अपने सुनहरे दिनों में अनूठी गंगा-जमुनी तहजीब को पुष्पित-पल्लवित करने में कुछ भी उठा न रखने वाले अवध के नवाब आगे चलकर अपने बुरे दिनों में इस मायने में बहुत अभागे सिद्ध हुए कि दो तो क्या, कई-कई पाटों के बीच पिसने को मजबूर होने के बावजूद किसी की भी सहानुभूति के पात्र नहीं रह गए. उनका सब कुछ हड़पने पर तुली ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके बारे में जो कुछ भी सच या झूठ फैलाया, वह सब उन पर इस तरह चस्पां हो गया कि अभी तक नहीं छूट पाया. और अब तो कई महानुभाव उनकी पाली-पोसी गंगा-जमुनी तहजीब में भी नाना प्रकार के खोट देखने लगे हैं.
बहरहाल, इन नवाबों के बुरे दिन बक्सर में 22-23 अक्टूबर, 1764 को हुई ऐतिहासिक लड़ाई के बाद शुरू हुए, जिसमें दिल्ली के मुगल बादशाह और अवध व बंगाल की सेनाएं मिलकर भी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं को नहीं हरा सकीं और अपने माथे पर शर्मनाक पराजय का कलंक लगाकर लौटीं. फिर तो जैसे शेष दोनों का, वैसे ही अवध के नवाब शुजाउद्दौला का इकबाल भी जाता रहा.
निरंकुश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसके बाद शुजाउद्दौला को युद्ध अपराधी करार दे दिया और उनसे न सिर्फ भारी हर्जाना वसूला बल्कि उन्हें अपमानजनक समझौतों व संधियों के लिए भी मजबूर किया.
तुर्रा यह कि इसके बावजूद वह लगातार यही जताती रही कि उनका राजपाट उनके पास रहने देकर वह उन पर बड़ी इनायत कर रही है अन्यथा उसे छीन लेने में भी उसे कोई परेशानी नहीं थी.
घुटनों के बल शुजाउद्दौला
इन्हीं मजबूरी के समझौतों में से एक के तहत उसने शुजा को घुटनों के बल लाकर यह मानने के लिए विवश कर दिया था कि उनकी राजधानी में उनके ही खर्च पर उसकी एक बड़ी सेना, साथ ही एक अंग्रेज रेजीडेंट रहेगा.
समझौता दरअसल यह था कि कंपनी की सेना उनके राज्य को किसी तीसरे पक्ष के हमले से बचाएगी, इसलिए उनको अपनी सेना के एक सीमा से ज्यादा विस्तार की न जरूरत होगी, न इजाजत. जहां तक रेजीडेंट की बात है, वह देखेगा कि उनके राज्य में सब कुछ कंपनी की मंशा के अनुरूप चल रहा है या नहीं. नहीं चल रहा होगा तो वह कलकत्ता (अब कोलकाता) में बैठे कंपनी के गवर्नर जनरल को उसकी रिपोर्ट भेजेगा और कंपनी उसके मुताबिक कार्रवाई करेगी.
इतिहास के जानकार बताते हैं कि इसके बाद नवाबों को कंपनी की सेना ने कम, समय-समय पर नियुक्त होते रहे रेजीडेंटों ने ज्यादा नाच नचाया. इसके लिए उन्होंने नवाबों की कथित विलासिता और कुशासन को खूब बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया, जबकि खुद नाना प्रकार की तिकड़मों से उनके खजाने का बोझ बढ़ाते और रेजीडेंसी कहलाने वाले अपने निवास पर समानांतर दरबार लगाकर उनकी सत्ता को चुनौती देते और उनके बचे-खुचे इकबाल से भी खेल करते रहे. दो नापसंद नवाबों की तो उन्होंने साजिश रचकर हत्या भी करा दी. ताज्जुब की बात है कि इसके बावजूद इन रेजीडेंटों की कोई आलोचना नहीं की जाती.
प्रसंगवश, 1773 में कंपनी ने नथेनियल मिडिल्टन को अपना पहला रेजीडेंट बनकर फैजाबाद भेजा, क्योंकि उस समय शुजा ने फैजाबाद को ही सूबे की राजधानी बना रखा था. लेकिन इसके दो ही साल बाद शुजा का निधन हो गया और उनके उत्तराधिकारी बेटे आसफउद्दौला ने राजधानी लखनऊ स्थानांतरित कर दी. तब दूसरे रेजीडेंट जान ब्रिस्टो ने लखनऊ जाकर अपना पदभार संभाला.
बेचारे आसफउद्दौला!
उनके आदेश पर आसफउद्दौला को वहां अपने खर्च पर उनकी रिहायश के लिए विशाल व आलीशान रेजीडेंसी का निर्माण शुरू कराना पड़ा. लेकिन ब्रिस्टो लखनऊ में लंबे समय तक टिक नहीं पाए क्योंकि कंपनी ने अगले ही साल उनकी जगह नथेनियल मिडिल्टन को फिर से रेजीडेंट बनाकर भेज दिया. 1779 में कंपनी ने मिडिल्टन को कलकत्ता वापस बुलाकर मेजर चार्ल्स पर्लिंग को लखनऊ भेजा तो दो साल बाद उनकी जगह फिर से मिडिल्टन को दे दी.
इस बार मिडिल्टन ने आसफउद्दौला को (जो आर्थिक तंगी के कारण कंपनी की कई देनदारियां नहीं चुका पा रहे थे) फैजाबाद में रह रही बहू बेगम के नाम से प्रसिद्ध अपनी मां ( जिनसे आसफुद्दौला की कतई नहीं बनती थी) का खजाना लूटकर धन जुटाने के लिए इतना उकसाया कि वे उससे परहेज नहीं कर पाए. इस सिलसिले में मिडिल्टन इतने बदनाम हो गए कि कंपनी को उन्हें फिर से चलता कर जान ब्रिस्टो को ही फिर रेजीडेंट बनाना पड़ा.
अब तक आसफउद्दौला अपने राजकाज में इन सभी के दखल, अंकुश और वाजिब-गैरवाजिब मांगों व खर्चों से आजिज आ चुके थे. कंपनी की फौज के वेतन भत्तों के लिए भारी-भरकम सब्सिडी की अदायगी अलग से उनका सिर दर्द बनी हुई थी और सूबे की माली हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी.
परिस्थितियों से हारकर 1783 में उन्होंने कंपनी से अनुरोध किया कि मेहरबानी करके वह रेजीडेंट का पद समाप्त कर दे. उनका अनुरोध स्वीकार कर कंपनी ने 31 दिसंबर, 1783 से रेजीडेंट का पद समाप्त कर दिया. विडम्बना यह कि आसफउद्दौला को इससे भी कोई राहत नहीं मिली. क्योंकि आठ फरवरी, 1784 को कंपनी ने विलियम पामर को रेजीडेंट की जगह उनके दरबार में अपना प्रतिनिधि बनाकर भेज दिया और पामर ने ‘बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह’ की कहावत को चरितार्थ करना शुरू कर दिया.
तेरह जुलाई, 1785 को उनकी जगह गेब्रियल हार्पर कंपनी के प्रतिनिधि बनकर आए तो उन्होंने भी अपना ढर्रा नहीं ही बदला. उल्टे प्रशासन में इतनी बेजा दखलअंदाजियां शुरू कर दीं कि आसफउद्दौला को रेजीडेंटों द्वारा की गई अड़ंगेबाजियां बहुत भली लगने लगीं.
सौ कोड़े और सौ प्याज!
यह सौ कोड़े और साथ ही सौ प्याज खाने जैसा था, लेकिन वे करते तो क्या करते! त्राहिमाम करते हुए उन्होंने कंपनी को बताया कि उसके प्रतिनिधियों का बोझ तो उनके लिए रेजीडेंटों के बोझ से भी ज्यादा असह्य हो उठा है, इसलिए वह कृपापूर्वक रेजीडेंट वाली व्यवस्था ही फिर से लागू कर दे.
कंपनी ने यह ‘कृपा’ कर दी तो उन्होंने उससे एक और याचना की. यह कि वह उनसे हर साल चौहत्तर लाख रुपयों की जो रकम वसूलती है, उसे कुछ घटा दे. 1886 में कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर आया तो उसने उनकी यह याचना स्वीकार कर उक्त रकम चौहत्तर लाख से घटाकर पचास लाख कर दी.
लेकिन आसफउद्दौला इससे राहत का अनुभव कर पाते, इससे पहले ही अक्टूबर, 1787 में एडवर्ड आटो गिब्स रेजीडेंट बनकर आ गए और कार्नवालिस के इस आश्वासन के बावजूद कि वे आसफउद्दौला के राजकाज, खासकर निजी मामलों, में दखल नहीं देंगे, बेजा दखल देकर तो उन्हें तंग करते ही रहे, अनाप-शनाप मांगें भी करते रहे.
तिस पर आसफुद्दौला रेजीडेंटों के सताये कोई एकमात्र नवाब नहीं थे. नासिरुद्दीन हैदर (1827-1837) के बारे में कहा जाता है कि वे आसफउद्दौला की शाहखर्ची के विपरीत मितव्ययिता पर जोर देते थे और खजाने का हिसाब-किताब बहुत दुरुस्त रखते थे.
रेजीडेंट कर्नल लो इससे बहुत खफा रहते और खुन्नस खाकर किसी न किसी बहाने उन्हें चेतावनियां देते रहते थे. इसके चलते नासिरुद्दीन का सबसे ज्यादा समय उनको संतोषजनक जवाब देने में ही बीत जाता था. एक समय तो उनके राजकाज में रेजीडेंट की दखलंदाजी इतनी बढ़ गयी थी कि नवाब के सैनिक, जिनके पास महज पुलिसिंग का काम रह गया था, जैसे ही किसी कुसूरवार को पकड़ कर लाते, रेजीडेंट फौरन उसे रिहा कर देने का फरमान भेज देते. बेचारे सैनिक अपनी मेहनत अकारथ होती देखकर झुंझलाते रह जाते.
धीरे-धीरे नासिरुद्दीन की असहायता इतनी बढ़ गई कि वे भरे दरबार में अपना अपमान करने वाले सेनापति राजा बख्तावर सिंह को भी मनचाही सजा नहीं दे पाए. रेजीडेंट के दखल के कारण उन्हें बिना किसी सजा के सेनापति की जान बख्शकर उसे निर्वासित करने से ही संतुष्ट होना पड़ा.
दो नवाबों को जहर
इसके बावजूद रेजीडेंट से उनकी बात बनी नहीं और सात जुलाई, 1837 को वजीर रौशनउद्दौला से सांठगांठ करके रेजीडेंट ने उनकी दो जनाना खवासों (अंतरंग सेविकाओं) की मार्फत साजिशन तरबूज के शरबत में जहर दिलाकर उनको मरवा डाला. इससे पहले 1814 में नवाब सआदत अली खां को जहर देकर मार देने के मामले में भी तत्कालीन रेजीडेंट जान बेली का ही हाथ बताया गया था.
1829 में कैप्टन इब्राहिम लाकेट रेजीडेंट बने तो वे नवाब के साथ लखनवियों कहें या हिन्दुस्तानियों के प्रति अपने द्वेष का सर्वथा निर्लज्ज प्रदर्शन से बाज नहीं आए. उन्होंने किसी भी लखनवी के रेजीडेंसी तो रेजीडेंसी, उसके आसपास फटकने पर भी रोक लगा दी. उनको छाते से जानें कौन-सी चिढ़ थी कि उन्होंने मूसलाधार बारिश में भी उधर से गुजरने वालों के छाता लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया था.
जब तक वे रेजीडेंट रहे, उन्होंने कोचवानों और चोबदारों के लिए रेजीडेंसी के दरवाजे एकदम से बन्द रखे. कितनी भी आपात स्थिति क्यों न हो, वे इस प्रतिबंध को शिथिल करने को कतई तैयार नहीं होते थे.
यहां यह जानना भी दिलचस्प है कि रेजिडेंटों का वेतन निर्धारित तो ईस्ट इंडिया कंपनी खुद करती थी, जो उनकी भूमिका के महत्व के अनुसार भारी भरकम होता था. लेकिन उसका भुगतान नवाब को ही करना पड़ता था. तिस पर बात सिर्फ वेतन की ही नहीं थी. नवाबों को रेजिडेंटों की शानो-शौकत के भारी खर्च भी वहन करने पड़ते थे, जो कई बार नवाबों की विलासिता के खर्चों को भी मात कर जाते थे.
83 वर्ष मनमानी!
बहरहाल, रेजीडेंटों की मनमानी का सिलसिला 1856 में कंपनी द्वारा अवध का अधिग्रहण कर अपने राज्य में मिलाने और आखिरी नवाब वाजिद अली शाह को गिरफ्तार व निर्वासित किये जाने तक निर्बाध चलता रहा.
सूबे में कंपनी का राज हो गया तो उसे अपने ही राज्य में रेजीडेंट पद की कोई प्रासंगिकता नहीं लगी. तब उसने इस पद को समाप्त करने का फैसला कर डाला. उस वक्त जेम्स आउट्रम रेजीडेंट हुआ करते थे और कंपनी ने उन्हीं की सिफारिश पर वाजिद अली शाह को अपदस्थ किया था. पद खत्म होने से पहले ही आउट्रम ने कार्ली जैक्सन को कार्यकारी रेजीडेंट बनाकर अपना सारा दायित्व उनको सौंप दिया था.
अनंतर, 20 मार्च, 1856 को अवध के चीफ कमिश्नर का नया पद सृजितकर उस पर हेनरी लारेंस को नियुक्त कर रेजीडेंट युग का पूरी तरह खात्मा कर दिया गया.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
