‘सार, रिलीफ़ इन्स्पेक्टर एकटू टिपिन कोरते गिएचेन. फीरलेई आशते बोले देवा होबे (सर, रिलीफ़ इन्स्पेक्टर ज़रा टिफिन करने गए हैं. लौटते ही उन्हें आने के लिए बोल दिया जाएगा).’
एक ग्रुप डी स्टाफ़, यानी चपरासी, ने आकर मुझे बताया. 1992 का शीत काल. धूप से सराबोर दिन के क़रीब तीन बजे थे और मैं कॉनटाई, यानी कांथी, सबडिवीज़न के सबडिवीज़नल ऑफिसर (एसडीओ) के पद पर कार्यरत था. पश्चिम बंगाल में एक साल के ज़िला प्रशिक्षण के पश्चात तीन माह पूर्व मैं कांथी आया था. इस राज्य में ‘टिपिन’ या ‘टिफिन’ की अवधारणा से मैं अवगत हो चुका था, परंतु इसके अर्थों से मेरा परिचय धीरे-धीरे बढ़ रहा था.
सर्वप्रथम कांथी में तथा उसके बाद बंगाल में मुझे जहां भी काम करने का मौक़ा मिला मैंने पाया कि डेढ़ बजे से चार बजे तक अगर आप अफ़सर या कर्मचारियों की तलाश करें और आपको सूचित किया जाए कि वह टिफिन करने गए हैं तो आपको अचंभित नहीं होना चाहिए. इस दौरान कोई भी टिफिन करने के लिए अपनी कुर्सी से ग़ैरहाज़िर हो सकता है. यह हर कर्मचारी का गणतांत्रिक अधिकार है.
इस स्तंभ के पाठक बंगाल में सरकारी कर्मचारियों के बीच चल रही आधी-कप चाय की पुरातन प्रथा से परिचित हैं. यहां तीन बातें ध्यान रहें: एक, चाय और टिफिन के ब्रेक भिन्न हैं; दूसरी, चाय के समय ईमानदारी से सिर्फ़ चाय का सेवन होता है नाश्ते का नहीं, जबकि टिफिन में चाय भी शामिल हो सकती है; और, तीसरी, जिस तरह आप कर्मचारियों को चाय पीने से नहीं रोक सकते हैं उसी तरह आप उन्हें टिफिन करने से भी नहीं रोक सकते. हां, अगर कोई दिन में बारम्बार टिफिन करने के लिए दृढ़ संकल्प पाया जाए तो फिर आप उसे टोक सकते हैं. ऐसा नियम नहीं था, बस परिपाटी बन चुकी थी.
टिफिन शब्द का व्यवहार तथा टिफिन का प्रचलन दोनों ही हमारे देश में औपनिवेशिक शासन के दौरान आरंभ हुए. इस देश के गर्म मौसम ने अंग्रेजों को अपने खान पान की प्रणाली में परिवर्तन करने पर मजबूर कर दिया था. अपने देश में उनका मुख्य भोजन देर से, दोपहर के बाद होता था, जिसे ‘डिनर’ के नाम से जाना जाता था. गर्मी के कारण भारत में दिन में उन्हें हल्का खाना ही भाया और उनका प्रधान भोजन संध्या के समय होने लगा, जो अब यहां डिनर कहलाने लगा. औपनिवेशिक कठबोली में टिफ़ का अर्थ था एक छोटा निर्बल पेय और इसी से दिन के इस हल्के-फुल्के भोजन का नाम टिफिन पड़ा.
संभावित है कि टिफिन का अविष्कार ईस्ट इंडिया कंपनी के मुख्यालय, कलकत्ता, में हुआ हो परंतु शीघ्र ही इसका विस्तार मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेन्सी में और कमोबेश फिर पूरे भारत में हो गया. इसलिए टिफिन का रिवाज सिर्फ़ बंगाल में ही नहीं पाया जाता है एवं अन्य राज्यों की तरह यहां भी इसकी कुछ विशेषताएं हैं.
दक्षिण भारत में टिफिन शब्द का व्यवहार साधारणतः दिन का भोजन नहीं बल्कि हल्का नाश्ता होता है. चेन्नई से लेकर उडुपी और हैदराबाद से लेकर कोवलम तक दक्षिण के शहरों और क़स्बों में हर जगह आपको टिफिन हाउस और टिफिन रूम मिल जाएंगे जहां आप इडली, दोसा, वडा, समोसे, छोले-भटूरे, इत्यादि का सेवन कर सकते हैं. परंतु सामान्यतः इस तरह के रेस्तरां आपको कोई भी दक्षिणी थाली परोसने में असमर्थ सिद्ध होंगे.
पश्चिम बंगाल पहुंचकर मैंने पाया कि यहां मामला कुछ और है. टिफिन साधारणतः घर के बाहर, कार्यस्थल पर मध्याह्न के भोजन को कहते हैं. साथ ही खान-पान प्रेमी बंगालियों के लिए यह दिन में किसी भी वक्त खाये जाने वाले हल्के भोजन या जलपान का नाम भी हो सकता है. इस राज्य के निवासियों के लिए न तो ऐसे टिफिन का कोई निश्चित समय है और न ही कोई निर्दिष्ट मेनू. जो कर्मचारी घर से दिन का खाना दफ़्तर लाते हैं वह भी दिन के किसी भी वक्त ‘टिपिन’ करने से नहीं चूकते. मुद्दे की बात यह है कि टिफिन का समय तो आपकी भूख तय करती है परंतु मेनू साथ लाए डिब्बे से अधिक आस-पास की दुकानों में उपलब्ध मज़ेदार व्यंजन.
बंगाल में बड़े से बड़े और छोटे से छोटे दफ़्तर को घेरकर दो चार छोटे भोजनालय जमे मिल जाएंगे, जहां निरामिष व आमिष बंगाली खाने की थाली सामान्य दामों में मिल जाती है. इनके अलावा कुछ और लोकप्रिय तथा सर्व स्वीकृत खाने की चीजें हैं जो बंगाल में लगभग हर दफ़्तर के समीप मिलती हैं. इनमें सबसे आगे है किसी भी वक्त खायी जाने वाली मूढ़ी, मूंगफली और सेव-दालमोठ मिश्रित मूढ़ी.
इसके अलावा प्राप्य रहते हैं चाय और मक्खन टोस्ट (जिसके ऊपर चीनी छिड़की रहती है), घुघनी और टोस्ट, सिंहाड़े—जिन्हें आप समोसे कहते हैं, तेले-भाजा—आपकी पकौड़ी, लूची (पूड़ी) और आलू दम, और अवश्य ही मिठाई. पीने के लिए भी चाय, कॉफ़ी, लस्सी, भांति-भांति के शर्बत और ठंडे पेय, और कुछ ज़िलों तथा विशेषकर कलकत्ते में सत्तू का घोल—जो खान-पान दोनों ही श्रेणियों में गिना जाता है.
इन सब खाद्य पदार्थों के बीच कई ज़िलों में स्थानीय पाक प्रणाली के विशिष्ट उदाहरण भी प्रस्तुत रहते हैं, जैसे दार्जिलिंग में मोमो, माल्दा में आम संदेश, बर्धमान में मिहिदाना, बांकुड़ा में पोस्तो (खसखस) बड़ा, इत्यादि. जैसा कि आप अनुमान लगा सकते हैं, हर दिन मध्याह्न के समय हर दफ़्तर के इर्द-गिर्द, विशेष रूप से ज़िला मुख्यालयों के आसपास, एक खाद्य मेला जुटता है जो किसी भी आधुनिक शॉपिंग मॉल के फ़ूड कोर्ट से कम नहीं होता.
लेकिन यही विविधता सदैव हर जगह टिफिन में नहीं मिलती. 1990 के दशक में जब मैंने पश्चिम बंगाल सरकार में काम करना आरंभ किया तथा बैठकों की अनंत शृंखला में भागीदार बना तो पाया कि हर बैठक में चाय और बिस्कुट पेश किया जाना तो अनिवार्य था ही, लंबी अवधि तक चलने वाली बैठकों में एक टिफिन पैकेट भी दिया जाता था. ज़िलों की बैठकों में दूर के सबडिवीज़न और ब्लॉक से भी अक्सर अफ़सर आते थे, इसी वजह से लंबी या दिन भर चलने वाली बैठकों में एक टिफिन ब्रेक आवश्यक था.
मैंने देखा कि उस टिफिन पैकेट में कभी कभी लूची-आलू दम और मिठाई मिलती है परंतु अधिकतर बैठकों में गत्ते के उस पात्र में रहते थे दो पाव रोटी के टुकड़े, एक उबला हुआ डीम (अंडा), एक केला और एक मिष्टि (मिठाई). यह टिफिन पौष्टिक था, सहजता से पैक होता था, और सरकार के मितव्ययिता की नीतियों के अनुकूल था परंतु यह कहना कठिन था कि यह अति स्वादिष्ट है.
काफ़ी अरसे से बार-बार इस टिफिन से अभिमुख रहने के पश्चात वन सेवा के एक अतृप्त किंतु विनोदी अफ़सर ने अंततः इसकी एकरसता को रेखांकित करने के लिए बड़ी सटीकता से टिफिन को इस तरह परिभाषित कर दिया:
रुटी, कोला, मिष्टि, डीम,
इन चारों से बना टिफिन.
कहना न होगा कि सरकार बहादुर पर इस कटाक्ष का कोई असर नहीं हुआ. आधिकारिक बैठकों में यह टिफिन सालों-साल अचल बना रहा.
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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