अयोध्या: उतर गई ‘पर्यटकों’ की बाढ़ और पीले होने लगे सब्ज बागों के पत्ते

पिछले साल इसी मौसम में दर्शनार्थियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों का बोझ उठाते-उठाते अयोध्या की सांसें फूली जा रही थीं, जबकि उसी बीच लोकसभा चुनाव भी थे. पर अब न स्थानीय या आसपास के ज़िलों के दर्शनार्थी आ रहे हैं, न दूरदराज के इलाकों के. उनकी लंबी क़तारें बीते दिनों की बात हो गई हैं.

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(फाइल फोटो: पीटीआई)

अयोध्या का इन दिनों एक नई विडंबना से सामना है. श्रद्धालुओं, तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की रिकॉर्ड तोड़ आवाजाही से होने वाली आमदनी की बिना पर उसके और उसके निवासियों के कायापलट के बहुप्रचारित सब्ज बागों के पत्ते असमय पीले पड़ने लग जाने की विडंबना से.

गौरतलब है कि ये पत्ते ऐसे समय पीले पड़ने लगे हैं, जब श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने घोषणा कर रखी है कि आगामी पांच जून को भव्य व दिव्य राम मंदिर (जिसमें तेरह अन्य मंदिर भी समाहित होंगे) का निर्माण पूरा हो जाएगा और इन सभी मंदिरों में उसी दिन प्राण-प्रतिष्ठा के बाद पूजा-अर्चना शुरू हो जाएगी.

ऐसे में समझा जाता था कि दर्शनार्थियों के साथ समूची अयोध्या भरपूर उमंग, उल्लास व उत्साह से भरी रहेगी. लेकिन इसके विपरीत राम मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए आ रहे दर्शनार्थियों की संख्या, न्यूनतम न भी कहें तो, परंपरागत से भी निचले स्तर तक गिर गई है और सब्ज बाग के शिकार कई तबके खासे चिंताकुल हैं.

हों भी क्यों नहीं, अयोध्या की जिन सड़कों को किनारे के घरों, दुकानों, प्रतिष्ठानों और पूजास्थलों में व्यापक तोड़फोड़ कर दर्शनार्थियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों के रेलों की सुविधा के लिए खूब चौड़ी-चकली बनाया गया था, उनके ‘बूम’ के दिनों में जिन पर दिन-रात मेला-सा लगा रहता था और अप्रिय घटनाएं टालने के लिए तरह-तरह के यातायात प्रतिबंध लगाने पड़ते थे, उनमें से अधिकांश अब सन्नाटे में डूबी रहने या अतिक्रमण व अवैध पार्किंग के लिए इस्तेमाल होने को अभिशप्त हैं.

 

राम मंदिर के सामने का दृश्य. (फोटो: सम्पूर्णानंद बाग़ी)

गर्मी का बहाना

क्यों हुआ है ऐसा? कई महानुभावों के पास इसका ‘सबसे सुलभ’ जवाब है कि गर्मी बहुत बढ़ गई है, इसलिए श्रद्धालु नहीं आ रहे.

लेकिन सच्चाई यह है कि गर्मी के भीषण रूप धारण करने से पहले मार्च-अप्रैल के महीनों में ही दर्शनार्थियों वगैरह का आना बहुत घट गया था. इतना ही नहीं, रामनवमी का परंपरागत मेला भी बहुत फीका रहा था. इतना फीका कि कई जानकारों को यह तक कहने से गुरेज नहीं था कि मेला ठीक से लगा ही नहीं.

तब कहा जा रहा था कि ऐसा दो कारणों से हुआ है. पहला यह कि प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा अयोध्या में लगातार आयोजित किए जाते रहने वाले ताम-झाम भरे सरकारी उत्सव उसके परंपरागत मेलों के पराभव का कारण बन रहे हैं और दूसरा यह कि किसानों के खेती-बाड़ी के कामों में व्यस्त होने के कारण मेले में भीड़ नहीं आई.

लेकिन पिछले साल इसी मौसम में इन्हीं परिस्थितियों में दर्शनार्थियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों का बोझ उठाते-उठाते अयोध्या की सांसें फूली जा रही थीं, जबकि उसी बीच अठारहवीं लोकसभा के चुनाव भी थे. तब कई लोग आह्लादित होकर कहते थे कि प्रबल जन आस्था ने प्रकृति की भीषण गर्मी को मात दे दी है.

लेकिन बाद में पहले श्रद्धालुओं के इलाहाबाद के महाकुंभ से लौटकर अयोध्या आने वाले रेले खत्म हुए, फिर एकदम से खत्म होकर रह गए तो आस्था और गर्मी के बीच शह-मात की जैसे अदला-बदली हो गई. इस कदर कि ‘समुझत बनै बतावत नायं’ वाली कहावत सार्थक होने लगी.

दरकने लगे सपने

बहरहाल, अब न स्थानीय या आसपास के जिलों के दर्शनार्थी राम मंदिर आ रहे हैं, न देश के दूरदराज के इलाकों के और उनकी लंबी कतारें बीते दिनों की बात हो गई हैं. यों, इसका एक ‘सुखद’ पहलू भी है. यह कि आए दर्शनार्थी यह खुशी पा जाते हैं कि उनको सुगमता से रामलला के दर्शन हो गए, जबकि पहले यह सुगमता अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों को ही हासिल हुआ करती थी.

दर्शनार्थियों वगैरह का सिलसिला थम जाने का सबसे बुरा असर धर्म-कर्म में काम आने वाली वस्तुएं बेचकर जीविका अर्जित करने वाले उन तबकों पर पड़ा है, जिन्हें सब्ज बाग दिखाया गया था कि वे राम मंदिर में दर्शन-पूजन करने वालों की भीड़ आएगी तो इन वस्तुओं की मांग इतनी बढ़ जाएगी कि उनकी बिक्री से होने वाली आय से ही उनके घरों में भरपूर सुख-समृद्धि आ जाएगी. और तो और, राम मंदिर के गेट पर फूल बेचने, दर्शनार्थियों के माथे पर भांति-भांति के तिलक लगाने और ‘जय श्री राम’ वगैरह लिखने वाले भी भरपूर कमाई कर लिया करेंगे.

लेकिन अब वह भाग सूख रहा है तो ज्यादातर दुकानदार बताते हैं कि रामलला के चित्रों तक की बिक्री घटती-घटती एक तिहाई हो गई है और दिन भर में बमुश्किल 20-25 चित्र ही बिक पा रहे हैं. फूल मालाओं और दूसरी वस्तुओं की बिक्री में भी कोई ‘रस’ नहीं बचा है. सरयू के घाटों पर पूजा-पाठ कराने वाले तीर्थ पुरोहित भी श्रद्धालुओं की बेरुखी के असर से अछूते नहीं बचे हैं. उनमें से कई तो छिपाते भी नहीं कि श्रद्धालुओं की कम आवाजाही से अपनी जीविका को लेकर परेशान हैं.

दूसरी ओर नगरी के होटलों, होम स्टे, गेस्ट हाउसों, धर्मशालाओं और उन तक दर्शनार्थियों को लाने वाले वाहन चालकों की आमदनी भी आधी से कम रह गई है. एक होम स्टे के मालिक की मानें तो महाकुंभ के दौरान उमड़ी दर्शनार्थियों की भीड़ के उतार ने उसकी चार दिन की चांदनी खत्म कराकर फिर अंधेरी रात से साबका करा दिया है. ऐसे में उसके लिए रखरखाव का खर्च और कर्मचारियों का वेतन निकालना भी मुश्किल हो रहा है.

हालत यह हो गई है कि कई-कई दिनों तक एक भी श्रद्धालु कमरा बुक कराने नहीं आता. क्योंकि जो दर्शनार्थी, श्रद्धालु या पर्यटक आते हैं, अयोध्या में रात बिताने के बजाय दिन ढले ही लौट जाते हैं. स्ट्रीट फूड कार्नर, ढाबे, रेस्टोरेंट, जलपान और चाय आदि की दुकानें चलाने वाले भी अपने कारोबार में साठ-सत्तर प्रतिशत तक की गिरावट बता रहे हैं. उनका एक हिस्सा तो अब यह तक स्वीकारने लगा है कि उसका राम मंदिर के दर्शनार्थियों के भरोसे अपना धंधा चमकाने का मंसूबा ही सही नहीं था.

सुग्रीव किला के सामने भी खाली पड़ी सड़क. (फोटो: सम्पूर्णानंद बाग़ी)

दावों का क्या!

ताज़ा वस्तुस्थिति किस तरह पुराने सब्ज बागों का विलोम है, इसे ठीक से समझना हो तो याद करना चाहिए कि श्रद्धालुओं के बूम के दौर में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय दावा करते थे कि राम मंदिर के दर्शनार्थियों, श्रद्धालुओं व पर्यटकों की संख्या में 10 गुना वृद्धि हो गई है और नवनिर्मित राम मंदिर एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र बन गया है, जिससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अनेक नए अवसर पैदा हो गए हैं. उनका यह भी दावा था कि महाकुंभ के दौरान 1.26 करोड़ श्रद्धालु अयोध्या आए.

लेकिन अब उनकी संख्या इतनी कम क्यों हो गई है और रोजगार के नए तो क्या पुराने अवसरों को भी ग्रहण क्यों लग गया है, इस बाबत वे कुछ नहीं कह रहे.

कहां तो अयोध्या को पर्यटन के विश्व मानचित्र पर लाने का मंसूबा था और कहां इस सवाल का भी कोई तर्कसंगत जवाब नहीं मिल पा रहा कि राम मंदिर के बहुप्रचारित उद्घाटन के बाद आ रहे दर्शनार्थियों के बूम की खुमारी में (इस जमीनी हकीकत को समझे बिना कि एक दिन तो उनकी संख्या संतृप्त हो ही जाएगी) उनको तीर्थयात्री या श्रद्धालु से ज्यादा पर्यटक मानकर अयोध्या और अयोध्यावासियों के सारे दुख-दर्दों का रामबाण इलाज क्यों बताया जाने लगा था?

क्यों कहा जा रहा था कि देश-विदेश के पर्यटक यहां आकर भरपूर खर्च करेंगे तो अतिरिक्त राजस्व की आय से सरकारों का खजाना ही नहीं भरेगा, आम लोगों की सुख-स्वप्नों को भी नए पंख लग जाएंगे?

क्यों तीर्थयात्रियों को पर्यटक मानकर प्रदेश का पर्यटन विभाग आह्लादित होकर आंकड़े बताता था कि राम मंदिर के उद्घाटन के पहले 6 महीने में ही करीब 11 करोड़ पर्यटक अयोध्या आए. इनमें करीब सात करोड़ तो प्राण प्रतिष्ठा के महीने में ही आए, जबकि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनने के बाद छह महीनों के दौरान 4.59 करोड़ पर्यटक ही पहुंचे. उसने पारंपारिक तीर्थ यात्राओं को धार्मिक पर्यटन का नाम दे डाला था और उसी की कसौटी पर बताता था कि 2024 में ताजमहल की नगरी आगरा को पीछे छोड़ते हुए अयोध्या उत्तर प्रदेश में पर्यटकों का टॉप डेस्टिनेशन बन गई है और इसका श्रेय नवनिर्मित राम मंदिर को जाता है.

प्रदेश के पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह बताते थे कि श्रीराम जन्मभूमि में श्रीरामलला के विराजमान होने के बाद अयोध्या में पर्यटकों की संख्या में तेज वृद्धि दर्ज की गई है. वर्ष 2024 में वहां कुल 16,44,19,522 श्रद्धालु पहुंचे, जबकि वर्ष 2023 में उनकी संख्या 5,75,70,896 थी.

इसके विपरीत प्रदेश के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और समाजविज्ञानी डॉ. राम बहादुर वर्मा कहते हैं कि अब साबित हो गया है कि ये भारी-भरकम आंकड़े भाजपा और उसकी सरकारों की अयोध्या के बहाने भ्रम पैदा करने व लाभ उठाने की महत्वाकांक्षी परियोजना के उत्पाद भर थे.

उनके अनुसार, राम मंदिर के उद्घाटन के बाद अयोध्या में उमड़ने वाली सारी भीड़ सामान्य दर्शनार्थियों की ही नहीं थी. उनमें बड़ी संख्या में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के समर्थक व मतदाता थे जिन्हें सप्रयास माहौल बनाने के लिए अयोध्या लाया जा रहा था. यह जताने के लिए कि वे हमेशा ऐसे ही आते, अयोध्यावासियों पर अपना दिल लुटाते और उनका भविष्य बनाते रहेंगे. सामान्य दर्शनार्थियों की संख्या तो जल्दी ही ठहराव के बिंदु पर पहुंच गई थी.

डॉ. वर्मा कहते हैं कि इस छल को सबसे पहले अयोध्यावासियों ने समझा और भाजपा को फैजाबाद लोकसभा सीट हरा दी. अब शेष देश के श्रद्धालु भी उदासीन होकर जता रहे हैं कि उनकी आंखें खुल गई हैं और वे समझने लगे हैं कि और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा.

हेलीकाप्टर सेवा ठप

जो भी हो, अयोध्या में दर्शनार्थियों वगैरह का ही टोटा नहीं पड़ा है, उनको आसमान से अयोध्या का दीदार कराने के लिए 19 फरवरी से चल रही हेलीकॉप्टर सेवा भी उनकी बेरुखी के कारण बंद हो गई है और यह सेवा प्रदान कर रही एयर सफारी कंपनी ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया है.

सरयू अतिथिगृह के सामने बने हेलीपैड से सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक उपलब्ध कराई जा रही इस सेवा के तहत एक बार में हेलीकाप्टर में 5 यात्रियों और एक पायलट समेत कुल छह लोग बैठकर उड़ और 8 मिनट तक अयोध्या धाम का हवाई दर्शन कर सकते थे. इसके लिए इच्छुक श्रद्धालुओं को ऑनलाइन बुकिंग करानी पड़ती थी और 4,130 रुपए किराया देना पड़ता था.

एक सप्ताह तक तो यह सेवा ठीक-ठाक चली, लेकिन उसके बाद क्या पता, श्रद्धालुओं को बेकार, विलासिता या सामर्थ्य से परे लगने लगी, उन्होंने इसकी ओर से मुंह फेर लिया, जो इसके बंद होने का कारण बन गया. यह और बात है कि कुछ स्थानीय लोगों व महंतों का कहना है कि यह सेवा अधिकारियों व जनप्रतिनिधि की अदूरदर्शिता के चलते बंद हुई है.

ज्ञातव्य है कि 2023 में राम नवमी पर उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग व हेरिटेज एविएशन ने मिलकर ट्रायल के तौर पर पंद्रह दिन के लिए हेलीकॉप्टर से रामनगरी के हवाई दर्शन की योजना शुरू की तो उसे भी चार दिन पहले ही बंद कर देना पड़ा था. क्योंकि श्रद्धालुओं ने उसमें रुचि नहीं ली थी. तब योजना के प्रभारी ने बताया था कि बाद में योजना की समीक्षा कर उसे फिर से शुरू करने पर विचार किया जाएगा. लेकिन तब से अब तक यह योजना दोबारा शुरू नहीं हुई है.

व्यापारियों का दर्द

दूसरी ओर, गत दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आर्थिक सलाहकार केवी राजू अयोध्या आए तो व्यापार अधिकार मंच के बैनर पर व्यापारियों ने उनसे शिकायत की कि स्थानीय व्यापारियों का जमीन खरीद कर दुकानें या प्रतिष्ठान बनाना और व्यापार करना टेढ़ी खीर हो गया है क्योंकि उन्हें किसी भी कीमत पर अयोध्या की जमीनें हथिया लेने में लगे लोगों और साथ ही ऑनलाइन ट्रेनिंग से असामान्य मुकाबला करना पड़ रहा है. ऑनलाइन ट्रेडिंग के प्रभाव से कपड़े और बर्तन के व्यवसायियों के साथ इलेक्ट्रॉनिक सामान और दवाएं बेचने वाले व्यापारियों तक की कमर टूटी जा रही है.

इन व्यापारियों के अनुसार अधिकारी व जनप्रतिनिधि राम मंदिर के इर्द-गिर्द कुछ समय के लिए आए व्यापार बूम के बहाने मुख्यमंत्री और मंत्रियों को बताया करते थे कि पहले जो दुकानदार पांच किलो लड्डू बेचते थे, अब दो क्विटंल बेचने लगे हैं और रामराज्य आ गया है. लेकिन सच्चाई यह है कि वह बूम अयोध्या कैंट (पुराने फैजाबाद) के व्यापारियों तक भी नहीं पहुंच पाया और खतरे में पड़ गया. अभी भी आने वाले श्रद्धालुओं को आकर्षित कर उनका प्रवाह फैजाबाद कैंट की ओर भी मोड़ने की कोई योजना नहीं दिखाई दे रही.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)