शलभ श्रीराम सिंह: तबाह की गई दिलों की ख़ूबसूरती…गोलियों से खेले गए मज़हब और ज़बान के खेल

हिंदी में युयुत्सावाद के प्रवर्तक और बगावत के बोहेमियन कवि के रूप में विख्यात रहे स्मृतिशेष शलभ श्रीराम सिंह के सृजन की खूबसूरती यह है कि विडंबनाओं और नकारात्मकताओं के बीच भी वे किसी नकारात्मकता का आह्वान नहीं करते और समूचे भारतीय समाज व राजनीति में आमूलचूल क्रांति का स्वप्न देखते हैं.

शलभ श्रीराम सिंह.

मुआवजा लेकर
गांव छोड़ देने को तैयार हैं लोग
देश छोड़ देंगे मुआवजा लेकर एक दिन 

गांव और देश को इस तरह बेचने वाले लोग
कहां से आ गए हैं
हमारी दुनिया में?

कहां से आ गए हैं
गांव और देश के खरीददार
मां और माटी के इन सौदागरों को
किस धरती ने जन्म दिया है आखिर?

क्या इसी धरती ने?
फिर यह हमारी धरती कहां रही?
हम किस धरती को अपनी कहकर पुकारें?

हमें जन्म देने वाली
हमारी धरती कहां है इस धरती के भीतर?

इसी सवाल में तब्दील होता जा रहा हूं मैं
उन तमाम लोगों की तरह
जो इसी सवाल में तब्दील होते जा रहे हैं.

अगर आप पहली बार यह कविता पढ़ रहे हैं, इसे रचने वाले कवि का नाम जाने बगैर, तो निस्संदेह, आपको यही लगेगा कि इस देश की, और साथ ही, साथी देशवासियों की दुर्दशा से व्याकुल कवि आपके अगल-बगल या आस-पास ही कहीं बैठा आपसे बात कर रहा है. फिर तो उसकी लगाई सवालों की इस झड़ी में उसके बहुत से साथियों की तरह आपको भी खुद को सवालों में तब्दील होने से रोक पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा.

सिक्कों से लड़ा जाता युद्ध

फिर आपको पता चलेगा कि इसे तो हिंदी में युयुत्सावाद के प्रवर्तक और बगावत के बोहेमियन कवि के रूप में विख्यात रहे स्मृतिशेष शलभ श्रीराम सिंह ने कोई पैंतीस साल पहले रचा था, तो कौन जाने चमत्कृत होकर रह जाएं.

यह सोचकर कि पच्चीस साल पहले वर्ष 2000 में 23 अप्रैल के दिन बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में इस संसार को अलविदा कह गए ‘नफस नफस कदम कदम, बस एक फिक्र दम से दम’ जैसे कालजयी प्रयाण गीत के इस रचयिता ने 1991 में दिल्ली में यह कविता रची तो इसमें वर्णित हालात की पीठिका भर तैयार हुई थी और भूमंडलीकरण की ‘सर्वाइवल आफ द बेस्ट’ की नीतियों का ठीक से ‘फूलना-फलना’ बाकी था.

फिर भी उसकी कवि प्रतिभा ने न सिर्फ इन हालात को ठीक से पहचानने में कोई ग़लती नहीं की थी, बल्कि यह भी ‘देख’ लिया था कि सौ रुपये किलो पालक खरीदने के लिए/ तैयार हो रहा है देश/ तैयार हो रहा है जनगण/ एक कभी न खत्म होने वाले युद्ध के लिए सिक्कों से लड़ा जाने वाला यह युद्ध/ शुरू हो चुका है पृथ्वी पर!

अब, जब सिक्कों से लड़ा जाने वाले युद्ध ने न सिर्फ इस देश बल्कि दुनिया को भी इन सवालों से भी कहीं ज्यादा बड़े इस सवाल के सामने ला खड़ा किया है कि ये सवाल लगातार  निरुत्तरित क्यों हैं और इन्हें पूछने पर चारों ओर चुप्पी-सी क्यों छा जाती है, तो भी शलभ न सही, उनकी कविताएं, कम से कम अपने देश के प्रसंग में, बताती हैं कि ‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक’ यह खतरनाक चुप्पी इसलिए तारी है कि दिल्लियों को ऐसी चुप्पियों का पुराना अभ्यास है:

हाथी की नंगी पीठ पर
घुमाया गया दाराशिकोह को गली-गली
और दिल्ली चुप रही

लोहू की नदी में खड़ा
मुस्कुराता रहा नादिर शाह
और दिल्ली चुप रही
लाल किले के सामने
बंदा बैरागी के मुंह में डाला गया
ताज़ा लहू से लबरेज़ अपने बेटे का कलेजा
और दिल्ली चुप रही

गिरफ़्तार कर लिया गया
बहादुरशाह जफ़र को
और दिल्ली चुप रही
दफ़ा हो गए मीर गालिब
और दिल्ली चुप रही 

‘दिल्लियां’ शीर्षक इस कविता  के अंत में शलभ का निष्कर्ष है कि दिल्लियां/चुप रहने के लिए ही होती हैं हमेशा/उनके एकांत में/कहीं कोई नहीं होता/कुछ भी नहीं होता कभी भी शायद.

शलभ की ही एक और कविता के शब्दों में कहें, तो ऐसे में उत्तराकांक्षी सवालियों के पास सिर्फ यही विकल्प बचता है कि वे मंदिर की तरह टूटें/मस्जिद की तरह गिरें/मकान की तरह जलें/ चाकू की तरह चलें/ ख़ून की तरह उछलें/ या प्राण की तरह निकलें और नहीं तो दंगों, फ़सादों या ख़तरनाक वारदातों की याद, खयाल या फिक्र में खोए देखते रहें कि:

बचपन की मुस्कुराहटों पर
रखे जा रहे हैं पत्थर
गिरवी रखे जा रहे हैं जवानी के सपने
बुढ़ापे की उम्मीदों को धोखा दिया जा रहा है
दिन-रात.

तकनीकी नाकेबन्दी की जकड़ में है गंगा
यमुना के गले में उग रही हैं कंकड़ों की फ़सल
समुद्र को अलविदा कहने पर
मजबूर की जा रही है नर्मदा.

गोमुख का भूगोल टेढ़ा हो रहा है
टेढ़ा हो रहा है हरि की पौड़ी का भूगोल
हरिद्वार का भूगोल टेढ़ा हो रहा है.

उनकी यह कविता भी अंत तक आते-आते इतनी चिंतनीय हो जाती है कि इस तरह ‘देखते रह जाना’ भी कठिन हो जाता है, क्योंकि पता चलता है कि: मेरठ के जाने का समय है यह/समय है कानपुर, प्रयाग, पटना और कलकत्ता के जाने का./दिल्ली के जाने का समय है यह./सरस्वती-पथ का सरण करने वाली है गंगा.

अपने समय से आगे 

गौर कीजिए: आज अपनी आजादी की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मना लेने के बाद भी हम बारंबार पूछते हैं कि बार-बार जगाए जाने पर भी इस देश की अंतरात्मा भला जागती क्यों नहीं है और नहीं जागती तो बहुत विचलित होते हैं. लेकिन शलभ ने आजादी की पचासवीं वर्षगांठ पर ही देश की अंतरात्मा को सोते और देश को गुलामी के दौर से निकलकर गुलामों के दौर में जाते पकड़ लिया था. उन्होंने लिखा था:

पचास वर्षों में इस देश की अंतरात्मा सो गई है
गिद्धों और महागिद्धों की भूमि हो गई है इस देश की धरती
सोने की चिड़िया की जान सांसत में है
आफ़त में है कविता का एक-एक शब्द 

इस कविता में अपने समय से आगे निकलते हुए उन्होंने और भी बहुत कुछ देखा था:

मानवता के सारे प्रतिमान ढहाए गए
बहाए गए घडियाली आंसू जार-जार
चढ़ाए गए आख़िरी ऊंचाई तक प्रार्थनाओं के स्वर
भगवानों के घर जलाए और गिराए गए
जी भर तबाह की गई दिलों की ख़ूबसूरती
वादियों और बस्तियों पर तैनात हुए सन्नाटे
गोलियों से खेले गए मज़हब और जबान के खेल
मेल बरकरार रखने के लिए हिंदू-मुस्लिम -जैन-सिख ईसाई का
नारा लगते हुए ‘भाई-भाई’ का…

सवाल उठाते-उठाते –
बोलियां नंगी हो गई हैं भाषाएं….
मनों की सुंदरता समाप्त हो गई हैं तनों के विज्ञापनों से
फिर भी कुछ लोगों के लिए
‘मचलती और झूमती हुई आ रही है आज़ादी ‘….

इस बीच लगातार हलाल हुए हैं भगत सिंहों के सपने
बिस्मिलों की तमन्नाएं, अशफ़ाक‍उल्लाओं के जज्बात
सुभाषों की ललकारें, गांधियों के संदेश और जयप्रकाशों की तड़प…

वनों की हरियाली नष्ट की गई इस बीच
घोटा गया नदियों का गला
पहाड़ों की खाल खींची गई पूरी बेरहमी के साथ….
पशुओं की भूख तक भुनाई जा रही है शान से
ईमान के गले पर पाँव रखकर की जा रही है बेईमानी

जान और जहान से बड़ा हो गया है पैसा
काहे की देशभक्ति, नैतिकता काहे की, न्याय कैसा?….
ज्ञान के मंदिरों में गुंडे तैयार किए जा रहे हैं यहां
झकाझक परिधानों में विचर रहे हैं मूंछ मुंडे अपराधी…

एक सदा जीवित जन-संसार पर्दे के पीछे सरकाया जा रहा है
दरकाया जा रहा है देश का भूगोल अपनी इच्छा भर
दराँतियों से दरांतियां नहीं ,जातियों से जातियां भिड़ाई जा रही हैं
वर्ण-विद्वेष की लड़ाइयां लड़ाई जा रही हैं, वर्ग-संघर्ष के बदले
मूर्तियों की आड़ में जबरजोत की जंग जारी है…
उदार बनाये जाने के चक्कर में नगद से उधार होता जा रहा है देश
उधार होता जा रहा है विश्वबाज़ार में बदलते हुए ख़ुद को….

कबीर नजरुल निराला…

शलभ के सृजन की खूबसूरती यह कि इतनी विडंबनाओं और नकारात्मकताओं के बीच भी वे किसी नकारात्मकता का आह्वान नहीं करते और समूचे भारतीय समाज व राजनीति में आमूलचूल क्रांति का स्वप्न देखते हैं. तभी तो उनके भावुक, सरल व ईमानदार कवि की निर्मल आभा में बहुत से लोगों को (आलोचकों के कई मठों द्वारा उनकी भरपूर अवहेलना के बावजूद) कबीर की अक्खड़ता, नजरुल की क्रांतिचेतना और निराला का ओज एक साथ नजर आते हैं. आएं भी क्यों नहीं, युयुत्सावाद के प्रवर्तन के बाद शलभ इस संसार को सदैव समरभूमि ही समझते और अपने विचारों व सपनों के अनुकूल बनाने के लिए किसी युयुत्सु की तरह लड़ते रहे.

जहां तक युयुत्सा की बात है, जो उनका जीवन दर्शन थी, उसने निजी जीवन में भी उनका पीछा नहीं ही छोड़ा था, जिसके चलते उन्हें पग-पग पर अपनी स्थिति के लिए संघर्ष करते रहना पड़ा था.

1938 में पांच नवंबर (कुछ जानकारों के अनुसार पांच अक्टूबर) को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अब अंबेडकरनगर) जिले के मसोढ़ा गांव में उनका जन्म हुआ तो मां-बाप ने उन्हें श्रीराम नाम दिया था. बाद में कवि बनने की प्रक्रिया में उन्हें लगा कि श्रीराम को उनके भाइयों शत्रुघ्न, लक्ष्मण और भरत से दूर रखना ठीक नहीं, तो उन्होंने अपने नाम में श्रीराम से पहले शलभ जोड़ लिया. श से शत्रुघ्न, व से लक्ष्मण और भी से भरत.

दारुण कवि जीवन 

उनके कवि जीवन का आरंभ भी एक बहुत ही दारुण वाकये से हुआ. दरअसल, उनके 16-17 साल के होते-होते पिता रामखेलावन ने एक गोरी-चिट्टी रूपगर्विता कन्या से उनका विवाह कर दिया था और इस विवाह के लिए न शलभ की सहमति ली थी, न ही उक्त कन्या की.  विवाह के दिन बरात पहुंची तो यह देखकर उस कन्या पर बिजली-सी गिर पड़ी कि उसके दूल्हे का रंग ‘काले भुजैटा जैसा’ है. पिता की पगड़ी की लाज रखने के लिए उस वक्त तो वह ससुराल चली गई, लेकिन सुहागरात को शलभ के लिए तिरस्कार की रात बना दिया. उनके काले रंग को लेकर इतना अपमानित किया कि उन्हें घर छोड़कर कलकत्ता भाग जाने में ही निस्तार दिखा.

कलकत्ता में उन्हें उन दिनों के प्रसिद्ध मूनलाइट थियेटर में चाय पिलाने का काम मिला तो वे ‘टी-ब्वाय’ बन गए. उनका सौभाग्य कि वहां कवियों व कलाकारों की संगति में रहते-रहते उनके भीतर भी काव्य-चेतना जाग उठी और उन्होंने ‘शलभ फैजाबादी’ नाम से शायरी शुरू कर दी. अलबत्ता, उन्हें कविकर्म को गंभीरता से स्वीकारने और मसिजीवी कहलाने में गर्व का अनुभव करने में थोड़ा समय लगा.

1963 में कलकत्ता (अब कोलकाता) के चौरंगी होटल में एक गोष्ठी में वे वरिष्ठ आलोचक विजयबहादुर सिंह से मिले तो जल्दी ही दोनों अभिन्न मित्र बन गए. विजयबहादुर सिंह बताते हैं कि हिंदी के कई दूसरे साहित्यकारों की तरह शलभ के सृजन की शुरुआत भी उर्दू से हुई और उन्होंने क्लासिक के साथ फैज, फिराक व मजाज के टेंपरामेंट वाली अनेक गजलें रचीं. हालांकि गजल के फार्म को लेकर वे जिगर मुरादाबादी से बहुत प्रभावित थे-भले ही जिगर रोमांटिक गजलकार थे और वे क्रांतिकारी.

आगे चलकर शलभ ने भाषा और छंद की सारी बंदिशें या कैदें अस्वीकार कर दीं और खुद को हिंदी-उर्दू की पूरी परंपरा का वारिस और उनकी कविता-परंपरा का नया अध्याय मानकर दोनों के बीच पूरी शक्ति व सामर्थ्य से संचरण करने लगे.

वे उन आलोचकों से बहुत चिढ़ते थे, जो कवियों को कालक्रम के मुताबिक किसी को इस तो किसी को उस दशक का कवि बताते थे. निजी जीवन में ‘अराजक’ होेने के बावजूद शलभ अपनी कविताओं की भाषा, छंद और कल्पनाओं को बेहद सधी हुई, सटीक व व्यवस्थित रखते थे. वे आम लोगों पर होने वाले हर तरह के अन्याय व अत्याचार के प्रति असहिष्णु थे और उनकी स्वाधीन काव्यदृष्टि निर्मम सत्ताओं या व्यवस्थाओं से लोहा लेने में किंचित भी आगा-पीछा नहीं करती थी.

उनका कवि तमाम तरह की यातनाओं से आंख मिलाने के हौसले व आत्मविश्वास से इतना भरा हुआ था कि उन्हें अपने समकालीनों में सबसे अलग और विशिष्ट बनाये बगैर रह नहीं पाता था. न उन्हें दुष्यंत जैसा बनने देता था, न अदम गोंडवी जैसा. इसीलिए गीत हो, नवगीत हो, नई कविता, पारंपरिक गजल, बदलावधर्मी नज्म या फिल्मी गीत-सबकी रचना में शलभ एक जैसी विशिष्टता के साथ बेलौस होकर सामने आते थे.

अलबत्ता, उन्होंने अपना पहला गीत किसी  क्रांतिकारी कवि से नहीं कालिदास के ‘मेघदूत’ से प्रभावित होकर लिखा था और अपनी गजलों के संस्कार के लिए अपने पैतृक जनपद के शायर अनवर जलालपुरी के कृतज्ञ थे.

उनकी पहली रचना उनके मूनलाइट थियेटर वाले दिनों में कलकत्ता के दैनिक ‘सन्मार्ग’ में शलभ फैजाबादी नाम से छपी थी. उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा था. जल्दी ही धर्मयुग, कल्पना, कादम्बिनी और साप्ताहिक हिंदुस्तान समेत उन दिनों की प्रायः सारी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी धूम मच गई थी.

1979 में वे फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने बंबई चले गए, जहां कुलभूषण खरबंदा के साथ भी कुछ वक्त गुजारा था. लेकिन फिल्मों की दुनिया उन्हें कुछ रास नहीं आई. उन्होंने कुछ फिल्मों के गीत लिखे भी तो वे उन नामी गीतकारों के नाम से लिए गए, जिनकी मार्फत उन्हें उनको लिखने का ऑफर मिला था. यह बात उनके अहं को गवारा नहीं हुई.

वैसे भी, नेपथ्य उन्हें जीवन में कभी स्वीकार नहीं रहा. जैसे निराला ने ‘मैं ही बसंत का अग्रदूत’ का उद्घोष किया था, वे खुद को प्रोजेक्ट करने में यकीन रखते थे.

बंबई से लौटकर वे पहले कलकत्ता, फिर विदिशा और अंत में अपने गांव मसोढा चले गए. मसोढ़ा में ही 23 अप्रैल, 2000 को  उन्होंने रहस्यमय परिस्थितियों में इस संसार को अलविदा कहा. उस वक्त वे ‘अवांतर’ नाम से एक मासिक के प्रकाशन की योजना बना रहे थे, जबकि उनके संपादन में निकली ‘अनागता’, ‘परंपरा’ और ‘रूपांबरा’ जैसी पत्रिकाएं खूब चर्चा बटोर चुकी थीं.

साथियों से 

अंत में शलभ का साथियों को चेताता हुआ वह गीत, जिसे वे अपनी कई और हसरतों की तरह संभवतः अधूरा छोड़ गए हैं:

ये किसने कह दिया भला सितम के दिन निकल गए !
रिकाबोज़ीन है वही सवार तो बदल गए !
सुना जो आंधियों के देश में चिराग जल गए !
वतनफ़रोश भी वतन के रहनुमाँ में ढल गए!
जिसे न पढ़ सके हो तुम
न ख़ुद पे मढ़ सके हो तुम
बदल के ज़िल्द आ गए सफ़े उसी क़िताब के!
भटक न जाएं साथियो ! क़दम ये इंक़लाब के !

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)