नई दिल्ली: आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) में आधे से अधिक स्वीकृत पद लंबे समय से खाली पड़े हैं. इसके कारण संस्थान को संविदा कर्मचारियों पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे पाठ्यक्रम योजना, पाठ्यपुस्तक निर्माण और प्रकाशन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 17 दिसंबर 2025 को केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के सांसद समीरुल इस्लाम के सवाल के जवाब में बताया कि 2,844 स्वीकृत पदों के में से केवल 1,219 पद भरे गए हैं, जबकि 1,625 पद खाली हैं. यानी कुल रिक्ति दर 57.1% है.
आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक रिक्तियां ग्रुप-सी श्रेणी में हैं. 1,520 स्वीकृत पदों में से केवल 411 भरे गए हैं और 1,109 पद खाली हैं, यानी लगभग 73% रिक्ति. ग्रुप-बी में 677 पदों में से 369 भरे गए हैं और 308 पद खाली (करीब 45%) हैं. वहीं, ग्रुप-ए में 647 पदों में से 439 पद भरे गए हैं और 208 पद (लगभग 32%) खाली हैं.
27 दिसंबर को एनसीईआरटी ने 173 गैर-शैक्षणिक पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया, जिसमें ग्रुप-ए के नौ, ग्रुप-बी के 26 और ग्रुप-सी के 138 पद शामिल हैं.
राज्यसभा में साझा आंकड़ों के अनुसार 2020-21 से 2024-25 के बीच एनसीईआरटी ने 445 स्थायी कर्मचारियों (229 शैक्षणिक और 216 गैर-शैक्षणिक) की भर्ती की, जबकि इसी अवधि में 3,567 संविदा कर्मचारियों को नियुक्त किया गया – जो स्थायी भर्ती से लगभग आठ गुना अधिक है. खास बात यह रही कि 2020-21 और 2021-22 में कोई स्थायी भर्ती नहीं हुई, जबकि इन वर्षों में क्रमशः 720 और 746 संविदा कर्मचारी नियुक्त किए गए.
मार्च 2023 की अपनी रिपोर्ट में संसद की शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी समिति ने एनसीईआरटी को 2023 के अंत तक स्थायी नियुक्तियों के जरिए रिक्त पद भरने को कहा था. मार्च 2025 की रिपोर्ट में समिति ने 2025 के अंत तक सभी रिक्तियां भरने और संविदा नियुक्तियां बंद करने की सिफारिश की थी.
अखबार के अनुसार, जयंत चौधरी ने अपने लिखित जवाब में कहा था, ‘भर्ती एक निरंतर प्रक्रिया है और संबंधित भर्ती नियमों के अनुसार रिक्तियां भरने के प्रयास किए जा रहे हैं.’
स्टाफ की कमी का मुद्दा उस समय और गंभीर हो गया जब एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक को वापस लेना पड़ा. इस पुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से जुड़ा एक अध्याय शामिल था. अधिकारियों ने पहले बताया था कि विवादित अध्याय समिति द्वारा तैयार किया गया था, जिसमें एक वकील शामिल था, लेकिन इसे विधि विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा नहीं किया गया.
एनसीईआरटी में ग्रुप-ए, बी और सी अधिकारी प्रशासनिक और लिपिकीय कार्यों के साथ-साथ पाठ्यपुस्तकों की छपाई, प्रकाशन और स्कूलों तथा विद्यार्थियों तक वितरण की निगरानी करते हैं. वे पाठ्यपुस्तक लेखन, संपादन और समीक्षा से जुड़े विशेषज्ञों व समितियों के समन्वय के लिए भी जिम्मेदार होते हैं.
अखबार ने अनीता रामपाल, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा फैकल्टी की पूर्व डीन रह चुकी हैं, के हवाले से कहा कि लंबे समय तक पद खाली रहने और संविदा कर्मचारियों पर निर्भरता किसी भी शैक्षणिक संस्थान को कमजोर करती है.
उन्होंने कहा, ‘जब कर्मचारियों को नौकरी की सुरक्षा नहीं होती तो उनकी प्रेरणा, संस्थागत प्रतिबद्धता और अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है. अस्थायी पदों की असुरक्षा के कारण लोग महत्वपूर्ण फैसलों पर सवाल उठाने या संस्थान निर्माण में सार्थक योगदान देने से हिचकते हैं.’
प्राथमिक स्तर की एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक विकास समिति की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी रामपाल ने पाठ्यपुस्तक प्रकाशन में देरी पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान भाग-2 की पुस्तक 2025-26 शैक्षणिक सत्र के लिए अक्टूबर या नवंबर तक उपलब्ध हो जानी चाहिए थी, लेकिन फरवरी 2026 के अंत में परीक्षा से ठीक पहले जारी कर फिर वापस लेना – न सिर्फ़ गंभीर कमी दिखाता है, बल्कि बच्चों के प्रति लापरवाही भी दिखाता है. इससे पाठ्यपुस्तक निर्माण और समीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं.
स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के तहत स्वायत्त संस्थानों में रिक्तियों से जुड़े एक अलग प्रश्न के लिखित जवाब में सरकार ने 17 दिसंबर को राज्यसभा को बताया कि एनसीईआरटी में 899 प्रशासनिक, 232 शिक्षण और 404 गैर-शिक्षण पद खाली हैं.
31 जनवरी को परिषद ने 117 विभिन्न शैक्षणिक पदों को भरने के लिए ऑनलाइन आवेदन भी आमंत्रित किए थे.
यह स्थिति ऐसे समय सामने आई है जब एनसीईआरटी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा स्कूल शिक्षा 2023 के अनुरूप नई पाठ्यपुस्तकें लागू कर रहा है, साथ ही संशोधन, अनुवाद और डिजिटल सामग्री तैयार करने का काम भी संभाल रहा है.
धर्मशाला स्थित केंद्रीय हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग के शिक्षक नवनीत शर्मा ने कहा, ‘विशेषकर शैक्षणिक और तकनीकी सहायता पदों पर अधिक रिक्तियां पाठ्यक्रम विकास की समयसीमा, पाठ्यपुस्तक समीक्षा, शोध कार्य, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों और क्षेत्रीय संस्थानों के बीच समन्वय को प्रभावित कर सकती हैं.’
