हैदराबाद: हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर में पेड़ों की कटाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में तेलंगाना सरकार के खिलाफ सुनवाई जारी है. बीते महीने 15 मई को हुई सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश ने सख्त लहजे में कहा कि कोर्ट के निर्देशों के बावजूद अब तक कटाई वाले क्षेत्र में पुनः वृक्षारोपण शुरू नहीं किया गया है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि काम जल्द शुरू नहीं हुआ तो मुख्य सचिव समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मुश्किल में पड़ सकते हैं. अदालत ने यह भी माना कि राज्य सरकार ने योजनाबद्ध तरीके से छुट्टियों के दौरान जेसीबी मशीनों की मदद से पेड़ों की अवैध कटाई कराई.
सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 23 जुलाई तय की है. विश्वविद्यालय के छात्र अगली सुनवाई का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. उनके लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला उम्मीद की एक किरण बनी हुई है.
हैदराबाद विश्वविद्यालय की स्थापना
हैदराबाद विश्वविद्यालय एक गंभीर वैचारिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आंदोलन की उपज है. 1970 के दशक में तेलंगाना के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए आंध्र प्रदेश से अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर बड़ा जनांदोलन शुरू हुआ. जब यह आंदोलन जोर पकड़ने लगा, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हस्तक्षेप किया और सुझाव दिया कि तेलंगाना को अलग किए बिना भी उसका विकास संभव है. इसी सोच के तहत ‘सिक्स पॉइंट फॉर्मूला’ तैयार किया गया, जिसका उद्देश्य तेलंगाना के लोगों के अधिकारों की रक्षा और क्षेत्र के विकास को गति देना था. इस फॉर्मूला का दूसरा बिंदु हैदराबाद में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना से जुड़ा था, जिससे हैदराबाद विश्वविद्यालय की नींव पड़ी.
1974 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संसद में अधिनियम पारित कर हैदराबाद विश्वविद्यालय की स्थापना को मंजूरी दी. शुरुआती दिनों में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियां हैदराबाद शहर के बीचों-बीच स्थित उस भवन में शुरू हुईं, जिसे सरोजिनी नायडू के परिवार ने दान में दिया था.
1975 में राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय के लिए 2,374 एकड़ ज़मीन आवंटित की, जो उस समय शहर से दूर थी, लेकिन अब शहरी विस्तार विश्वविद्यालय तक पहुंच चुका है. हालांकि, यह ज़मीन आवंटित तो की गई, लेकिन इसका मालिकाना हक विश्वविद्यालय को कभी नहीं सौंपा गया, और इस अहम पहलू पर लंबे समय तक किसी ने ध्यान नहीं दिया.
यूनिवर्सिटी की जमीन से जुड़े विवाद का इतिहास
हैदराबाद विश्वविद्यालय की ज़मीन शुरू से ही विवादों में रही है. समय-समय पर अतिक्रमण की कोशिशें होती रहीं. गच्चीबोली स्टेडियम, आईआईआईटी, बस डिपो और पावर स्टेशन जैसी परियोजनाओं के लिए विश्वविद्यालय ने अपना हित या सार्वजनिक उपयोग को देखते हुए ज़मीन दी थी. लेकिन मौजूदा हालात अलग हैं.
अब जो 400 एकड़ ज़मीन तेलंगाना सरकार हड़पने की कोशिश कर रही है, उसका न तो शैक्षणिक विस्तार से कोई संबंध है, न खेल गतिविधियों से और न ही विश्वविद्यालय के किसी हित से. इस ज़मीन का उपयोग व्यवसायिक उद्देश्यों के लिए, विशेष रूप से आईटी सेक्टर के विकास के लिए किया जाना है, जबकि विश्वविद्यालय की ज़मीन का उपयोग शोध-शैक्षणिक कार्य के लिए ही किया जा सकता है.
साल 2004 में आंध्र प्रदेश की चंद्रबाबू नायडू सरकार ने आईएमजी भारत नाम की एक निजी कंपनी को 400 एकड़ ज़मीन इस शर्त पर दी थी कि वह वहां खेल सुविधाओं का विकास करेगी. शर्त थी कि चार साल में अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ज़मीन विश्वविद्यालय को वापस मिल जाएगी. लेकिन कंपनी न शर्त पूरी कर पाई, न ज़मीन छोड़ने को तैयार हुई.
मामला कोर्ट पहुंचा और जमीन के स्वामित्व को लेकर तेलंगाना सरकार और आईएमजी भारत के बीच लंबी कानूनी लड़ाई चली. 2025 में अदालत ने फैसला सरकार के पक्ष में दिया. इसके बाद सरकार ने ज़मीन को अपनी घोषित कर नीलामी की प्रक्रिया शुरू कर दी. 8 से 14 मार्च 2025 के बीच नीलामी के लिए संबंधित सरकारी संस्था ने विज्ञापन जारी किया.
13 मार्च का ‘बचाओ मशरूम रॉक’ आंदोलन
विश्वविद्यालय के जिस भाग में 400 एकड़ ज़मीन पड़ती है, उससे विश्वविद्यालय के छात्रों का भावात्मक लगाव ज्यादा है. उस क्षेत्र में कई झीलें, चट्टानें और घने जंगल हैं. कई तरह की ऐसी प्रजातियां भी हैं जो विलक्षण हैं और यहीं पायी जाती हैं. खास बात यह है कि हाल में ही विश्वविद्यालय प्रशासन ने अर्थशास्त्र, गणित और प्रबंधन, आदि की पढ़ाई के लिए एक नयी बिल्डिंग भी यहां बनवाई है.
13 मार्च को छात्रों ने पहला बड़ा प्रदर्शन किया, जिसके दौरान कैंपस में भारी पुलिस तैनाती देखी गई. छात्र संघ के आह्वान पर ‘बचाओ मशरूम रॉक’ के नारे के साथ विश्वविद्यालय के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों ने शांतिपूर्ण विरोध में भाग लिया. मशरूम की आकृति वाला यह ऐतिहासिक चट्टान उसी विवादित ज़मीन पर स्थित है. दिनभर चले इस धरने ने विश्वविद्यालय समुदाय में व्यापक एकता स्थापित की.
इसी दिन छात्र, शिक्षक और कर्मचारी संगठनों को मिलाकर एक संयुक्त संघर्ष समिति (जेएसी) का भी गठन हुआ, ताकि आंदोलन को संगठित रूप दिया जा सके. इस विरोध का असर न सिर्फ परिसर में बल्कि सरकारी स्तर पर भी महसूस किया गया. ज़मीन की नीलामी को लेकर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया और नीलामी की प्रक्रिया एक तरह से स्थगित कर दी गई.
30 मार्च को बड़ी संख्या में छात्रों की गिरफ्तारी
13 मार्च के शांतिपूर्ण धरने के बाद किसी को उम्मीद नहीं थी कि सरकार इस मुद्दे पर जल्दबाज़ी करेगी. लगा कि सरकार परीक्षा सत्र के बाद, जब अधिकांश छात्र घर लौट जाएंगे, तब कोई कार्रवाई करेगी. लेकिन इसके उलट, सरकार ने अचानक तब कदम उठाया जब कैंपस में ईद और तेलुगु त्योहार उगादी के मौके पर तीन दिन की छुट्टी थी. कई छात्र छुट्टियों में घर गए हुए थे.

इस दौरान सरकार ने भारी पुलिस बल तैनात कर ईस्ट कैंपस- जिस ज़मीन को लेकर विवाद है- की ओर जाने वाले रास्तों को बैरिकेड्स से बंद कर दिया. अंदर जेसीबी मशीनों से पेड़ों और जंगल की अंधाधुंध कटाई शुरू कर दी गई. लगभग 20 जेसीबी एक साथ काम कर रही थीं.
जब छात्रों को कैंपस में हो रही कटाई की जानकारी मिली, तो कुछ छात्र मौके पर पहुंचे. कुछ छात्रों को पुलिस ने जबरन उठाकर गाड़ी में बंद कर लिया. मोबाइल फोन छीनने की कोशिश हुई और महिला छात्रों के साथ भी बदसलूकी की गई.
बड़ी संख्या में छात्र ईस्ट कैंपस पहुंचे, लेकिन पुलिस ने विरोध को दबाने की कोशिश की. महिला छात्रों के साथ मारपीट की गई, उनके कपड़े और बाल नोचे गए. 60 से ज्यादा छात्रों को गिरफ्तार कर अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में ले जाया गया. इस दौरान मीडिया को कैंपस में प्रवेश की इजाजत नहीं दी गई.
सरकार का दावा: यह यूनिवर्सिटी की ज़मीन नहीं है
तेलंगाना की कांग्रेस सरकार 400 एकड़ विश्वविद्यालय की ज़मीन पूंजीपतियों को देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध दिखाई देती है. इसका जोर इस बात पर है कि यह ज़मीन विश्वविद्यालय की नहीं है. बात सही भी है, न सिर्फ ये 400 एकड़, बल्कि पूरी कैंपस की ज़मीन सरकार के स्वामित्व में है, विश्वविद्यालय को केवल आवंटित की गई है, मालिकाना हक नहीं मिला था.
लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सरकार इस ज़मीन को कॉरपोरेट विकास के लिए सौंप दे. राज्य की ज़मीन राज्य के लोगों की होती है, किसी पार्टी या मुख्यमंत्री की नहीं. स्वामित्व के नाम पर भ्रम फैलाकर सरकार ज़मीन हड़पना चाहती है. अगर सरकार की नीयत साफ होती, तो वह अब तक विश्वविद्यालय को ज़मीन का मालिकाना हक दे चुकी होती, ना कि नीलामी की कोशिश करती.
तेलंगाना विधानसभा सत्र में जब विपक्ष के नेताओं ने जब हैदराबाद विश्वविद्यालय की 400 एकड़ ज़मीन को लेकर सवाल किया तो जवाब में सरकार ने कटाक्ष करते हुए कहा कि कैंपस में कोई हिरण, मोर नहीं रहता, कैंपस में सिर्फ लोमड़ी रहती है जो विकास को बाधित करना चाहती है. सरकार की यह टिप्पणी उन छात्रों के ऊपर थी जो विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो रहे थे.
इस पूरे मामले पर विपक्ष के सबसे बड़े नेता, देश में संविधान, शिक्षा और रोज़गार की बात करने वाले राहुल गांधी चुप्पी साधे रहे. कांग्रेस की छात्र ईकाई एनएसयूआई भी छात्रों के साथ खड़ी नहीं हुई. उसने पूरी प्रतिबद्धता कांग्रेस सरकार के लिए दिखाई.
3 अप्रैल : सुप्रीम कोर्ट का फैसला
वाटा फाउंडेशन ने जंगल की कटाई के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल किया. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई. उन्होंने त्वरित रूप से कैंपस से जेसीबी को बाहर हटाने का निर्देश दिया. कैंपस से पुलिस हस्तक्षेप को भी खत्म करने को कहा.
फिलहाल विश्वविद्यालय के छात्रों के सामने कई चुनौतियां हैं. सबसे बड़ी चुनौती है ज़मीन का स्वामित्व विश्वविद्यालय को दिलाने के लिए एक संगठित और लंबे संघर्ष की तैयारी. यह आसान लड़ाई नहीं होगी, लेकिन छात्र अपने हक और विश्वविद्यालय की अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करने को तैयार हैं.
(लेखक हैदराबाद विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)
