नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में नक्सलियों और सुरक्षाबलों के बीच हालिया मुठभेड़ में मारे गए भाकपा माओवादी के शीर्षस्थ नेता यानी महासचिव नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू तथा अन्य माओवादियों के शव परिजनों को सौंपने को लेकर जन्मा विवाद गहराता जा रहा है.
उनके परिजन शव मांग रहे हैं. लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिस नारायणपुर में पुलिस थाने से दो किलोमीटर दूर उनके अंतिम संस्कार की जगह तैयार कर रही है, और परिजनों पर दबाव बना रही है कि वह अंतिम संस्कार के बाद अस्थियों को अपने साथ ले जाएं.
पुलिस को आशंका है कि यदि शव परिजनों को सौंपा गया और अंतिम संस्कार सार्वजनिक रूप से हुआ, तो यह बसवराजू को ‘नायक’ के तौर पर महिमामंडित कर सकता है.
सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया ने द वायर हिंदी को बताया कि ‘पुलिस ने मृतकों के परिजनों को पिछले तीन दिनों से अंधेरे में रखा. उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी जा रही थी कि आख़िर उनके शव को उन्हें क्यों नहीं सौपा जा रहा है. और अब उन पर शव का अंतिम संस्कार वहीं करने का दबाव बनाया जा रहा है.’
वह कहती हैं, ‘शहर से पास एक जंगल में मृतकों के अंतिम संस्कार की तैयारी पुलिस कर रही है. मृतकों के परिजनों से कहा जा रहा है कि आप यहीं पर इसका अंतिम संस्कार कीजिए क्योंकि शव खराब होता जा रहा है और अस्थियों को अपने साथ ले जाएं.’
बेला भाटिया ने कहा कि केशव राव के परिवार के अलावा चार अन्य परिवार वहां शव लेने के लिए आए हुए हैं.
द वायर हिंदी ने इस मामले से संबंधित प्रश्न बस्तर के इंस्पेक्टर जनरल, पी सुंदर राज को भेजे हैं. जवाब आने पर उसे कॉपी में जोड़ दिया जाएगा.
ज्ञात हो कि पिछले महीने सुरक्षाबलों द्वारा मुठभेड़ में मारी गई माओवादी गुमुडावेल्ली रेणुका का शव उनके परिजनों को सौंप दिया गया था. तेलंगाना स्थित उनके पैतृक गांव में उनके अंतिम संस्कार के दौरान लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था. प्रशासन को आशंका है कि अगर बसवराजू का अंतिम संस्कार हुआ तो वहां लोगों की तादाद और भी ज्यादा हो सकती है.

ऐसा ही नवंबर 2011 में हुआ था जब पश्चिम बंगाल में एक मुठभेड़ के दौरान मारे गए सीपीआई (माओवादी) के पोलित ब्यूरो के सदस्य मल्जुलोला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी को उनके गृह नगर पेड्डापल्ली (ज़िला करीमनगर, तेलंगाना) में अंतिम संस्कार के दौरान हजारों लोगों ने नम आंखों से अंतिम विदाई दी थी. उनके अंतिम संस्कार में मित्रों, समर्थकों और परिजनों की भारी भीड़ उमड़ी थी, जिसके कारण पूरे कस्बे में अभूतपूर्व सुरक्षा बंदोबस्त किए गए थे.
बसवराजू के परिजनों ने उनके पैतृक स्थल पर अंतिम संस्कार करने के लिए शव की मांग की है.
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, बसवराजू के भाई एन. रामप्रसाद 22 मई को छत्तीसगढ़ के नारायणपुर पहुंचे थे, ताकि उनके शव को लेकर आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम ज़िले के कोटाबोम्माली मंडल स्थित अपने पैतृक गांव जियन्नापेट लौट जाएं. हालांकि, आंध्र प्रदेश पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी और छत्तीसगढ़ पुलिस को शव परिजनों को सौंपने से रोक दिया.
कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़ में भी जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर नया नियम बनाया जा सकता है, जहां साल 2019 से मारे गए मिलिटेंट के शव उनके परिजनों को नहीं सौंपे जाते. पुलिस परिवार के कुछ सदस्यों की मौजूदगी में गोपनीय ढंग से अंतिम संस्कार करती है, ताकि जनसमूह के एकत्र होने की संभावना न रहे.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक एक अधिकारी ने संकेत दिया कि पुलिस ऐसा रास्ता भी चुन सकती है, जिसमे पुलिस द्वारा परिजनों की मौजूदगी में किसी गुप्त स्थान पर अंतिम संस्कार किया जाए, ताकि न तो कानून-व्यवस्था को खतरा हो और न ही बसवराजू की मौत को ‘वीरगति’ की तरह प्रचारित किया जा सके.
नारायणपुर मुठभेड़ में मारे गए 27 माओवादियों में से 11 के शव उनके परिजनों को सौंपे जा चुके हैं, लेकिन बसवराजू जैसा शीर्ष नेता के मामले को अलग तरीके से देखा जा रहा है.
ज्ञात हो कि नारायणपुर के अबूझमाड़ में 21 मई को हुए एनकाउंटर में सीपीआई (माओवादी) के जनरल सेक्रेटरी नमबाला केशव राव उर्फ बसवराजू समेत 27 नक्सली मारे गए. बस्तर रेंज के आईजी ने कहा है कि बसवराजू पिछले 40-45 सालों से माओवादी आंदोलन का हिस्सा थे और 200 से ज़्यादा नक्सली हमलों में शामिल थे. सरकार और सुरक्षा बल इसे एक बड़ी कामयाबी के तौर पर देख रहे हैं.
इस मुठभेड़ के दौरान डीआरजी का एक जवान मारा गया, तथा कुछ अन्य जवान घायल हुए. इस मुठभेड़ को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी एक ऐतिहासिक उपलब्धि कहा था.
कोआर्डिनेशन कमिटी फॉर पीस ने शवों को तत्काल सौंपने की मांग
छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ क्षेत्र में हुए मुठभेड़ के बाद मारे गए आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के माओवादियों के शवों को परिजनों को न सौंपे जाने पर कोआर्डिनेशन कमिटी फॉर पीस (सीसीपी) ने कड़ी आपत्ति जताई है. समिति ने इसे मृतकों के सम्मान के अधिकार का उल्लंघन करार दिया है और सभी शवों को तुरंत परिजनों को सौंपने की मांग की है.
समिति ने कहा कि 24 मई को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता द्वारा शवों को सौंपे जाने का आश्वासन दिए जाने के बावजूद यह प्रक्रिया लंबित है, जिससे दूरदराज से आए शोकाकुल परिजनों को भारी मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ रही है.
सीसीपी ने यह भी आरोप लगाया है कि ‘शवों को कोल्ड स्टोरेज में सुरक्षित न रखकर सड़ने के लिए छोड़ दिया गया है, जो कि चिकित्सा और कानूनी प्रोटोकॉल का गंभीर उल्लंघन है.’ समिति ने इसे मृतकों के साथ अमानवीय व्यवहार और परिवारों को अनावश्यक मानसिक आघात देने जैसा बताया.
इसके अलावा, समिति ने उन रिपोर्टों पर गहरी चिंता जताई है जिनमें कहा गया है कि केंद्र सरकार की ओर से अदालत में दो शवों को परिजनों को सौंपने का विरोध करते हुए यह तर्क दिया गया कि इससे ‘कानून-व्यवस्था की स्थिति’ उत्पन्न हो सकती है. सीसीपी का कहना है कि इस तरह का तर्क संवैधानिक दृष्टि से कमजोर है और यह शोक को अपराध की तरह प्रस्तुत करने की कोशिश है.
प्रेस वक्तव्य में यह भी आरोप लगाया गया है कि शवों को लेने आए परिजनों, एम्बुलेंस चालकों और इस मानवीय प्रयास में सहयोग करने वालों को प्रशासनिक दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ रहा है, जो राज्यसत्ता के दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण है.
समिति ने सुप्रीम कोर्ट के पंडित परमानंद कटारा बनाम भारत संघ केस का हवाला देते हुए कहा कि जीवन की तरह मृत्यु में भी सम्मान का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आता है. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अंतरराष्ट्रीय कानून जैसे जिनेवा कन्वेंशन और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार दिशानिर्देश भी मृतकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार को अनिवार्य मानते हैं.
समिति की ओर से प्रो. जी. हरगोपाल, प्रो. जी. लक्ष्मण, डॉ. एमएफ. गोपीनाथ, कविता श्रीवास्तव, क्रांति चैतन्य और लेखिका मीना कंडासामी सहित कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर करते हुए मांग की है कि:
- सभी शवों को बिना देरी के परिजनों को सौंपा जाए,
- प्रशासन परिजनों और सहयोगियों को किसी तरह की कोई बाधा न पहुंचाए.
- मृतकों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार सुनिश्चित किया जाए,
- नक्सल अभियान में मारे गए लोगों के शवों की देखभाल के लिए घरेलू व अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन किया जाए.
सीसीपी ने छत्तीसगढ़ सरकार से अपील की है कि वह हाईकोर्ट में की गई अपनी प्रतिबद्धता का पालन करे और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप सभी शवों को बिना शर्त रिहा करे.
