर नहीं है क्योंकि उन्हें मालूम है कि साहित्य या तो वे पढ़ते हैं, जो रचते हैं या जो साहित्य के विद्यार्थी हैं और जिनकी मजबूरी है साहित्य पढ़ना. प्रेमचंद, यशपाल, मुक्तिबोध को पाठ्यक्रमों में पढ़कर भी हिंदी का विद्यार्थी और अध्यापक उस पिछड़ी मानसिकता से ग्रस्त रहता है, जो उसे अपने घर-परिवार से विरासत में मिलती है. इस मानसिकता से लड़ने वाला साहित्य बहुत-बहुत कम लिखा गया. साहित्य में क्रांति का उद्घोष तो था लेकिन भ्रमों और भ्रांतियों से लड़ने वाला साहित्य हाशिये से आगे नहीं बढ़ पाया.

आज़ादी की लड़ाई के दौरान प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा ने जनता को एकजुट करने और जन आंदोलनों को ताकत देने में अहम भूमिका निभाई थी. आज़ादी के बाद में बदली हुई परिस्थितियों के अनुकूल अपने को न ढाल पाने के कारण धीरे धीरे वह हाशिये पर चला गया. इसलिए जब आपातकाल के दौरान उसकी भूमिका से लेखकों का बड़ा समूह सहमत नहीं हुआ तो आपातकाल के बाद जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जैसे नए लेखक संगठन अस्तित्व में आए. बाद में जब दलित साहित्य आंदोलन मजबूत हुआ तो दलित लेखक संघ भी अस्तित्व में आया.

लेखकों के इतने प्रगतिशील और जनवादी लेखक संगठन होने के बावजूद मौजूदा चुनौती के लिए जिस तरह की सामूहिक और संगठित गतिविधियां होनी चाहिए, वैसी नज़र नहीं आती. लेकिन अपनी शक्ति और क्षमता के अनुसार लेखक संगठन जो भी हस्तक्षेप कर पाते हैं, उसको लेखक बिरादरी द्वारा जितना समर्थन मिलना चाहिए, वैसा नहीं मिलता. अब जब सांप्रदायिक फासीवाद दरवाजे तक आ पहुंचा है, हिंदी का लेखक उन मंचों पर जाने से बिल्कुल नहीं हिचकिचाता जो उन्हीं के द्वारा प्रेरित भी है और प्रायोजित भी.

यह तो नहीं कहा जा सकता कि लेखक बिरादरी अपने समय को लेकर जागरूक नहीं है, बल्कि उनकी रचनाएं पढ़कर भी इस बात का अहसास होता है कि वे जागरूक हैं. उन लेखकों के लेखन से भी जो अपनी रचनाओं में मौजूदा दौर की हर चुनौतियों से सीधी मुठभेड़ करते नज़र आते हैं और उन लेखकों की रचनाओं से भी जिन्हें ऐसी रचनाएं करने में अंतर्निहित ख़तरे का आभास है और वे अपनी रचनाओं में उससे बचने की चालाक कोशिशें करते नज़र आते हैं.

आज हिंदी रचनाधर्मिता का माहौल कुछ-कुछ अविश्वास से भरा और एक दूसरे की नज़र में संदिग्ध बन गया है. इस माहौल से मुक्ति एक व्यापक बौद्धिक और रचनात्मक आंदोलन से ही संभव है. फिलहाल इसके आसार नज़र नहीं आते. बावजूद इसके, रचनारत रहने और अपनी बात अपने पाठकों तक पहुंचाने की हर संभव कोशिश के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.

(जवरीमल्ल पारख सिनेमा, साहित्य और मीडिया के ख्यात आलोचक हैं.)

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