‘साबरमती के संत’ महात्मा गांधी की सामाजिक-राजनीतिक समझ व सक्रियताओं को आकार व दिशा देने वाले ऐसे शख्स, जिन्हें महात्मा ने आत्मकथा में अपना राजनीतिक गुरु तो माना ही, उन पर गुजराती में लिखी अपनी पुस्तक में ‘धर्मात्मा’ कहकर भी संबोधित किया. ऐसे ‘धर्मात्मा’, जो मोहम्मद अली जिन्ना के लिए भी वे उतने ही आदरणीय थे. बाल गंगाधर तिलक की निगाह में ‘भारत के हीरे’, जबकि कई अन्य के निकट ‘आधुनिक दक्षिण एशिया के निर्माता’ की उपाधि के प्रबलतम हकदार, जो आर्थिक व वित्तीय विषयों की अद्वितीय जानकारी के लिए ‘भारत के ग्लैडस्टोन’ कहलाते थे.
इतना ही नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट के जज, प्रसिद्ध इतिहासकार व समाज-सुधारक महादेव गोविन्द रानाडे के शिष्य और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे प्रसिद्ध नरमपंथी नेता.
हम यहां उम्र की भयानक नाइंसाफी के शिकार हुए स्मृतिशेष गोपालकृष्ण गोखले का ज़िक्र कर रहे हैं.
उम्र की नाइंसाफी
अपने समय के अग्रणी नरमपंथी राष्ट्रवादी राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, विचारक और समाज सुधारक गोखले उम्र की नाइंसाफी के कारण अपने अड़तालीसवें वसंत में ही इस संसार को अलविदा कहने को मजबूर हो गए थे. लेकिन अंतिम सांस लेने से पहले सामाजिक आर्थिक सुधारों व स्वतंत्रता संघर्ष के अभियानों में अपने पल-पल का सदुपयोग कर उन्होंने ऐसी दुर्लभ स्वीकार्यता हासिल कर ली थी कि जो स्वतंत्रता सेनानी स्वतंत्रता संग्राम के उनके रास्ते को ठीक नहीं समझते थे, उनके पास भी उनके विरुद्ध कहने के लिए कुछ नहीं हुआ करता था.
इसकी सबसे बड़ी मिसाल यह है कि जो बाल गंगाधर तिलक उन्हें ‘भारत का हीरा’ कहते थे, भले ही स्वयं स्वतंत्रता के लिए विरोध, वहिष्कार और आंदोलन के हिमायती थे, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि गोखले स्वतंत्रता संघर्ष के संवैधानिक तरीके अपनाने को बेहतर मानते हैं. उन्हें इससे भी फर्क नहीं ही पड़ता था कि 11 साल की बंगाली लड़की फूलमनि की उसके पति के बलात्कार से मौत की विचलित करने वाली बहुचर्चित घटना के बाद 1891 में अंग्रेजों ने एज ऑफ कंसेंट ऐक्ट बनाकर शारीरिक संबंध के लिए सहमति देने की लड़कियों की न्यूनतम उम्र 10 से बढ़ाकर 12 साल कर दी तो गोखले उक्त कानून के विरुद्ध तिलक के स्त्री-विरोधी, प्रतिगामी व रूढ़िवादी विचारों के खिलाफ खुलकर खड़े हो गए थे.
1907 में बढ़ते मतभेदों के चलते कांग्रेस अपने सूरत अधिवेशन में नरम दल व गरम दल के विभाजित हुई तो भी गोखले व तिलक अलग-अलग खेमों में थे. अलबत्ता, इससे पहले 1905 में गोखले इन्हीं तिलक के साथ ब्रिटिश सत्ताधीशों के सामने देश की आजादी का पक्ष रखने इंग्लैंड भी गए थे. क्योंकि कुशल, प्रभावशाली और तर्कशील वक्ता होने के कारण इस काम के लिए वे तिलक सहित हर किसी की पसंद थे.
इसी तरह महात्मा गांधी को गोखले द्वारा गठित सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी में शामिल होने को लेकर हिच थी और कुछ मामलों में उनके विचार भी एक दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाते थे (मिसाल के तौर पर गांधी के सत्य और अहिंसा के प्रयोगों के वे निर्द्वंद्व समर्थक थे, लेकिन अहिंसा के उपयोग में सावधानी बरतने की बात कहते थे और ऐसे संस्थानों व साधनों में भी विश्वास करते थे, जिनको लेकर गांधी सहज नहीं थे) लेकिन उन्हें अपना राजनीतिक गुरु स्वीकारने में गांधी को कतई कोई हिचक नहीं थी.
तिस पर आज की तारीख में यह कल्पना भी मुश्किल में डालती है कि अगर गोखले दक्षिण अफ्रीका में गांधी के संघर्षों से प्रभावित होकर उन्हें भारत आकर भारतीयों के लिए संघर्ष करने को प्रेरित नहीं करते, तो हमारे स्वतंत्रता संघर्ष का क्या हुआ होता.
‘महात्मा’ का निर्माण
कहते हैं कि मोहनदास कर्मचंद गांधी के महात्मा बनने में जिन कुछ शख्सियतों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है, उनमें गोखले का नाम पहला है. अपनी आत्मकथा में महात्मा ने स्वयं गोखले को अपना ‘शेर की तरह बहादुर और विशाल हृदय’ राजनीतिक गुरु स्वीकार किया है.
1896 में 12 अक्टूबर को पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में हुई दोनों की पहली भेंट को याद करते हुए गांधी लिख गए हैं कि गोखले ने उन पर प्रारंभिक प्रभाव डाला और उनके प्रति उनके हृदय में श्रद्धा उत्पन्न हुई. लेकिन दोनों में देश के हालात पर विस्तार से विचार-विमर्श 1901 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में संभव हुआ, जो उस वक्त ब्रिटिश भारत की राजधानी हुआ करता था. इसके बाद दोनों के बीच मधुर संबंधों और पत्र व्यवहारों का सिलसिला चल निकला.
इस सिलसिले में गोखले सुदूर दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के हक की लड़ाई लड़ने वाले वकील मोहनदास करमचंद गांधी को आम भारतीयों की दुर्दशा के बारे में बताकर उनसे अपने देश वापस आकर उन्हें दुर्दशा से मुक्त कराने का आग्रह करते रहे. वे गांधी को भारत बुलाकर कांग्रेस द्वारा भारतीयों के भले के लिए किए जा रहे प्रयासों में सहभागी बनाना चाहते थे.
इसलिए गांधी ने उनसे दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ जारी लड़ाई में शामिल होने का आग्रह किया तो 1912 में वे वहां गए और उस लड़ाई में जो योगदान संभव था, वह दिया. 1915 में नौ जनवरी को उनके बुलावे पर गांधी इंग्लैंड के रास्ते स्वदेश लौटे तो बंबई (अब मुंबई) के बंदरगाह पर भावभीने स्वागत के बीच गोखले ने उन्हें गुरुमंत्र दिया कि वे देश की जमीनी सच्चाइयों और वास्तविक चरित्र से वाकिफ होने के लिए उसके दूरदराज के गांवों तक की यात्राएं करें. गांधी ने जीवन भर इस गुरुमंत्र को शिरोधार्य किए रखा.
दरअसल, उस वक्त तक गांधी स्वतंत्रता सेनानी की भूमिका में कम, सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में ज्यादा थे. इसलिए गोखले ने उनको स्वतंत्रता संघर्ष के तौर-तरीके सिखाने की बेहद जरूरी जिम्मेदारी निभाई. उन्हें यह भी सिखाया कि निर्भय होकर लोगों के समक्ष अपनी बातों को वैसे ही तर्कसम्मत ढंग से कैसे रखें, जैसे वे खुद रखा करते हैं. हम जानते हैं कि गांधी भाषण की कला में गोखले जितने पारंगत नहीं थे.
गोखले उनकी समझ व सक्रियताओं को अपने तई और संवारना चाहते थे, लेकिन बेवफा मौत अगले ही महीने 19 फरवरी,1915 को दबे पांव आई और उन्हें इस संसार से बहुत दूर उठा ले गई.
समाज सुधार के काम
लेकिन जब तक वे संसार में रहे, राजनीतिक संघर्षों के साथ सामाजिक सुधार के संघर्षों में भी जूझते रहे. छुआछूत, जाति प्रथा, बंधुआ मजदूरी व बाल विवाह जैसी कुरीतियां व कुप्रथाएं हमेशा उनके निशाने पर रहीं. जब भी इनके खिलाफ अभियान चले या कानून बने, वे मुखर होकर उनके पक्ष में बोले और उनकी अगुवाई भी की. भले ही समाज के एक वर्ग ने उन्हें अपनी संरचना में दखल माना.
1866 में 09 मई को तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी के रत्नागिरी जिले के कोटलुक ग्राम में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्मे गोखले ने पिता कृष्ण राव को छुटपन में ही खो दिया था, जिसके चलते पहले अपने जीवन, फिर स्वतंत्रता और समाज सुधार के संघर्षों की आंच ने उनकी कर्मठता और कर्तव्यपरायणता को खूब तपाया.
इस तपिश के बीच उनका सौभाग्य कि उनके उच्च शिक्षा के पात्र होने तक देश विश्वविद्यालयी शिक्षा के उन्मुख हो चला था और विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाने वाले भारतीय छात्रों की पहली पीढ़ी में शामिल होने में उनको किसी बड़ी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा.
संयोग ऐसा कि इधर 1884 में उन्होंने एलफिंस्टन कॉलेज में अपनी शिक्षा पूरी की और उधर बाल गंगाधर तिलक और अगरकर ने डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की. एक साल बाद गोखले तिलक के संपर्क में आए और इस सोसाइटी द्वारा संचालित एक स्कूल में पढ़ाने लगे. फिर फर्ग्यूसन कॉलेज में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक के रूप में डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी में सम्मिलित हुए. 1902 में इस कॉलेज से इस्तीफा देने से पहले उन्होंने वहां छात्रों को राजनीतिक अर्थव्यवस्था, गणित और अंग्रेजी साहित्य पढ़ाया.
1889 में उनके गुरु महादेव गोविंद रानाडे ने उन्हें उन्नीस साल पहले स्थापित अपनी संस्था पूना सार्वजनिक सभा की त्रैमासिक पत्रिका का संपादक नियुक्त किया. अनंतर वे इस सभा के सचिव बने और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
कांग्रेस में सक्रिय हुए तो वेल्बी कमीशन के समक्ष भारत में गरीबी और अकाल के सिलसिले में खर्च पर गवाही देने इंग्लैंड गए, जो ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में व्यय प्रशासन, साफ कहें तो फिजूलखर्ची, पर 1895 में गठित रायल आयोग था. अपनी गवाही में उन्होंने किसानों पर शोषणकारी कर के बोझ के खिलाफ़ अपना पक्ष रखा और अत्यधिक सैन्य व्यय के मद्देनजर राजकोषीय विवेक का आह्वान किया.
वहां से लौटे तो 1899 में बंबई विधान सभा और 1902 में इंपीरियल विधान परिषद के चुनाव लड़े और जीते. 1902 और 1906 के बीच, उन्होंने पूना नगरपालिका के अध्यक्ष पद की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी निभाई और भारत लोक सेवा समाज के संस्थापक और अध्यक्ष भी रहे.
पहले कर्तव्य, फिर अधिकार
उन्होंने महिलाओं सहित सबके लिए मुफ्त और सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की वकालत तो की ही, वैज्ञानिक व तकनीकी शिक्षा को देश की सबसे बड़ी जरूरत माना. सारे भारतीयों, खासकर युवाओं को सार्वजनिक जीवन के लिए प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से उनमें शिक्षा के विस्तार के लिए 1905 में सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की. वे चाहते थे कि भारतीय ऐसी शिक्षा प्राप्त करें जो उनमें कर्तव्यपालन और देशभक्ति की भावना पैदा करे.
इसके लिए उन्होंने सचल पुस्तकालयों व स्कूलों के साथ औद्योगिक श्रमिकों के लिए रात्रिकालीन कक्षाओं की व्यवस्था भी की. उनका मानना था कि शिक्षा और प्रशिक्षण के सारे रूप मनुष्य व चरित्र के निर्माण के लिए होने चाहिए और अधिकारों की मांग कर्तव्यों के पालन के बाद ही की जानी चाहिए.1908 में, उन्होंने अपने एक और महत्वपूर्ण उपक्रम ‘रानाडे इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक्स’ की स्थापना भी की थी.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
