कार्ल मार्क्स, जिन्होंने मनुष्य की मुक्तिकामना को नया आयाम दिया

कार्ल मार्क्स ने न सिर्फ नई राह दिखाई बल्कि उसे प्रशस्त भी किया, तो उसके प्रति ज्यादा नहीं तो थोड़ा कृतज्ञ होना तो उन सबके लिए सामाजिक फ़र्ज़ है, जिन्होंने प्रतिकूल समकालीन परिदृश्य में भी बेहतर दुनिया बनाने के अपने सपनों से न समझौते किए हैं और न उन्हें मरने दिया है.

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कार्ल मार्क्स. (फोटो साभार: instagram/@CPIM)

दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति, श्रम, इतिहास, पत्रकारिता, प्रकृति के साथ राजनीति और श्रम पूंजी संबंध के वैज्ञानिक विश्लेषणों के सिलसिले में विभिन्न मोर्चों पर सक्रिय रहे कार्ल मार्क्स (जिनकी आज जयंती है) को दुनिया खासतौर से वैज्ञानिक समाजवाद के प्रणयन और मनुष्य की मुक्ति कामना को नया सैद्धांतिक आयाम देने के लिए जानती है. हां, उनकी कालजयी कृतियों- ‘दास कैपिटल’ और ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’- के लिए भी.

लेकिन वैज्ञानिक समाजवाद के इस सबसे बुरे दौर में उसकी गूढ़ तकनीकी या तात्विक विवेचनाओं व व्याख्याओं में गए बिना भी उसके इस प्रवर्तक को कई ऐसी बातों व परिघटनाओं के लिए याद किया जा सकता है, जो आज हमारे देखने में भले ही बहुत छोटी या कि सामान्य लगती हैं, इस अर्थ में बहुत बड़ी हैं कि वे इस दुनिया की व्यवस्था और साथ ही हमारे जीवन में कई उल्लेखनीय परिवर्तनों की वाहक रही हैं.

निस्संदेह, उनकी विचारधारा के इस पतझड़ में भी हमारे पास ऐसे परिवर्तनों के लिए कार्ल मार्क्स को धन्यवाद ज्ञापित करने के अवसरों की कोई कमी नहीं है.

मिसाल के तौर पर, जब हम निर्धारित अवधि तक काम करके अधिकारपूर्वक छुट्टी मांगते, लेते या पाते हैं, बीच में लंच ब्रेक लेते और सप्ताह में एक दिन अवकाश मनाते हैं, अपनी मेहनत की एवज में उचित मजदूरी या वेतन और सेवानिवृत्ति पर मिलने वाले भविष्य निधि व पेंशन जैसे लाभ पाते हैं या नहीं पाते, भेदभाव, अन्याय व शोषण आदि के शिकार होते हैं तो उनके खिलाफ संगठित होकर आवाज उठाते, उनका प्रतिरोध करते और कहते हैं कि हमको भी अपनी तरह से जीने का हक है तो जाने-अनजाने कार्ल मार्क्स की दिखाई राह का ही अनुसरण कर रहे होते हैं. क्योंकि उनसे पहले की, शोषण, भेदभाव व गैरबराबरी की नींव पर खड़ी दुनिया में ऐसे अधिकारों व प्रतिरोधों दोनों की सख्त मनाही थी. कहना चाहिए कि उनकी सम्यक चेतना को ही उभरने नहीं दिया जाता था.

ऐसे में कार्ल मार्क्स ने हमारी चेतनाओं को झकझोर कर न सिर्फ नई राह दिखाई बल्कि उसे प्रशस्त भी किया, तो उसके प्रति ज्यादा नहीं तो थोड़ा कृतज्ञ होना तो उन सबके लिए सामाजिक फर्ज है ही, जिन्होंने प्रतिकूल समकालीन परिदृश्य में भी बेहतर दुनिया बनाने के अपने सपनों से न समझौते किए हैं और न उन्हें मरने दिया है.

दरअसल, वे कार्ल मार्क्स ही थे, जिन्होंने 1848 में कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में सर्वप्रथम बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान किए जाने और कारखानों को बालश्रम के अभिशाप से मुक्त किए जाने की बात कही. बच्चों को निजी स्कूलों तक में मुफ़्त शिक्षा देना उनके इस घोषणा पत्र के दस बिंदुओं में से एक था.

कहा उन्हें भले ही दार्शनिक जाता है, लेकिन जानकार बताते हैं कि इस काम में उन्होंने एक्टिविस्ट यानी कार्यकर्ता की तरह रुचि ली और वैसी ही भूमिका निभाई.

उनके सिलसिले में सुविदित होने के कारण यह तथ्य तो खैर बताने की बात भी नहीं कि वे दुनिया को वर्ग विभाजित मानते और चाहते थे कि श्रमजीवी वर्ग के लोग अपनी ज़िंदगी के मालिक खुद हों और खुद ही तय करें कि उनको कैसे जीना है. उनसे पहले इस वर्ग के लोगों का समय तक उनका नहीं होता था और वे अपनी खुद की ज़िंदगी के लिए नहीं सोच पाते थे. क्योंकि पूंजीवादी समाज व्यवस्था ने जीने के लिए उसकी अमानवीय शर्तों पर अपना श्रम बेचने को उनकी मजबूरी बना दिया था और उनसे अधिकांश समय मेहनत कराने के बाद उन्हें उसके हिसाब से मजदूरी या मेहनताना भी नहीं दिया जाता था.

मार्क्स इस स्थिति को पलटना चाहते थे ताकि श्रमजीवियों की ज़िंदगी पर उनका खुद का अधिकार हो और उनका जीना सबसे ऊपर हो जाए. ताकि वे आज़ादी से अपने भीतर की सृजनात्मक क्षमताओं का विकास कर पाएं. उनका मानना था कि लोगों का काम उनको तभी सच्ची खुशी प्रदान कर सकता है, जब वह उनकी पसंद का, उनके मन का हो.

साफ कहें तो वे दुनिया के पहले ऐसे दार्शनिक थे जो काम की संतुष्टि को इंसान की बेहतरी से जोड़कर देखते थे. उनका कहना था कि चूंकि इस वर्ग के लोग अपना अधिकांश समय काम करने में खर्च करते हैं, इसलिए ज़रूरी है कि उनके काम से उनको खुशी मिले. साथ ही वे मजदूरों को दुनिया को बदलने वाले हिरावल दस्ते के रूप में देखा करते थे और चाहते थे कि वे शोषण, अन्याय व भेदभाव का संगठित प्रतिरोध करें.

उनके प्रयासों और प्रयोगों के चलते उनके बाद की दुनिया ने श्रमजीवियों द्वारा संगठित विरोध किए जाने के कारण कई देशों की सामाजिक दशा बदलती देखी है. रंगभेद और जाति आधारित भेदभाव आदि के ख़िलाफ़ क़ानून इसी बदलाव की परिणति हैं.

कार्ल मार्क्स की युवावस्था का एक वाकया है. एक दिन वे किसी काम से कहीं जा रहे थे तो उन्होंने एक मजदूर को दीवार पर सफेदी करते देखा. गौर करने पर उन्होंने पाया कि उपयुक्त कौशल के भाव में वह सफेदी में प्रयुक्त सामग्री और अपने समय दोनों की कुछ ज्यादा ही बर्बादी कर रहा था. यह देखकर पहले तो वे कुछ सोच में पड़ गए, फिर उसके पास गए और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले, ‘कॉमरेड, तुम सीखना चाहो तो मैं तुम्हें कम समय और कम सामान में अच्छी तरह से सफेदी करने की तरकीब सिखा सकता हूं.’

मजदूर कुछ बोल नहीं सका, लेकिन वह सीखना भला क्यों नहीं चाहता? उसने इसके लिए हामी भर दी तो मार्क्स ने अपनी शर्ट की बांहें ऊपर कीं और सीढ़ियां चढ़कर खुद तेजी से सफेदी करने और उसे सिखाने लगे. कुछ ही समय में उन्होंने वह तरकीब मजदूर को सिखा दी, जिससे उसका काफी समय व सामान तो बचा ही सफेदी भी बहुत अच्छी हुई.

मजदूर कृतज्ञ होकर बोला, ‘दरअसल, मैं सफेदी करने का ही काम करता हूं‌. आपने मुझे कम लागत और समय में अच्छी सफेदी करने की जो तरकीब सिखाई है, वह मेरे जीवन में बहुत काम आएगी. आगे से मैं इसी तरकीब से सफाई करूंगा.’ इस पर उन्होंने उसकी पीठ ठोंकी और चलने को हुए तो दीवार के मालिक ने, जिसने उक्त मजदूर को काम पर रखा था, उनको बुलाया और कहा कि वह बहुत खुश हुआ है और उनको ईनाम देना चाहता है.

इस पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक ईनाम लेने से इनकार कर दिया और कहा, ‘इस ईनाम पर तो इस मजदूर का ही हक है, क्योंकि काम तो इसने ही किया है. मैंने तो बस थोड़ी अक्ल लगाकर उसे काम को सही ढंग से करने का तरीका समझाया है.’

कहते हैं कि मार्क्स का यही नजरिया था, जिसका विकास करते हुए आगे चलकर उन्होंने साम्यवाद के सिद्धांत और शासन प्रणाली को जन्म दिया, जिसने 1818 में 05 मई को जर्मनी में उनके जन्म के दो सौ से ज्यादा सालों बाद भी नाना अस्वीकारों व तिरस्कारों के बावजूद उन्हें प्रासंगिक बना रखा है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)