लेखक का काम अपने समय को दर्ज करने के अलावा कुछ भी नहीं. दर्ज करने के अपने तरीके हैं, पैंतरे हैं, छुपाने की चालाक कोशिशें भी इसी दर्ज करने के विस्तार में अंतर्निहित है. लेखक का काम स्मृतियों, भविष्य की संकल्पनाओं और वर्तमान से टकराए या उसे साधे बिना नहीं चल सकता. इसलिए वह यदि ईमानदार है तो उसे मज़बूती से अपने पांव थहाने होंगे और उड़ने की क्षमता भी हासिल करनी होगी.
सूक्तियों की तरह थमाए गए ऐसे वाक्य या ऐसी संकल्पनाएं अब मनोवैज्ञानिक तौर पर मेरी बहुत मदद नहीं कर पातीं. वह क्या है जो भीतर ही भीतर टूट रहा है? वह क्या है जो लगातार दरक रहा है? वह क्या है जो भाषा की पकड़ में आने के बावजूद अपनी गरिमा को प्राप्त नहीं कर पाता और जिसके कारण लिखना केवल आदत का हिस्सा लगने लगा है और वह भी धीरे-धीरे छूट-सा रहा है? कहीं मैं उस मुहावरे में तो नहीं जी रहा हूं कि न निगलते बने न उगलते?
कहते हैं कि लिखना ही लेखक की मुक्ति है. लिखना यानी रचनात्मक और सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना. लेखक के सरोकार जितने बड़े होंगे, जीवन में धंसने का साहस जितना गहरा होगा, उसके लेखन की धार भी उतनी ही तीखी होगी. ये सारी बातें सच हैं लेकिन सापेक्षिक हैं.
हिंदी भाषा का रचनाकार होने के अपने अनुभव से मैं जानता हूं कि हिंदी-भाषी समाज में एक लेखक की हैसियत कई अन्य समाजों की तुलना में सम्मानजनक नहीं है. इतना बड़ा बाज़ार और मनोरंजन-उद्योग, दूसरी भाषाओं के साहित्य और समाज-विज्ञान की इतनी तेज़ आमद, लेकिन फिर भी हिंदी के लेखकों की उपस्थिति आज के समाज में पूरी गंभीरता के साथ नहीं है. इसके लिए बड़ी आसानी से लेखक पर दोष मढ़ दिया जाता है कि उसके पास अब नए समय को समझने की दृष्टि, खतरा उठाने का साहस और रचनात्मक ऊर्जा नहीं बची है.
यदि यह किसी हद तक सच भी है तो एकांगी सच ही है. हिंदी समाज, विशेषकर मध्यवर्ग, के भीतर जिस सांस्कृतिक और सामाजिक जागरूकता की अपेक्षा की जाती है, उसका व्यापक रूप में घोर अभाव तो है ही, उसका जागरूक तबका भी हिंदी लेखन की दुनिया से बाहर चला गया है या लगातार जा रहा है. गुज़रे तीन-चार दशकों से हिंदी समाज में हिंदी साहित्य के प्रति भावनात्मक लगाव में भयंकर कमी आई है.
कहा जाता रहा है कि यह एक दुर्गम समय है. शब्द की उपस्थिति और उसका प्रभाव कम हुआ है. शब्द की जगह को बाज़ार ने बाकायदा विरूपित करते हुए हथिया लिया है. मध्यवर्गीय घरों के भीतर किताबों के लिए जगह नहीं बची है. जीवन की बुनियादी चीज़ों तक जुटा पाने की मुश्किल में फंसी जनता का तो कहना ही क्या!
लेखक की व्यापकता और उसकी उपस्थिति का ग्राफ गिरता गया है. टेलीविज़न के सस्ते धारावाहिकों, प्रायोजित बहसों, झूठे खतरों, धार्मिक नौटंकियों और प्रतिस्पर्धाओं ने शब्द की जगह को और भी सीमित कर दिया है. सचमुच बतौर रचनाकार मुझे भी यह कठिन समय लगता है. इसका मतलब यह नहीं है कि मैं कबीर, तुलसी, भारतेंदु, निराला, प्रेमचंद, मुक्तिबोध या नागार्जुन के समय को आसान मानता हूं. आखिर कबीर भी रात भर जागते और रोते थे और निराला ने लिखा ही था कि ‘रेत ज्यों तन रह गया है.’
इसके बावजूद भी मैं लगातार लिखता रहा हूं तो इसका यह अर्थ नहीं है कि मेरे भीतर कोई द्वंद्व नहीं है. अक्सर लिखते हुए मेरे सामने कुछ सवाल सीधे खड़े हो जाते हैं –
क्या मैं अपने समय को ठीक से समझ पा रहा हूं ?
उसे व्यक्त करते हुए कहीं घाल-मेल तो नहीं कर रहा हूं ?
क्या मेरे लिखे हुए की कोई कलात्मक या रचनात्मक उपयोगिता है?
क्या मेरा लिखा हुआ कभी कहीं पहुंच पाएगा या केवल मेरे अहं की तुष्टि करके रह जाएगा ?
ये ऐसे सवाल हैं जिससे हर लेखक टकराता होगा, जूझता होगा. बतौर लेखक मैं भी इनसे जूझता हूं और जूझते-जूझते बहुत बुनियादी सवालों तक पहुंच जाता हूं कि मैं क्यों लिखता हूं? किसके लिए लिखता हूं? क्या मैं अपने अब तक के रचनात्मक सफ़र से संतुष्ट हूं?
मैं लिखता हूं क्योंकि ऐसा करना मैं ज़रूरी समझता हूं. और इसीलिए किसी एक विधा में नहीं जब जैसी ज़रूरत आन पड़े उस विधा में लिखता हूं – कविता, कहानी, रिपोर्ताज, समीक्षा, लेख, डायरी और पत्र से लेकर फ्लैप, भूमिका, सम्पादकीय, हैंडबिल और पंफ्लैट तक. सोशल मीडिया में भी जब-तब कुछ वाक्य फेंक आता हूं. अपने मन का भी और एक रचनात्मक समाज के बनने की राह में दूसरे समानधर्माओं की ज़रूरतों पर भी. मैं उनके लिए लिखता हूं जो पढ़ते हैं या भविष्य में कभी पढ़ेंगे. और उनके हक़ में, जो इस दुनिया को गढ़ते हैं. लेकिन सच कहूं तो मैं लगभग नाउम्मीदी से घिरकर लिखता हूं.
जब मैंने विधिवत लिखना शुरू किया, यानी 1990 के बाद, तब से लेकर आज तक चीज़ें ज़्यादा हिंसक और जटिल हुई हैं. भाषा, प्रांत, धर्म, जाति, वर्ग और लैंगिकता के आग्रह बढ़ते ही गए हैं. जन-अधिकारों का दमन भारतीय राज्य की ज़रूरत बन गई है. मुसलमानों को सार्वभौम विरोधियों में बदला जा चुका है. उन्हें लगातार गौण नागरिकता के लिए बाध्य किया जा रहा है.
प्रशासन, न्याय और चुनाव प्रहसन में बदलते जा रहे हैं. धार्मिक उत्सव श्रद्धालुओं के उत्सव नहीं रह गए हैं बल्कि उन्हें बहुसंख्यक उन्माद में बदला जा चुका है. और इसमें राज्य की भूमिका सर्वोपरि है. मैं एक ऐसे समय से घिरा हूं जहां हत्या और बलात्कार के तरीके इतने भयंकर हो चुके हैं जिसकी कल्पना भी बीते समय में मुश्किल थी. आवेश में आकर या दुश्मनी में मार देना और ठण्डे दिमाग से किसी की हत्या कर उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर फ्रिज में रखना और फिर धीरे-धीरे उसे ठिकाने लगाना! इलाहाबाद के एडवोकेकेट राकेश गुप्ता एक बार कह रहे थे कि न्यायपालिका खुद मुश्किल में है कि इन दोनों तरह की हत्याओं के अंतर को परिभाषित कैसे करे! उसके पास तो हत्या की अधिकतम एक ही सजा है मृत्युदंड, जबकि दोनों तरह की हत्याएं एक नहीं हैं. ऐसी ही स्थिति बलात्कार को लेकर भी है.
जब लिखना शुरू कर रहा था तब सोवियत संघ ढह रहा था और मस्जिद को गिराए जाने का षड्यंत्र चरम पर था. जातिवाद अधिक संगठित होकर सामने आ रहा था. अब वह छुआछूत जैसे प्रारंभिक रूप तक सीमित नहीं था बल्कि संगठित हमले, प्रतिष्ठा की लड़ाई, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और वोटबैंक से लेकर नई आवासीय कॉलोनियों तक में एक भिन्न रूप में दिखाई पड़ रहा था. जब लिखना शुरू कर रहा था तब शंकर गुहा नियोगी की हत्या हुई थी और अब हत्याओं और गिरफ्तारी को मध्यवर्गीय जन-उत्सव बनाने में सरकारों ने अभूतपूर्व सफलता अर्जित कर ली है. अयोध्या, मुंबई, गुजरात और असम से होते हुए हमने दादरी और मुजफ्फर नगर तक का सफर तय कर लिया है.
कश्मीर और मणिपुर के हालात किसी से छिपे नहीं हैं. काशी, वृंदावन, संभल और औरंगाबाद अगले पड़ाव हैं. मुसलमान, दलित और किसानों के प्रतिरोध को देशद्रोह मान लिया गया है. हर जगह जलते हुए शहर या राज्य की तस्वीरें दिखाई पड़ रही हैं. फिर भी वादे और दावे ज़ोर-शोर से ज़ारी हैं और अपनों को खोई जनता तक इन वादों और दावों की गिरफ्त में फंसी है. समूचा विपक्ष अब आरोप में है या मज़ाक में. न्याय को बुलडोज़र ने अपदस्थ कर दिया है और उसका बेशर्म प्रदर्शन ज़ारी है. वामपंथ इस कदर बिखरा हुआ है कि घोर अवसरवादी भी उसे ढकेलकर गिराए दे रहे हैं. कभी वामपंथी और प्रगतिशील कहलाने वाले रचनाकार उदारवादी, अवसरवादी और न मालूम कौन-कौन से वादी कहलाते जा रहे हैं.
सोशल मीडिया पर इस कदर क्रांति है कि राजेश जोशी के शब्दों को उधार लेकर कहूं तो ‘जो इसमें शामिल नहीं होंगे, वे मारे जाएंगे.’ खौफ़नाक समय जिस क्रूरतम रूप में शुरू हुआ था उसका परिणाम अब सामने आ चुका है. एक मुश्किल तो यह भी है कि लोग व्यंग्य समझना तक भूल चुके हैं. आप व्यंग्य में प्रशंसा करते हैं और लोग कहते हैं – धन्यवाद !
व्यंग्य समझने और सहने की क्षमता भी लगातार कम हो रही है. मैं अकादमिक जगत से हूं और देख रहा हूं कि अकादमिक स्तर की चाटुकारिता की तो कोई सीमा भी नहीं रह गई है. लोग अनंत तक गिर चुके हैं लेकिन अभी और गिरना चाहते हैं !
मैं लिखता हूं तो अपने आपको और तमाम लोगों को इस खतरे से आगाह करने के लिए लिखता हूं और कभी-कभी अपने आनंद के लिए भी. बिना आनंद की इच्छा और उसके सपने के, मैं कैसे इन चीज़ों का सामना कर पाऊंगा या दूसरों को प्रेरित कर पाऊंगा?

गुज़रे तीस-पैंतीस वर्षों से लिखते हुए मैं यह भी महसूस करता हूं कि मेरा अपनी रचनाओं की उपस्थिति और उसकी व्यापकता पर भरोसा कम हुआ है बल्कि संशय ही बढ़ा है. हालांकि कई ऐसे क्षण भी आए जब विश्वास भी कायम हुआ. ‘शुक्रवार’ में जब एक कविता ‘कुछ भी अलौकिक नहीं होता’ छपी तब एक पाठक का फोन आया. वह विगत दिनों अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपने अकेले बेटे के साथ रहते हुए सदमे में था, घनघोर अवसाद में. ऐसे ही समय उसने यह कविता पढ़ी और उसे संबल मिला. वह अब फिर से जीने के लिए उठ खड़ा हुआ था.
ऐसी ही एक और प्रतिक्रिया सुदूर हिमाचल के एक गांव से मिली. वह पाठक बाज़ार से जिस पुड़िया में मसाले बंधवाकर लाया था उसमें मेरी एक कविता ‘घर और पड़ोस’ का आधा हिस्सा था और फोन नंबर भी. उसने फोन पर पूरी कविता सुनाने की गुजारिश की और उसे कविता बहुत अच्छी लगी. वरिष्ठों, मित्रों और पाठकों की प्रतिक्रिया मुझे तात्कालिक सुख ज़रूर देती है लेकिन साहित्य की दुनिया में जो प्रायोजित प्रपंच और अनियंत्रित महत्वाकांक्षाएं हैं, उसमें अपने आपको अक्सर चुका हुआ ही पाता हूं.
इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं लिखने की ज़िम्मेदारी से बचने या भागने की कोशिश कर रहा हूं. बल्कि शिद्दत से महसूस कर रहा हूं कि केवल लिखना ही लेखक की मुक्ति नहीं है. लिखने के समानांतर एक नई दुनिया के निर्माण की कोशिश भी मेरा ही दायित्व है. हो सकता है कि बहुत से लेखक इस तरह के दायित्व को अतिरिक्त ज़वाबदेही समझते हों. उनकी आलोचना मेरा ध्येय नहीं है लेकिन मेरे तईं यह अतिरिक्त नहीं है.
मेरा मानना है कि यह दायित्व केवल दूसरों को ही नहीं, मुझे भी निभाना होगा. मैं यह स्पष्ट तौर पर मानता हूं कि यदि समाज अपने समय की रचनात्मकता के प्रति जिज्ञासु और जागरूक होगा तो वह मुझे भी पढ़ेगा. मेरी मुक्ति अकेले में नहीं सामूहिकता में ही है. जो लोग केवल व्यक्तिगत प्रचार-प्रसार में लगे हैं वे समुद्र में डूब रहे जहाज़ से पानी में कूद गए हैं और समुद्र को लांघ जाने की कोशिश में हैं. भला ऐसे भी समुद्र कभी पार होता है?
अपने परिवेश की रुचिशीलता को जागरूक बनाना मेरा ही दायित्व है. यह सब करते हुए भी न मालूम क्यों मेरे भीतर का रचनाकार एक निरापद चुप्पी में घिरता जा रहा है. बहुत शोर के अंतराल में एक न देखी जा रही चुप्पी! हो सकता है कि आने वाले दिनों में उस चुप्पी के भीतर से ही कोई नया रचनात्मक विस्फोट हो! हो सकता है कि न भी हो. पर विश्वास की डोर से ख़ुद को बांधे रखने में हर्ज ही क्या है?
(बसंत त्रिपाठी कवि-आलोचक हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)
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