पहली बार एनडीए से महिला कैडेट्स बाहर आईं, सेना के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के लिए महिलाएं तैयार

भारत के प्रमुख सैन्य प्रशिक्षण संस्थान राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के 75 साल के इतिहास में पहली बार महिला सैनिकों ने पासिंग आउट परेड में पुरुषों के साथ कदमताल किया. ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये आने वाले दशकों में महिलाओं के लिए भारतीय सेना के सर्वोच्च पदों तक पहुंचने का एक रास्ता खोलता है, जो इनके लंबे संघर्ष की जीत है.

पहली बार एनडीए से महिला कैडेट्स का पास हुआ बैच. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

‘मुझे लगता है कि आज से 30 से 40 साल बाद, एक महिला उस स्थान पर खड़ी हो सकती है, जहां मैं खड़ा हूं.’

ये शब्द पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे के हैं, जिन्होंने अक्टूबर 2021 में महिलाओं को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में प्रवेश की अनुमति देने वाले सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया कुछ यूं दी थी.

अब करीब चार साल बाद 30 मई को भारत के प्रमुख सैन्य प्रशिक्षण संस्थान राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) के 75 साल के इतिहास में पहली बार महिला कैडेट्स ने पासिंग आउट परेड में पुरुष कैडेट्स के साथ कदमताल किया.

ये मौका ऐतिहासिक इसलिए था क्योंकि एनडीए के 148वें कोर्स के दीक्षांत समारोह में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पहली बार एनडीए से 17 महिला कैडेट्स के बैच ने स्नातक की डिग्री हासिल की.

ये इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि ये आने वाले दशकों में महिलाओं के लिए भारतीय सेना के सर्वोच्च पदों तक पहुंचने का एक यथार्थवादी रास्ता खोलता है, जो इनके लंबे संघष की जीत है.

मालूम हो कि इससे पहले एनडीए के जरिए सेना में अफसर के पदों पर महिलाओं को भर्ती की इजाजत नहीं थी. इसे लेकर वकील कुश कालरा ने कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि महिलाएं भी एनडीए की परीक्षा के लिए आवेदन कर सकती हैं. इसके बाद संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने पहली बार महिलाओं को भी परीक्षा में बैठने के लिए आवेदन मांगे थे.

बता दें कि कुश कालरा लंबे समय से पुणे स्थित प्रतिष्ठित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और केरल स्थित भारतीय नौसेना अकादमी (आईएनए) में महिलाओं के लिए समान अवसर की मांग कर रही थीं.

महिलाओं को केवल जेंडर के चलते एनडीए में शामिल नहीं किया जाता था

उनकी याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 19 के उल्लंघन का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया गया था कि महिलाओं को केवल जेंडर के आधार पर एनडीए में शामिल नहीं किया जाता है. यह समानता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.

याचिका में कहा गया था कि लड़कों को एनडीए और नेवल एकेडमी में 12वीं के बाद शामिल होने दिया जाता है. लेकिन लड़कियों के लिए सेना में शामिल होने के जो अलग-अलग विकल्प हैं, उनकी शुरुआत ही 19 साल से लेकर 21 साल तक से होती है. उनके लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता भी स्नातक रखी गई है.

ऐसे में जब तक लड़कियां सेना की सेवा में जाती हैं, तब तक 17-18 साल की उम्र में सेना में शामिल हो चुके लड़के स्थायी कमीशन पाए अधिकारी बन चुके होते हैं. इस भेदभाव को दूर किया जाना चाहिए. याचिका में संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने का आग्रह किया गया था कि योग्य महिला उम्मीदवारों को ‘राष्ट्रीय रक्षा अकादमी’ और ‘नौसेना अकादमी परीक्षा’ में बैठने और एनडीए में प्रशिक्षण की अनुमति दी जाए.

लाइव लॉ के मुताबिक, याचिका में कहा गया था कि सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता के मौलिक अधिकार और राज्य द्वारा भेदभाव से सुरक्षा के मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है और यह भारतीय संविधान के दायरे में न्यायोचित नहीं है.

इस याचिका पर 18 अगस्त 2021 को जस्टिस संजय किशन कौल और हृषिकेश राय की खंडपीठ ने अंतरिम फैसला सुनाया था. कोर्ट ने एक बार फिर इस बात पर जोर दिया कि आर्मी में महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाली मानसिकता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. अंतरिम आदेश के जरिए कोर्ट ने यह साफ कर दिया था कि आगामी 5 सितंबर को होने वाली एनडीए (नेशनल डिफेंस अकैडमी) प्रवेश परीक्षा में महिलाएं भी बैठ सकेंगी. हालांकि उनका दाखिला इस मामले में आने वाले अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा.

इस मामले पर सुनवाई के दौरान सेना ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि यह एक नीतिगत निर्णय है. राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज, यानी आरआईएमसी में लड़कियों को एडमिशन न देने के पीछे तर्क दिया गया कि ये एक 100 साल पुराना स्कूल है.

सेना की ओर से सीनियर एडवोकेट ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट में कहा था, ‘फिलहाल हम लड़कियों को आरआईएमसी में लेने की स्थिति में नहीं हैं. यह 100 साल पुराना स्कूल है. आरआईएमसी के छात्रों के लिए एनडीए की परीक्षा देना अनिवार्य होता है. उनका अलग बोर्ड है, यह एनडीए का फीडर कैडर है और एनडीए में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे से जुड़ा है.’

इस पर अदालत ने कहा था कि यह नीतिगत निर्णय जेंडर भेदभाव पर आधारित है. आप कहते हैं कि आरआईएमसी 100 साल पुराना है, तो आप 100 साल के लैंगिक भेदभाव का समर्थन कर रहे हैं?

सुप्रीम कोर्ट की सेना को फटकार 

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने एनडीए, सैनिक स्कूलों, आरआईएमसी में लड़कियों को प्रवेश नहीं देने के विचार पर सेना को फटकार भी लगाई थी. कोर्ट ने कहा था कि आप इस मामले पर आदेश देने के लिए न्यायपालिका को बाध्य कर रहे हैं. बेहतर यह होगा कि आप (सेना) खुद इसके लिए दिशानिर्देश तैयार करें. हम उन लड़कियों को एनडीए की परीक्षा में बैठने की अनुमति दे रहे हैं जिन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया है.

कोर्ट का ध्यान इस बड़े सवाल पर था कि आखिर आर्मी में महिलाओं के सवाल पर खुलापन क्यों नहीं दिख रहा? गौर करने की बात है कि अन्य तमाम क्षेत्रों में तो महिलाएं काफी तेजी से आगे बढ़ी हैं, लेकिन सेना में उनकी गति काफी धीमी रही.

ध्यान रहे कि हर साल लोक सेवा आयोग की परीक्षा के तहत एनडीए में दाखिला होता है. तीनों सेनाओं में भर्ती के लिए एनडीए ही प्रमुख द्वार है. इसके अलावा इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) और अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी (ओटीए) के जरिए भी सेना में विभिन्न प्रकार की शाखाओं में अधिकारी बनने का अवसर मिलता है. इसके तहत आर्टिलरी, इंजीनियरी, सिग्नल कोर आदि नॉन-टेक्निकल और टेक्निकल दोनों विंग आते हैं. यहां भी महिलाओं का दायरा सीमित रखा गया.

मालूम हो कि एनडीए से इतर आईएमए और ओटीए में प्रवेश के लिए कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज (सीडीएस) परीक्षा पास करना होती है, जो एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा है और इसे भी संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित किया जाता है. इसे तीनों सेनाओं में अधिकारी पदों पर भर्ती की जाती है. यह परीक्षा साल में दो बार होती है और इसके लिए उम्मीदवार का स्नातक होना जरूर है.

अदालत ने इस बात पर भी सख्त आपत्ति जताई कि आखिर एनडीए में सह-शिक्षा एक समस्या क्यों है? सेना में महिलाओं के लिए प्रवेश का एक और अतिरिक्त स्रोत बंद क्यों है? यह सिर्फ एक लैंगिक सिद्धांत नहीं है बल्कि भेदभावपूर्ण है. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सेना में महिलाओं के स्थायी कमीशन के संघर्ष की बातें भी याद दिलाई. साथ ही सेना की मानसिकता को भी बदलने की जरूरत बताई.

लंबे कानूनी संघर्ष के बाद मिला स्थायी कमीशन

गौरतलब है कि साल 2020 में एक लंबे कानूनी संघर्ष के बाद 17 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने से इनकार करना समानता के अधिकार के ख़िलाफ़ है. सरकार द्वारा दी गई दलीलें स्टीरियोटाइप हैं जिसे क़ानूनी रूप से कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है.

तब केंद्र सरकार ने अपनी दलील में कहा था कि सैन्य अधिकारी महिलाओं को अपने समकक्ष स्वीकार नहीं कर पाएंगे, क्योंकि सेना में ज़्यादातर पुरुष ग्रामीण इलाकों से आते हैं.

सरकार की तरफ से वकील आर बालासुब्रह्मण्यम और नीला गोखले ने कहा था कि महिला अधिकारियों के लिए कमांड पोस्ट में होना इसलिए भी मुश्किल है, क्योंकि उन्हें गर्भावास्था के लिए लंबी छुट्टी लेनी पड़ती है. उन पर परिवार की जिम्मेदारियां होती हैं.

गौरतलब है कि 1888 में अंग्रेजों ने मिलिट्री नर्सिंग सर्विस की स्थापना की थी, जिससे भारत में महिलाओं के लिए सेना में शामिल होने का रास्ता आधिकारिक तौर पर खुल गया था. इसके बाद1958 में भारतीय सेना चिकित्सा कोर ने महिला डॉक्टरों को नियमित कमीशन करना शुरू किया.

लेकिन महिलाओं के लिए गैर-चिकित्सा भूमिकाएं 1992 तक प्रतिबंधित रहीं. इसके बाद महिला विशेष प्रवेश योजना (डब्लूएसईएस) शुरू की गई, जिसके तहत महिलाओं को चुनिंदा गैर-कॉम्बैट शाखाओं – जैसे सेना शिक्षा कोर (एईसी), सिग्नल कोर, खुफिया कोर और इंजीनियर कोर – में शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) अधिकारियों के रूप में शामिल किया गया.

मालूम हो कि इसके बाद भी लंबे समय तक महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन के रास्ते बंद रहे, जब तक कि महिला एसएससी अधिकारी, जज एडवोकेट जनरल विभाग और एईसी में इसके लिए पात्र नहीं हो गईं.

सरकार ने 2019 में स्थायी कमीशन महिला अधिकारियों को आठ गैर-कॉमेबैट विंग में शामिल होने की अनुमति दी

सरकार ने 2019 में स्थायी कमीशन महिला अधिकारियों को आठ अन्य गैर-कॉमेबैट शाखाओं में शामिल होने की अनुमति दी, लेकिन उन्हें कमांड नियुक्तियों  से दूर रखा, जिससे महिलाओं को सेना में प्रमुख भूमिकाएं नहीं मिल सकीं. वे नेतृत्व क्षमता में कौशल होने के बावजूद जेंडर के चलते पीछे रहीं. सैनिकों की कमान संभालने के लिए उन्हें पात्र नहीं माना जा रहा था.

इस संबंध में साल 2020 में भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया था कि रक्षा बलों में पुरुष अभी तक महिला अफसरों की कमांड को स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से प्रशिक्षित नहीं हुए हैं.

स्थायी कमीशन और सेवा की उचित शर्तों के लिए महिलाओं ने लंबी लड़ाई लड़ी.ये संघर्ष 2000 के दशक में अदालतों तक पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में इस मामले पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया कि महिला अधिकारी दस शाखाओं में स्थायी कमीशन और कमांड भूमिकाओं के लिए पात्र हैं, और उन्हें ‘लिंग संबंधी रूढ़ियों के आधार पर… जो महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करती हैं’ से वंचित नहीं किया जा सकता.

इसके बाद 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने एनडीए में महिलाओं के लिए रास्ता खोला, जिसके बाद एनडीए ने अब तक अकादमी के 153वें बैच तक 126 महिला कैडेटों को भर्ती किया है.

2022 में अपनी पहली महिला कैडेटों को भर्ती करते समय एनडीए ने कहा था कि उनका प्रशिक्षण ‘बिल्कुल लिंग-तटस्थ तरीके’ से आयोजित किया जाएगा, जिसमें ‘मौजूदा पाठ्यक्रम में न्यूनतम बदलाव’ किए जाएंगे.

एनडीए के अनुसार, ज़्यादातर प्रशिक्षण गतिविधियां संयुक्त रूप से आयोजित की जाती हैं – पुरुष कैडेट्स के साथ. कैडेट्स की रोज़गार क्षमता को ध्यान में रखते हुए, विशेष रूप से इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि भविष्य में महिला अधिकारियों को कमांड भूमिकाएं निभानी होंगी.

अकादमी में महिला कैडेट्स को प्रशिक्षित करने के लिए एक समर्पित सहायक कर्मचारी हैं.

महिलाओं को अकादमी के मौजूदा 18 स्क्वाड्रन में शामिल किया गया

अपनी पहली महिला कैडेटों के लिए एनडीए ने अन्य प्री-कमीशनिंग प्रशिक्षण अकादमियों जैसे कि ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी चेन्नई, भारतीय नौसेना अकादमी एझिमाला और वायु सेना अकादमी डुंडीगल में पहले से मौजूद प्रशिक्षण पद्धतियों और व्यवस्थाओं का सहारा लिया.

1992 से महिला एसएससी अधिकारी इन अकादमियों से स्नातक हो रही हैं.

महिला कैडेट्स को शुरू में एनडीए परिसर में अलग से आवास उपलब्ध कराया गया था. लेकिन अब उन्हें अकादमी के मौजूदा 18 स्क्वाड्रन में शामिल कर लिया गया है. यह उपलब्धि इस साल की शुरुआत में महिलाओं को शामिल करने वाले पहले बैच के छठे और अंतिम सत्र के दौरान हासिल की गई.

एनडीए के 18 स्क्वाड्रन अकादमी के संगठन की आधारभूत इकाइयां हैं, जो अकादमी में रहने के दौरान कैडेट्स के परिवारों के रूप में प्रभावी रूप से कार्य करती हैं. स्क्वाड्रन में महिला कैडेट्स के शामिल होने का मतलब है कि वे अपने पुरुष समकक्षों की तरह ही रहती हैं और प्रशिक्षण लेती हैं, तथा पूरी दिनचर्या एक साथ पूरी करती हैं.

पूर्व सीओएएस और वर्तमान मिजोरम के राज्यपाल जनरल वीके सिंह (सेवानिवृत्त), जो एनडीए के 148वें बैच की पासिंग आउट परेड के समय मौजूद थे, उन्होंने कहा, ‘मैं एक ऐसे भविष्य की कल्पना करता हूं, जो बहुत दूर नहीं है, जब इनमें से कोई एक युवा महिला सेना के सर्वोच्च पद तक पहुंच सकती है.’

पहले महिलाएं एसएससी या सीधे प्रवेश मार्गों के ज़रिए सेना में शामिल होती थीं. उन्हें न तो कमांड की भूमिकाएं निभाने का अवसर मिलता था, और न ही सशस्त्र बलों के रैंक में ऊपर उठने का कोई व्यवहार्य रास्ता.

एनडीए महिला अधिकारियों के लिए सेना में एक स्थिर, स्थाई करिअर बनाने का मार्ग प्रसस्त करता है.

एनडीए से स्नातक होने वाली एक महिला कैडेट कम उम्र में शुरुआत कर सकती है, और संभावित रूप से 35 से 40 साल का करियर बना सकती है, जो अनिवार्य रूप से सेवा प्रमुख बनने के लिए एक शर्त है.

अब महिलाएं कमांड भूमिकाओं में भी अपनी पहचान बना सकती हैं, जिसमें कॉम्बैट, आर्टिलरी, नौसेना के युद्धपोत या लड़ाकू स्क्वाड्रन आदि शामिल हैं, जो उनके करिअर की उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण हैं. पहली बार एनडीए से स्नातक होने वाली महिला कैडेटों को इन पदों तक पहुंचने का अवसर मिलेगा.