नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने बुधवार, 4 जून को घोषणा की है कि जनगणना और जातियों की गणना दो चरणों में की जाएगी, जिसकी शुरुआत 1 अक्टूबर, 2026 से होगी.
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया कि जनगणना की संदर्भ तिथि 1 मार्च, 2027 को रात 12 बजे होगी, जबकि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख और जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले क्षेत्रों में यह तिथि 1 अक्टूबर, 2026 की रात 12 बजे होगी.
यह पहला मौका होगा जब जनगणना 15 साल के अंतराल के बाद कराई जाएगी. पिछली जनगणना 2011 में कराई गई थी, जबकि 2021 में प्रस्तावित जनगणना कोविड-19 महामारी के कारण टाल दी गई थी.
गृह मंत्रालय के बयान में कहा गया, ‘भारत की पिछली जनगणना 2011 में दो चरणों में कराई गई थी: (i) पहला चरण – मकान सूचीकरण (1 अप्रैल से 30 सितंबर 2010 तक) और (ii) दूसरा चरण – जनसंख्या गणना (9 फरवरी से 28 फरवरी 2011 तक), जिसकी संदर्भ तिथि 1 मार्च 2011 की रात 12 बजे थी. हालांकि, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बर्फीले क्षेत्रों में यह प्रक्रिया 11 से 30 सितंबर 2010 के बीच कराई गई थी, और संदर्भ तिथि 1 अक्टूबर 2010 की रात 12 बजे रखी गई थी.’
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा कि 2021 की जनगणना भी इसी तरह दो चरणों में कराई जानी थी — पहला चरण अप्रैल-सितंबर 2020 के दौरान और दूसरा चरण फरवरी 2021 में. लेकिन यह महामारी के कारण स्थगित कर दी गई. हालांकि मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि यह प्रक्रिया पांच साल तक क्यों टली रही.
‘2021 में पहले चरण की जनगणना की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं और कुछ राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 1 अप्रैल, 2020 से फील्डवर्क शुरू होने वाला था. लेकिन देशभर में कोविड-19 महामारी फैलने के कारण जनगणना का कार्य स्थगित कर दिया गया.’ मंत्रालय ने कहा.
विपक्ष ने जनगणना में देरी पर सवाल उठाए
विपक्षी दलों ने जनगणना की शुरुआत को और टालने के सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं.
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने कहा, ‘2021 में होनी वाली जनगणना को अब और 23 महीने टालने का कोई भी वाजिब कारण नहीं है. मोदी सरकार केवल सुर्खियाँ बना सकती है, समय पर काम पूरा नहीं कर सकती.’
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने कहा कि 2027 में जनगणना कराने का फैसला यह दिखाता है कि भाजपा तमिलनाडु की संसदीय सीटें घटाना चाहती है.
उन्होंने कहा, ‘भारतीय संविधान के अनुसार 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर सीमांकन (डिलिमिटेशन) किया जाना है. भाजपा ने अब जनगणना को 2027 तक टाल दिया है, जिससे उनका मकसद साफ हो गया है कि वे तमिलनाडु की संसदीय सीटें कम करना चाहते हैं. मैंने पहले ही इस बारे में चेताया था और अब यह हकीकत बन रही है.’
डिलिमिटेशन एक विवादास्पद मुद्दा बन गया है, खासतौर पर दक्षिणी राज्यों में, जो बेहतर जनसंख्या नियंत्रण उपायों के चलते संसद में अपने प्रतिनिधित्व में कमी का डर जता रहे हैं.
1976 में, 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर डिलिमिटेशन पर रोक लगा दी गई थी ताकि वे राज्य जिन्होंने परिवार नियोजन से जनसंख्या को घटाया था, वे अपनी सीटें न गंवाएं. 2001 में इस रोक को 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया.
जाति जनगणना
इस साल अप्रैल में, केंद्र सरकार ने घोषणा की थी कि जनगणना के साथ जातिगत आंकड़े भी जोड़े जाएंगे, लेकिन उस वक्त यह नहीं बताया गया था कि जनगणना और जातिगत गणना कब होगी.
जातिगत जनगणना की मांग विपक्षी दलों की एक पुरानी मांग रही है और यह 2024 के लोकसभा चुनाव में एक प्रमुख मुद्दा भी था.
20 अप्रैल को केंद्रीय कैबिनेट के फैसले की घोषणा करते हुए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा था कि यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की समाज और देश के मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है. उन्होंने विपक्षी INDIA गठबंधन पर आरोप लगाया था कि वे जातिगत जनगणना को ‘राजनीतिक हथियार’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं और कहा था कि कांग्रेस सरकारें हमेशा से जातिगत जनगणना का विरोध करती रही हैं.
हालांकि यह फैसला भाजपा के 2024 के चुनावी रुख से बिल्कुल उलट है, जब उन्होंने जातिगत जनगणना की मांग को समाज को बांटने वाला कदम बताया था.
समाजवादी पार्टी प्रमुख और लोकसभा सांसद अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से जोड़ा.
उन्होंने कहा, ‘मतलब ये कि जब यूपी में पीडीए सरकार आएगी, तभी जातिगत जनगणना शुरू होगी.’ उन्होंने यह टिप्पणी अपने 2024 के चुनावी नारे ‘पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक’ (पीडीए) को ध्यान में रखते हुए की.
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