सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के 25,000 शिक्षकों की भर्ती रद्द करने का हाईकोर्ट का फैसला बरक़रार रखा

कलकत्ता हाईकोर्ट ने अप्रैल 2024 में राज्य स्कूल सेवा आयोग द्वारा 2016 में की गई लगभग 25,000 शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्तियों को अमान्य क़रार दिया था. इसे क़ायम रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियुक्तियां धोखाधड़ी और जालसाजी से हुई हैं, इसलिए निर्देश बदलने का कोई औचित्य नहीं.

एसएससी भर्तियों में देरी के खिलाफ 2019 का वाम मोर्चा आंदोलन.( फोटो साभार: x/@mishra_surjya)

कोलकाता: बंगाल में ममता बनर्जी सरकार को एक बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (3 अप्रैल) को राज्य स्कूल सेवा आयोग द्वारा 2016 में की गई लगभग 25,000 शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्तियों को अमान्य घोषित करने के कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया ही गड़बड़ है.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने उच्च न्यायालय के इस निष्कर्ष पर सहमति जताई कि चयन प्रक्रिया में धोखाधड़ी हुई थी.

मालूम हो कि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल, 2024 को कहा था कि नई नियुक्ति प्रक्रिया उस वर्ष समाप्त होने वाले लोकसभा चुनावों के 15 दिनों के भीतर शुरू होनी चाहिए, अवैध रूप से नियुक्त किए गए लोगों का वेतन चार सप्ताह में 12% ब्याज के साथ वापस किया जाना चाहिए और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) मामले की जांच जारी रखेगा.

लाइव लॉ के अनुसार, सीजेआई खन्ना ने कहा, ‘हमारे विचार में यह ऐसा मामला है, जिसमें पूरी चयन प्रक्रिया गड़बड़ और समाधान से परे है. बड़े पैमाने पर हेरफेर और धोखाधड़ी और छिपाने के इरादे ने चयन प्रक्रिया को पूरी तरह ख़राब कर दिया है. चयन प्रक्रिया की वैधता और विश्वसनीयता समाप्त हो गई.’

न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि उसे उच्च न्यायालय के इस निर्देश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं मिला कि जहां भी नियुक्तियां की गई हैं, वहां दागी उम्मीदवारों की सेवाएं समाप्त की जानी चाहिए और उन्हें प्राप्त वेतन और भुगतान वापस करना होगा.

उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘चूंकि नियुक्तियां धोखाधड़ी और जालसाजी का परिणाम हैं, इसलिए हमें इस निर्देश को बदलने का कोई औचित्य नहीं दिखता.’

कोर्ट ने यह भी कहा कि नियुक्तियों में किए गए ‘घोर उल्लंघन’ संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के खिलाफ हैं.

पहले से नौकरी पर रखे गए उम्मीदवारों से उन्हें किए गए भुगतान वापस नहीं मांगे जाएंगे, लेकिन उनकी नियुक्तियां रद्द कर दी जाएंगी.

कोर्ट ने यह भी कहा कि नई चयन प्रक्रिया शुरू की जाए और 3 महीने के भीतर पूरी की जाए. नई प्रक्रिया में उन उम्मीदवारों के लिए कुछ नियमों में ढील दी जा सकती है, जिन्हें गलत तरीके से नौकरी नहीं मिली.

गौरतलब है कि इस घोटाले ने बंगाल को हिलाकर रख दिया था, जिसमें गलत तरीके से चुने गए उम्मीदवारों ने सुनवाई के लिए महीनों तक विरोध प्रदर्शन किया था. इस बीच, पश्चिम बंगाल एसएससी ने दावा किया था कि उसने परीक्षा के एक साल बाद मूल ओएमआर या उत्तर पुस्तिकाओं को नष्ट कर दिया था.

इन भर्तियों में अनियमितता, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के आरोप लगे थे और इसकी शिकायतें कलकत्ता हाईकोर्ट को मिली थी. इसके बाद हाईकोर्ट ने सीबीआई को जांच के आदेश दिए थे, जिसने राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी, उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी और कुछ अन्य अधिकारियों को गिरफ्तार किया था.

सीबीआई ने पश्चिम बंगाल एसएससी और स्कैनिंग और मूल्यांकन का काम करने वाली एक निजी फर्म के कर्मचारी के साथ ओएमआर शीट की सॉफ्ट कॉपी को बेमेल पाया था.

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सीबीआई की 300 पन्नों की रिपोर्ट पर विचार किया था और 17 मुद्दों पर प्रकाश डाला था. जस्टिस देबांगसु बसाक और मोहम्मद शब्बर रशीदी की पीठ ने कहा था कि एसएससी ने जानबूझकर सबूत नष्ट कर दिए थे और गुप्त रूप से ओएमआर शीट की स्कैनिंग का काम एनवाईएसए नामक कंपनी को सौंप दिया था, जिसने फिर यही काम दूसरी कंपनी स्कैनटेक को सौंप दिया था.