अदालतों का काम मोरल पुलिसिंग करना नहीं है: शीर्ष अदालत

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2019 के पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस निर्देश, जिसमें जैन संन्यासी तरुण सागर पर पोस्ट के लिए संगीतकार विशाल ददलानी और नेता तहसीन पूनावाला पर आपराधिक केस न बनने के बावजूद 10 लाख जुर्माना लगाया गया था, को ख़ारिज करते हुए कहा कि न्यायिक प्राधिकरण को अपनी संवैधानिक सीमाओं में रहना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: संतोषी मरकाम/द वायर)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जैन धर्म के एक संन्यासी पर टिप्पणी करने के लिए संगीतकार विशाल ददलानी और राजनीतिक विश्लेषक तहसीन पूनावाला पर 10-10 लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाने के साल 2019 के पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले रद्द कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (8 अप्रैल) को कहा कि अदालतों को ‘मोरल पुलिसिंग’ का काम नहीं सौंपा गया है और उन्हें न्याय की आड़ में मूल्य-आधारित फैसले देने से बचना चाहिए. 

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने हाईकोर्ट के उस निर्देश को खारिज कर दिया, जिसमें जैन धर्म के संन्यासी तरुण सागर पर सोशल मीडिया पोस्ट के लिए दोनों के खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं बनने के बावजूद जुर्माना लगाया गया था.

शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘अदालत का काम ‘मोरल पुलिसिंग’ करना नहीं है. साथ ही यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत याचिकाकर्ताओं के बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार को स्पष्ट रूप से बरकरार रखा था. 

पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘यह मानने के बाद कि अपीलकर्ता ने कोई अपराध नहीं किया है, अपीलकर्ता और अन्य याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाने का कोई सवाल ही नहीं उठता है.’

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार हाईकोर्ट इस तथ्य से ‘प्रभावित’ था कि टिप्पणी एक धार्मिक गुरु पर की गई थी. पीठ ने कहा, ‘शायद हाईकोर्ट इस तथ्य से प्रभावित था कि अपीलकर्ता और आरोपी के रूप में पेश किए गए दूसरे व्यक्ति ने दूसरे धर्म के पुजारी की आलोचना की थी.’

कोर्ट ने आगे कहा कि आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के बाद अदालत को नैतिक टिप्पणी के दायरे में नहीं आना चाहिए था.

कथित विवाद अगस्त 2016 में शुरू हुआ था, जब विशाल ददलानी और पूनावाला ने हरियाणा विधानसभा को संबोधित करने के लिए जैन धर्म के संन्यासी तरुण सागर को आमंत्रित करने के हरियाणा सरकार के फैसले की आलोचना की थी.

एक्स पर दोनों की टिप्पणियों को कुछ लोगों आपत्तिजनक माना था, जिसके कारण अंबाला छावनी पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए जानबूझकर किए गए कार्य), 153-ए (शत्रुता को बढ़ावा देना) और 509 (किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के लिए शब्द, इशारा या कार्य) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी. 

बाद में ददलानी और पूनावाला ने एफआईआर को रद्द करने के लिए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. मई 2019 में हाईकोर्ट ने स्वीकार किया कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है. बावजूद इसके हाईकोर्ट ने जैन समुदाय के साथ ‘न्याय करने’ के लिए दोनों याचिकाकर्ताओं पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया. 

अदालत ने तरुण सागर द्वारा किए गए योगदान का हवाला दिया था और याचिकाकर्ताओं की आलोचना करते हुए कहा था कि उन्होंने बिना किसी खास जानकारी के यह टिप्पणी की. सोशल मीडिया पर उकसावे और अशांति की बढ़ती प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि यह जुर्माना एक निवारक के रूप में काम करेगा.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब कोई अपराध सिद्ध नहीं हो पाया तब इस तरह की शर्त रखना अनुचित था. पीठ ने कहा, ‘यह पता लगने के बाद कि यहां कोई आपराधिक मामला नहीं बनता, और सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एफआईआर रद्द करते हुए हाईकोर्ट को अपीलकर्ता को यह कहकर अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए था कि संन्यासी द्वारा किया गया योगदान अपीलकर्ता और मामले में अन्य सह-अभियुक्तों की तुलना में बहुत अधिक था.

10 लाख जुर्माना भरने के हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक प्राधिकरण को अपनी संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहना चाहिए.