असम: छह ज़िलों में मूल निवासियों को बंदूक लाइसेंस देने की सरकार की योजना के ख़िलाफ़ विपक्ष

असम की भाजपा सरकार ने राज्य के छह ज़िलों में मूल निवासियों को 'अवैध ख़तरों' से बचाव के लिए हथियार लाइसेंस देने की योजना की घोषणा की है. विपक्ष ने इसे वापस लेने की मांग करते हुए योजना को अराजकता और जंगल राज की ओर एक ख़तरनाक कदम बताया है.

हिमंता बिस्वा शर्मा. (फोटो साभार: फेसबुक/@cmofficeassam)

नई दिल्ली: असम में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने घोषणा की है कि राज्य मंत्रिमंडल ने एक विशेष योजना को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत ‘असुरक्षित और दूरदराज के क्षेत्रों’ और बांग्लादेश की सीमा से लगे इलाकों में रहने वाले ‘मूल निवासियों’ को अवैध खतरों से बचाव के लिए हथियार लाइसेंस सौंपे जाएंगे.

बुधवार (28 मई) को कैबिनेट बैठक के बाद गुवाहाटी में एक संवाददाता सम्मेलन में यह घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने छह जिलों के नाम बताए, जहां यह विशेष योजना लागू होगी.

शर्मा ने कहा, ‘यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील निर्णय है. बांग्लादेश में हाल ही में हुए घटनाक्रमों के कारण इन जिलों के मूल निवासी असुरक्षा के माहौल में रह रहे हैं. उन्हें बांग्लादेश की ओर से और यहां तक ​​कि अपने गांवों में भी हमलों का खतरा बना हुआ है.’

हालांकि, इनमें से अधिकांश जिले बांग्लादेश की सीमा से नहीं लगते हैं, और ये सभी मुस्लिम बहुल हैं.

डेक्कन हेराल्ड के मुताबिक, इस तथ्य का उल्लेख करते हुए कि पूर्वोत्तर राज्य में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां सत्तारूढ़ भाजपा ‘बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों’ के मुद्दे पर मतदाताओं का सफलतापूर्वक ध्रुवीकरण कर रही है.

खबर में कहा गया, ‘असम में भाजपा बांग्ला भाषी मुसलमानों को बांग्लादेश से आए ‘अवैध प्रवासी’ मानती है और उन्हें स्थानीय असमिया लोगों की पहचान और संस्कृति के लिए खतरा मानती है. यह निर्णय अवैध प्रवासियों (मुख्य रूप से बंगाली भाषी मुसलमानों) की पहचान करने के अभियान और उन्हें बांग्लादेश वापस भेजने के लिए सरकार द्वारा अपनाई गई ‘पुश बैक’ नीति के बीच लिया गया है.’

रिपोर्ट में शर्मा के हवाले से कहा गया है कि ‘इन संवेदनशील क्षेत्रों में अल्पसंख्यक मूल निवासियों को खतरों का सामना करना पड़ता है और वे असुरक्षा की भावना में हैं. इन क्षेत्रों में मूल निवासियों की लंबे समय से चली आ रही मांग को देखते हुए यह निर्णय लिया गया. सरकार उन्हें हथियार खरीदने में मदद नहीं करेगी, लेकिन उन्हें हथियार खरीदने का लाइसेंस देगी.’

मुख्यमंत्री ने तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की ओर इशारा करते हुए यह भी जोड़ा, ‘अगर पिछली सरकारों ने उन्हें हथियार लाइसेंस दिए होते, तो बहुत से लोगों को अपनी ज़मीनें बेचकर वहां से भागना नहीं पड़ता. हम बहुत सी ज़मीनों को कब्ज़े से बचा सकते थे.’

भाजपा सरकार के इस फैसले की राज्य में विपक्षी दलों द्वारा व्यापक आलोचना हुई

लोकसभा में विपक्ष के उपनेता और नवनियुक्त राज्य कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने इसे ‘अराजकता और जंगल राज’ की ओर एक खतरनाक कदम बताया.

गोगोई, जिन्हें राज्य में आगामी चुनावों में शर्मा के एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जा रहा है, ने शर्मा से तत्काल निर्णय वापस लेने को कहते हुए कहा कि मुख्यमंत्री को अपने नेतृत्व के माध्यम से जनता का विश्वास बहाल करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.

एक्स पर गोगोई ने यह भी कहा, ‘मैं राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में नागरिकों को हथियार वितरित करने के मुख्यमंत्री के फ़ैसले की कड़ी निंदा करता हूं.’ उन्होंने कहा कि असम के लोगों को नौकरी, किफ़ायती स्वास्थ्य सेवा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए, न कि बंदूकें.

जोरहाट निर्वाचन क्षेत्र से सांसद गोगोई ने कहा, ‘पुलिस और सीमा सुरक्षा बलों को मजबूत करने के बजाय सरकार भाजपा-आरएसएस समर्थकों और स्थानीय आपराधिक सिंडिकेट के बीच हथियार बांटने पर आमादा है. इससे व्यक्तिगत प्रतिशोध के आधार पर गिरोह हिंसा और अपराध बढ़ेंगे. स्थानीय व्यापारियों और कारोबारियों को परेशान किया जाना तय है.

इसी कड़ी में कांग्रेस नेता और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन बोरा ने पूछा, ‘क्या हम संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं, जहां बंदूक हिंसा बड़े पैमाने पर है? क्या हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे ऐसे समाज में बड़े हों जहां हथियारों का इस्तेमाल सामान्य बात हो?’

‘चुनावों से पहले सांप्रदायिक अशांति को बढ़ावा देने का उद्देश्य’

राज्य में एक अन्य विपक्षी नेता, रायजोर दल के प्रमुख अखिल गोगोई ने शर्मा सरकार पर 2026 के चुनावों से पहले सांप्रदायिक अशांति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक ‘खतरनाक राजनीतिक रणनीति’ चलाने का आरोप लगाया.

शिवसागर विधायक अखिल गोगोई ने कहा, ‘अगर सरकार कहती है कि वह मूल निवासी लोगों की रक्षा नहीं कर सकती, तो इसका मतलब है कि गृह विभाग विफल हो गया है. यह शर्मनाक है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘यह कोई नियमित नीतिगत कदम नहीं है, इसमें असम को विभाजित करने और चुनाव से पहले सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने की क्षमता है.’

विपक्ष के नेता और असम जातीय परिषद के अध्यक्ष लुरिनज्योति गोगोई ने भी इसे चुनावों से पहले समुदायों को विभाजित करने की एक चाल बताया. उन्होंने कहा, ‘पहले यह स्मार्ट पुलिस थी, फिर पुलिस राज और अब सभी के लिए खुली बंदूक संस्कृति. यह सिर्फ़ अक्षमता नहीं है, यह चुनावों के नज़दीक आते ही सांप्रदायिक तनाव को भड़काने की एक जानबूझकर की गई कोशिश है.’

सरकार शांति भंग करने पर आमादा

तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद और बांग्लादेश सीमा के करीब स्थित असम के सिलचर शहर की मूल निवासी सुस्मिता देव ने भी सरकार के इस कदम पर सवाल उठाए.

उन्होंने कहा, ‘उन्होंने (शर्मा) कहा कि ऐसा इसलिए किया जाएगा ताकि ‘भूमिपुत्र’ खुद को अवैध अप्रवासियों से बचा सकें. वह लोगों से हथियार लाइसेंस रखने के लिए कह रहे हैं, जिसका मतलब है कि उन्हें असम पुलिस और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) पर भरोसा नहीं है. यह बीएसएफ और असम पुलिस का अपमान है.’

गुवाहाटी स्थित द सेंटिनल की एक रिपोर्ट में ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष रेजाउल करीमा सरकार के हवाले से कहा गया है, ‘हम असमिया लोग – चाहे अल्पसंख्यक हों या बहुसंख्यक – शांतिप्रिय हैं. लेकिन हिमंता बिस्वा शर्मा के नेतृत्व वाली यह सरकार ऐसे फ़ैसलों से हमारी शांति को भंग करने पर आमादा है.’

सरकार से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह करते हुए सरकार ने कहा, ‘अपने नागरिकों की सुरक्षा करना सरकार की एकमात्र जिम्मेदारी है. गृह विभाग, जिसे कोई और नहीं बल्कि खुद मुख्यमंत्री चलाते हैं, इसी उद्देश्य के लिए है. लेकिन, दुख की बात है कि हम ऐसी स्थिति देख रहे हैं, जहां सामुदायिक विकास और शांति को बढ़ावा देने के लिए कलम मुहैया कराने के बजाय सरकार हिंसा को भड़काते हुए बंदूकें दे रही है.’

उन्होंने कहा, ‘ऐसा करके सरकार वस्तुतः अपनी विफलता स्वीकार कर रही है.’