सावधान! फिर विवेक पर हमलावर हैं आस्थाएं

नरेंद्र मोदी की सत्ता के ग्यारह साल बाद आज देश में विवेक व वैज्ञानिक चेतना पर आधारित तर्क-वितर्क की राह और संकटग्रस्त हो गई है और धार्मिक आस्थाएं जरा-जरा-सी बात पर आहत व आक्रामक हुई जा रही हैं.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

इन दिनों अपने देश में धार्मिक आस्थाओं के नाम पर समय के पहिए को उल्टा घुमाने की कोशिशें जिस तरह परवान चढ़ाई जा रही हैं, उससे लगातार बड़े होते अंदेशे उस बिंदु तक जा पहुंचे हैं जहां कई मित्रों को लगता है कि ये कोशिशें सफल हो गईं तो हमें उस जगह ले जा पटकेंगी, जब हमारे पुरखों ने पत्ते लपेटकर अपनी लज्जा को ढकना भी नहीं सीखा था.

स्वाभाविक ही, वे इससे आशंकित हैं और पूछते हैं कि सचमुच ऐसा हुआ तो इसकी सबसे ज्यादा कीमत किन्हें चुकानी पड़ेगी?

उनको जवाब देने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि देश व दुनिया के इतिहास में ऐसी एक नहीं अनेक मिसालें हैं, जब ऐसी आस्थाओं ने राजसत्ता से गठजोड़ करके खुद को मनुष्य के विवेक के विलोम में बदल लिया, उसकी बेदखली पर उतारू हो गईं, उसके पैरोकारों पर बेतरह निर्मम हो उठीं और उन्हें भूलुन्ठित करने के लिए किसी भी हद से गुजर गईं. यहां तक कि अपने अंतिम लज्जावसन भी उतार डाले.

यों, इतिहास ने ऐसी आस्थाओं को कभी भी विवेक की सहज संगिनी बनते नहीं देखा, क्योंकि विवेक के साथ जाने से उन्हें अपना अस्तित्व ही खतरे में पड़ता दिखाई देने लगता है और वे उसके सर्वथा विरुद्ध होने की हिमाकत भी तभी करती हैं, जब राजसत्ता से उनका गठजोड़ इतना मजबूत हो जाता है कि वे हर तरह के वैज्ञानिक चिंतन को निर्मम होकर ठेंगा दिखाने व रौंदने और अंधश्रद्धा व अंधविश्वासों का मार्ग प्रशस्त करने का मंसूबा बांध सकें.

अलबत्ता, कई बार वे इस हिमाकत पर बुरी तरह निर्भर करती हैं क्योंकि (जैसा कि वरिष्ठ लेखक व कवि गौहर रजा ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘मिथकों से विज्ञान तक‘ में लिखा है) विज्ञान और धार्मिक ज्ञान में एक अहम् फर्क यह है कि विज्ञान में पुराने सच को ग़लत साबित करने पर जश्न मनाया जाता है, जबकि धर्म में ‘हमेशा के सच’ हुआ करते हैं और उन पर उंगली उठाने मात्र से संकट पैदा हो जाता है.

हम आज अपने देश में राजसत्ता को जिस तरह सार्वजनिक रूप से अपने पसंदीदा धर्माधीशों के आगे सिर झुकाते व दंडवत करते तथा उसकी कृतज्ञ धर्मसत्ता को बदलें में उसे अभय करते देख रहे हैं, वह इसी का संकेत है. ऐसे में अंदेशे तो पैदा होने और गहराने ही हैं.

ब्रूनो की बलि

बहरहाल, दुनिया की बात करें तो सन् 1600 में वह धार्मिक आस्था की रक्षा के लिए तर्क व विवेक पर आधारित वैज्ञानिक चिंतन को रौंदने की एक बड़ी घटना से तब दो-चार हुई थी, जब राजसत्ता व धर्मसत्ता के गठजोड़ ने इटली के नामचीन दार्शनिक, गणितज्ञ एवं खगोलवेत्ता जियोर्दानो ब्रूनो को यह कहने के ‘कुसूर’ में मृत्युदंड दे दिया था कि सूर्य पृथ्वी के नहीं बल्कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है.

साथ ही ये दोनों अपनी धुरी पर घूमते हैं और तारे स्वयं भी सूर्य हैं. इनमें हर तारे का अपने ग्रहों के साथ वैसा ही अलग विश्व है, जैसे हमारा सौर जगत. ब्रह्माण्ड में ऐसे विश्वों की संख्या अनन्त है और इन सभी विश्वों की अपनी स्वयं की उत्पत्ति और अंत है.

आज ये सारी बातें सुप्रमाणित तथ्य का रूप ले चुकी हैं, लेकिन उस समय इन्क्विज़िशन (पोप व ईसाई संघ यानी क्रिश्चियन यूनियन की तथाकथित अदालत) ने इसे ईसाई धर्म की उस आस्था की शान में अक्षम्य गुस्ताखी माना था, जिसके तहत माना जाता था कि संसार सदा वैसा ही बना रहता है जैसा ईश्वर ने उसे बनाया है.

इस गुस्ताखी के बदले मृत्युदंड से पहले ब्रूनो को निर्वासित जीवन जीने और दर-दर भटकने को विवश किया गया, उनकी देशप्रेम की भावना का दोहन कर धोखे से इटली लाया गया और आठ वर्ष तक जेल में रखकर कठोर यातनाएं दी गईं. इसलिए कि इससे थक-हारकर ब्रूनो यह घोषणा कर देते कि वे ग़लती पर थे, तो आस्था जीत जाती और लोग विश्व की सृष्टि के विषय में ईसाई धर्मकथनों पर फिर विश्वास करने लगते.

गौरतलब है कि ईसाई आस्था को यह जीत किसी भी कीमत पर चाहिए थी, जबकि निर्भय ब्रूनो ने यह कहकर इन्क्विज़िशन के सदस्यों को निरुत्तर कर दिया था: आप दंड देने वाले हैं और मैं अपराधी हूं, मगर अजीब बात है कि कृपासिन्धु भगवान के नाम पर अपना फै़सला सुनाते हुए आपका हृदय मुझसे कहीं अधिक डर रहा है.

यहां गौरतलब है कि ‘इन्क्विज़िशन’, जिसने खुद को ईसाई आस्था का स्वयंभू रक्षक घोषित कर रखा था, ऐसे मामलों में अपना निर्णय सुनाता तो कहता था कि पवित्र धर्म इस अपराधी को बिना ख़ून बहाये मृत्युदंड देने की प्रार्थना करता है.

लेकिन उसकी यह उदारता सरासर ढोंग थी, क्योंकि इसकी आड़ में ‘अपराधी’ को जीवित जला दिया जाता था. भले ही अपने फैसले को न्यायसंगत करार देने के लिए इन्क्विजिशन के पास कोई तर्क या साक्ष्य नहीं सिर्फ आस्था की आड़ होती थी. स्पेन और इटली में इस इन्क्विज़िशन ने अपने अस्तित्वकाल में लाखों निरपराधों की जान ली थी.

ब्रूनो के समकालीन गैलीलियो को भी (जिसने दूरबीन का आविष्कार किया था) उसके ही जैसे दंड की धमकी दी गई थी. लेकिन उसने यह कहकर अपनी जान बचा ली थी कि उससे ‘गलती’ हो गई और ‘वास्तव में पृथ्वी ही विश्व की केंद्र है और सूर्य उसके चारों ओर घूमता है.’

गैलीलियो की यह बात पोप और ईसाई धर्म की इस आस्था को पूरी तरह तुष्ट करती थी कि विश्व की केंद्र पृथ्वी है, सूर्य उसके चारों ओर चक्कर लगाता है और तारे आसमान में अपनी जगह पर जड़े हुए हैं, लेकिन इस ‘आत्मसमर्पण’ के बावजूद गैलीलियो को ‘प्रायश्चित’ के लिए निश्चित अवधि तक जेल में रहना पड़ा था.

हरि बोल और सती प्रथा

विवेक पर आस्था की बढ़त के एक दौर में ऐसा भी हुआ जब ईसाई धर्मगुरुओं के प्रचार के फलस्वरूप अनेक ईसाइयों को इस झूठ में आस्था हो गई कि ईसा के ठीक एक हजार वर्ष बाद दुनिया का अंत हो जाएगा. इसके चलते उनमें से कितने ही अपनी जमीनें वगैरह बेचकर फिलिस्तीन जाने लगे, ताकि दुनिया का अंत हो तो वे वहां अपनी पवित्र भूमि येरुशलम (जहां ईसा का जन्म हुआ था) में हों.

लेकिन यह प्रचार झूठा निकला और जो उसे सच मानकर येरुशलम जा रहे थे, उनको रास्ते में तुर्कों ने बहुत सताया, तो किसी धर्मगुरु ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली. भले ही इसके चक्कर में बहुत से आस्थावानों को अपनी जान तक से हाथ धोना पड़ा.

इतना ही नहीं, मध्य काल में पोप द्वारा धन लेकर ईसाइयों को खास तरह के ‘विमोचन पत्र’ जारी किए जाते थे और दावा किया जाता था कि मृत्यु के बाद उनकी बिना पर स्वर्ग में प्रवेश पाया जा सकेगा.

यह हिंदू धर्म की गोदान की परंपरा जैसा था, जिसके तहत माना जाता है कि ब्राह्मण को गोदान करने के बाद अंतिम सांस लेने वाला व्यक्ति उसी दान की हुई गाय की पूंछ पकड़कर वैतरणी नदी पार और स्वर्ग में प्रवेश कर लेता है.

भारत के बंगाल में धार्मिक आस्था पर आधारित ‘हरि बोल’ नाम की एक कुप्रथा प्रचलित थी, जिसमें बूढों के मरणासन्न हो जाने पर उन्हें नदी के तट पर ले जाकर तब तक डुबकी लगवायी जाती थी, जब तक उनके प्राण न निकल जाएं. कभी किसी बूढ़े के प्राण जल्दी न निकलते तो परिजन उसे वहीं तड़प-तड़पकर मरने के लिए छोड़ जाते थे. सन् 1831 में अंग्रेजी शासन द्वारा इस प्रथा को बंद कराया गया.

इसी तरह सती प्रथा भी विवेक पर आस्था की विजय की ही संतान थी. इस प्रथा की एक मान्यता यह थी कि जो पत्नी अपने पति के साथ सती हो जाती है, वह साढ़े तीन करोड़ वर्ष तक स्वर्ग में राज करती है.

राजा राममोहन राय के प्रयासों से गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक ने इस प्रथा को समाप्त करने का आदेश जारी करना चाहा तो बंगाल के आस्थावान कट्टरपंथी हिंदुओं ने उन्हें एक याचिका भेजी थी, जिसका सारांश था: ‘हमें यह ज्ञात हुआ है कि आप कुछ लोगों के बहकावे में आकर सती प्रथा को समाप्त करना चाहते हैं. ऐसा करना हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों में सरासर हस्तक्षेप है और हिंदू धर्मावलम्बी इसे एक गंभीर घटना मानते हैं. क्योंकि जो नारी अपने पति के साथ चिता पर चढ़ जाती है, वह साढ़े तीन करोड़ वर्ष तक अपने पति के साथ स्वर्ग में सुखी जीवन व्यतीत करती और अपने पति, पितृकुल और मातृकुल की तीन पीढ़ियों को नरक से उबार लेती है.’

अजब-गजब दावे

पिछले दिनों इसी तरह की आस्था में नई कड़ी जोड़ते हुए स्वयंभू संत धीरेन्द्र शास्त्री उर्फ बागेश्वर बाबा ने (जो हिंदू राष्ट्र का प्रबल समर्थक होने का दावा करते हैं) इलाहाबाद महाकुंभ में हुई भगदड़ से जानें गंवाने वालों की बाबत कह दिया था कि उन्हें तो सीधे मोक्ष की प्राप्ति हो गई. इसके बावजूद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दुलारे बने हुए हैं.

बने भी क्यों न रहें, प्रधानमंत्री (और किसी भी तरह उन्हें प्रसन्न रखना चाहने वाले लोगों) ने 2014 में उनके पदासीन होने के बाद से ही धार्मिक आस्थाओं का पोषण करके अंधश्रद्धा व अंधविश्वास बढ़ाने वाली बे-सिर-पैर की बातों की झड़ी लगा रखी है.

अक्टूबर, 2014 में, मुंबई के एक अस्पताल में डॉक्टरों और अन्य प्रोफेशनलों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने यह तक कह डाला था कि कोई प्लास्टिक सर्जन रहा होगा जिसने उस समय गणेश के शरीर पर हाथी का सिर लगाया और प्लास्टिक सर्जरी का चलन शुरू किया. अनंतर, गर्व महसूस करते हुए उन्होंने कहा था कि महाभारतकाल में कर्ण अपनी मां के गर्भ से नहीं, उसके बाहर पैदा हुआ था. इसका मतलब है कि उस समय आनुवंशिक विज्ञान मौजूद था.

आगे चलकर उन्हें अपना ‘आदर्श’ मानने वालों की जमात ने ऐसे और भी अनेक निराधार दावे किए. मसलन : गौमूत्र से कैंसर ठीक होता है, प्राचीन हिंदुओं ने स्टेम सेल और टेस्ट ट्यूब बेबी की तकनीक पर शोध किया था, प्राचीन भारत में गाइडेड मिसाइलें और विमान मौजूद थे, ब्रह्मा ने डायनासोर की खोज की थी, प्राचीन भारतीयों ने इंटरनेट का आविष्कार किया था, वैदिक सिद्धांत आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत से भी बड़ा है, जबकि चार्ल्स डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत ‘वैज्ञानिक रूप से गलत’, मोर आंसू पीकर प्रजनन करते हैं, यज्ञ से पर्यावरण की शुद्धि होती है, गौमूत्र में सोना पाया जाता है, एक ऋषि ने हवाई जहाज़ों के लिए दिशा-निर्देश लिखे थे और ज्योतिषशास्त्र विज्ञान से बेहतर है.

क्या आश्चर्य कि उनकी सत्ता के ग्यारह साल बाद आज देश में विवेक व वैज्ञानिक चेतना पर आधारित तर्क-वितर्क की राह और संकटग्रस्त हो गई है और धार्मिक आस्थाएं जरा-जरा-सी बात पर आहत व आक्रामक हुई जा रही हैं.

जाल में उलझाव

उत्तर प्रदेश के वैकल्पिक नजरिए वाले समाजविज्ञानी डॉ. रामबहादुर वर्मा बताते हैं कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि मनुवाद पर आधारित हिंदू राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के प्रति समर्पित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का परिवार अच्छी तरह जानता है कि वह अपना लक्ष्य पाने में तभी सफल होगा, जब आस्था एवं विश्वास के नाम पर देशवासियों की भावनाओं को उभारकर तर्क एवं विवेक के आधार पर सोचने-समझने व निर्णय करने की उसकी शक्ति को कुंद कर दिया जाए. इसके लिए उसने सप्रयास राजसत्ता तथा धर्मसत्ता दोनों को एक कर दिया है. अब ये दोनों सत्ताएं देशवासियों की रोजमर्रा की समस्याओं की ओर से उनका ध्यान हटाने के लिए आस्थाजनित स्वर्ग-नरक व पाप-पुण्य आदि के स्वप्न जाल बुनकर उसको उसी में उलझाए दे रही हैं.

ताकि वे याद न रख पाएं कि ‘ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या’ की बात करने वाले धर्माधीशों ने अरबों-खरबों की सम्पत्ति संग्रहीत कर रखी है तथा उनके कृपापात्र सत्ताधीश आम लोगों की गाढ़ी कमाई लूटकर अपनी व चंद पूंजीपतियों की तिजोरी भर रहे हैं.

ऐसे में जो लोग भी इस संसार को तर्क, विवेक और विज्ञान की राह पर बढ़ते देखना चाहते हैं, उनको पूरी गंभीरता से इस सवाल का सामना करने की जरूरत है कि समय के पहिए को उल्टा घुमाने की कोशिशें सफल हो गईं तो उसका परिणाम क्या होगा?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)