कलाएं किस तरह अनुकूल परिस्थितियों में लंबी-लंबी यात्राएं करतीं, आसमान छूतीं और प्रतिकूल परिस्थितियों में रसातल में चली जाने को अभिशप्त होती हैं, इसकी एक मिसाल अवध में बीदरी कला (जिसे कई हल्कों में बिद्री कला भी कहा जाता है) के उत्थान व पतन की ‘उमड़ी कल थी मिट आज चली’ जैसी गाथा भी है.
आगे बढ़ने से पहले जान लेना चाहिए कि यह कला खास तरह की मिश्रधातु को सांचे में ढालकर बनाई गई रोजमर्रा के उपयोग की और सजावट के काम आने वाली विभिन्न वस्तुओं पर चांदी-सोने या तांबे आदि के तारों से जड़कर आकर्षक डिजाइनें उत्कीर्ण करने की कला है, जिसे इसके अनूठेपन के लिए जाना जाता रहा है.
दमिश्क से कर्नाटक
जानकारों के अनुसार, सीरिया की राजधानी दमिश्क में इसका जन्म हुआ तो इसको ‘कोफ्तगीरी’ कहा जाता था. अनंतर, समय के साथ इसने सीरिया की सीमाओं को पार किया तो ईरान होते हुए बहमनी सल्तनत (1347-1518) के दौर में ईरान के ही प्रख्यात कारीगर अब्दुल्ला बिन कैस के साथ भारत में कर्नाटक पहुंची तो जैसे उसी की होकर रह गई. उसके ऐतिहासिक बीदर शहर की पहचान के साथ तो वह कुछ ऐसी एकाकार हो गई कि उसके नाम पर ही इसको बीदरी कहा जाने लगा. इस कारण की जानकार बीदरी को ही इसकी जन्मभूमि मानते और दमिश्क की ‘कोफ्तगीरी’ से अलग बताते हैं.
बीदर में इसके खासी तेज रफ्तार से पुष्पित व पल्लवित होने के दो बड़े कारण थे. पहला यह कि जिन वस्तुओं को सजाने में इसका इस्तेमाल किया जाता है, उनके निर्माण और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली मिश्र धातु (जो निर्धारित अनुपात में जस्ते, तांबे और टिन आदि धातुओं को मिलकर बनाई जाती है), वहां अपेक्षाकृत बहुत सस्ती व प्रचुर मात्रा में और आसानी से उपलब्ध हो जाती थी.
दूसरा कारण यह कि उन वस्तुओं की सांचों में ढलाई के वक्त जिस खास तरह की लाल मिट्टी का लेप लगाकर उनको काली या सुरमई रंगत दी जाती थी, वह भी प्रचुर परिमाण में बीदर के आस-पास ही पाई जाती थी.
इतिहास, तहजीब और कलाओं के जानकार सय्यद अनवर अब्बास ने लुप्त होती कलाओं पर केंद्रित अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि सांचों में ढलाई के वक्त मिश्रधातु पर लाल मिट्टी का लेप लगाने से उस पर काला या सुरमई रंग आसानी से चढ़ जाता था. फिर उस रंग पर सरसों के तेल में डुबोए नम्दे (पालिश करने के उपकरण) से पालिश करके वस्तुओं की सतह को चमकदार बना दिया जाता था. इसके बाद उस सतह को खोद-खोदकर मनोनुकूल डिजाइन बनाए जाते और उनमें चांदी के तार भर दिए जाते थे. तब वस्तुओं की सुरमई सतह पर चांदी के तारों से बनी डिजाइन लाजवाब स्तर तक चमकदार और आकर्षक दिखाई देने लगती थी.
यों बिखेरे जलवे
बहरहाल, इस कला को बीदर से चलकर उससे पूरी तरह भिन्न प्रकृति व परिस्थितियों वाले अवध की राजधानी लखनऊ तक पहुंचने में कितना समय लगा, इतिहास के जानकारों से इस बाबत कोई पक्की जानकारी नहीं मिलती. लेकिन इस कला के लखनऊ के प्रारंभिक नमूनों में जो यूरोपीय प्रभाव दिखता है, उससे अनुमान लगाया जाता है कि नवाबों के वक्त उन्नीसवीं शताब्दी में जब अवध में अंग्रेजों व फ्रांसीसियों की आमदरफ्त बढ़ी, तब यह कला सूबे में जलवाअफरोज हुई.
जानकारों के अनुसार, 1882 में लखनऊ में इस कला (जिसे तब धातुकर्म और हस्तशिल्प वगैरह भी कहा जाने लगा था) के क्षेत्र में इकतीस नामी कारीगर अपने हुनर आजमा रहे थे. उन्होंने कल्कत्ता (अब कोलकाता) में 1883-84 व 1903 में लगी औद्योगिक प्रदर्शनियों में इस कला की जरबुलंद शैली (जो लखनऊ की अपनी खास ईजाद थी) के अनेक नमूने प्रदर्शित किए और व्यापक सराहना प्राप्त की थी. उनके एक नमूने को तो एक प्रतियोगिता में रजत पदक भी प्राप्त हुआ था.
यों, उन दिनों बीदरी कला की चार और शैलियां प्रचलित थीं- तारकशी, आफताबी, तहनशीं और जरनशीं. यहां इनके विस्तार से वर्णन का अवकाश नहीं है, लेकिन जानना जरूरी है कि अपने सुनहरे दिनों में यह कला न सिर्फ लखनऊ बल्कि समूचे अवध सूबे में इतनी लोकप्रिय हुआ करती थी कि बाजारों में उससे बने हुक्कों के पेंदों, नालों, चिलमों, सुराहियों व गिलासों आदि की बहार ही बहार थी. उनकी नाजुकी और जरा-सी भी ठोकर से गिरकर टूट जाने की समस्या के बावजूद.
इसके चलते इस कला का बाजार भी खासी तेजी से बढ़ गया था. इस कला से सजे आबखोरों, प्यालों, जामों, सुराहियों, आफताबों, खानदानों, पानदानों, उगालदानों, इत्रदानों, अगरदानों, गुलाबपोशों आदि की बाजारों में भरपूर मांग थी और कद्रदान उनकी ऊंची से ऊंची कीमत चुकाने से भी गुरेज नहीं करते थे. यहां तक कि ढक्कनों, रकाबियों, पतीलियों, देगों, कलमदानों, पेपरवेट, गुलदानों, शमादानों, ऐश ट्रे और ट्रे वगैरह के खरीदार भी दुकानदारों से ‘बीदरी के काम वाले पीस’ दिखाने को कहते थे.
फकत संग्रहालयों में
अवध, खासकर लखनऊ के संग्रहालयों में अभी भी इस कला से सजे मीरफर्श, छड़ी के मूंठ, कमीज के बटन, ब्रोच, पिन, मसहरी, पलंग के पाये और कुर्सी मेज के सेट आदि देखे जा सकते हैं. लेकिन बस संग्रहालयों में ही, क्योंकि औद्योगिक विकास की आंधी अब इसे पूरी तरह लील गई है. इस कारण भारत स्थित अपनी आदि भूमि बीदर में यह भले ही अपना अस्तित्व बचाए हुए है, लखनऊ में लुप्त हो गई है.
इसके संरक्षण का अब तक का आखिरी विफल प्रयास 1960-70 के दशक में हुआ था. वह भी इसलिए संभव हो पाया था क्योंकि तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे चन्द्रभानु गुप्त, जो अब इस संसार में नहीं हैं, इसके संरक्षण को लेकर खासे फिक्रमंद थे.
उन्होंने प्रदेश के उद्योग विभाग के तत्वावधान में लखनऊ में ही इसका एक प्रशिक्षण केंद्र खुलवाकर मिर्जा नादिर बेग को (जिन्हें यह कला अपने पुरखों से विरासत में मिली थी) उसके संचालन का जिम्मा सौंपा था. इसके कई अच्छे नतीजे भी निकले थे. 1980 में लंदन में लगी ‘भारतीय कला के हजार वर्ष’ प्रदर्शनी में इस केंद्र के कारीगरों द्वारा बनाई गई बीदरी की जरबुलंद शैली की हुक्के की उन्नीस सेंटीमीटर ऊंची फर्शी प्रदर्शित की गई थी, जिसने बहुत नाम कमाया था.
लेकिन यह सिलसिला लंबा नहीं चल सका क्योंकि उसी साल मिर्ज़ा नादिर बेग का निधन हो गया और उनके साथ ही लखनऊ की बीदरी कला का भी अवसान हो गया.
लंबे होते दुर्दिन
सय्यद अनवर अब्बास के मुताबिक, इस अवसान का दुख इस तथ्य की रौशनी में और गहरा हो जाता है कि नवाबों के वक्त की कलाओं के संरक्षण के लिहाज से लखनऊ अरसे से दुर्दिन झेलता आ रहा है और उस काल की लुप्त होकर रह जाने वाली यह कोई अकेली कला नहीं है.
खत्ताती, खुशनवीसी, तुगरानवीसी, किताबत, वस्ली, रस्म-उल-खत, खत-ए-मोअक्कस, खत-ए-तवामी, तारीखगोई या तारीखनवीसी, हक्कानी, हड्डियों पर नक्काशी और कंघी आदि की कलाएं भी लुप्त हो चुकी है या लुप्त होने के कगार पर जा पहुंची हैं और उनके संरक्षण को मुश्किल या नामुमकिन बताकर उसकी चर्चा तक नहीं की जाती.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
