ग़ज़ा डायरी: एक ज़िंदा दस्तावेज़ है रोज़मर्रा की जंग लड़ते लोगों और मासूम बच्चों की

पुस्तक अंश: शहाब ख़ान की किताब ‘ग़ज़ा डायरी’ उन अनकहे दर्द, उम्मीदों, और सपनों का आईना है, जो ग़ज़ा और फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर संघर्ष कर रहे लोगों की ज़िंदगी में बसते हैं. यह कहानी हमें उस संघर्षशील माहौल में ले जाती है जहां युद्ध की आग में भी इंसानियत की चमक बची रहती है, और हर टूटे हुए सपने के बीच उम्मीद की किरण झिलमिलाती है.

पुस्तक आवरण (साभार: शहाब ख़ान)

ग़ज़ा की जली हुई धरती पर न तो धूप बेफ़िक्र ढलती है और न ही हवा बिना चीख़ के बहती है. बमों की गूंज, मलबों में दबे सपने और मासूम आंखों में अटकी उड़ानें – इन सबके बीच भी कुछ आवाज़ें हैं जो मिटती नहीं, कुछ शब्द हैं जो राख से उभरते हैं. शहाब ख़ान की किताब ‘ग़ज़ा डायरी’ उन ही आवाज़ों और शब्दों का दस्तावेज़ है.

इस अंश में वे मरियम की डायरी के ज़रिए हमें एक ऐसे युद्धग्रस्त बचपन के बीच ले जाते हैं, जहां एक उड़ती पतंग भी आज़ादी का घोषणापत्र बन जाती है और एक बिखरता पन्ना पूरी दुनिया से सिर्फ़ एक सवाल पूछता है — ‘क्या आप सुनोगे?’

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आकाश में पतंग

आसमान का नीला रंग ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने नीले रंग के कपड़े पर धूल फेंक दी हो. उस नीलेपन के पीछे एक स्याही-सी धुंध छाई हुई थी, मानो आसमान भी ग़ज़ा की ज़मीन की तरह रोने से थक गया हो. हवा में एक पतंग इधर-उधर लहरा रही थी. उसके रंग-बिरंगे पंख हवा के साथ ऐसे नाच रहे थे, जैसे कोई परी अपने पर फैलाए आज़ादी की सैर कर रही हो. पतंग की डोर एक बच्चे के हाथ में थी, जो ज़मीन पर खड़ा उसे टकटकी लगाए देख रहा था. उसकी आंखों में एक चमक थी, वो चमक जो सिर्फ़ नादान दिलों में होती है, जहां सपने आसमान की बुलंदियों को छूने की ज़िद पाल लेते हैं.

हवा में उड़ते डायरी के पन्ने धीरे-धीरे ज़मीन पर बिखरने लगे, मानो आसमान भी उन्हें थाम न सका हो. उन पर लिखे शब्द धुंधले पड़ गए थे, मगर उनकी आवाज़ हवा में गूंजती रही, जैसे कोई दर्द की कहानी बार-बार दोहराई जा रही हो. ये आवाज़ थी मरियम की, एक फिलिस्तीनी बच्ची की, जिसने अपनी ज़िंदगी के सुख-दुख एक डायरी में कैद किए थे. ये कहानी थी उसके मासूम सपनों की, टूटती उम्मीदों की, और उस जंग के खिलाफ़ संघर्ष की जिसने उसका बचपन छीन लिया था.

मरियम की डायरी के पन्ने हवा के साथ उड़ते हुए एक पुराने ज़ैतून के पेड़ के पास पहुंचे. ये पेड़ ग़ज़ा की उस ज़मीन पर सालों से खड़ा था, जहां हर पत्ता युद्ध की दास्तां सुनता आया था. इसकी छाया में मरियम बैठकर अपनी डायरी लिखा करती थी. ये पेड़ उसका साथी था, उसके सुकून का ठिकाना, उसकी उम्मीदों का गवाह. मगर आज उसकी छाया में कोई नहीं बैठा था. सिर्फ़ हवा में लहराते पन्ने थे, जो मरियम की आवाज़ को बयां कर रहे थे, जैसे पेड़ की डालियां उन्हें थामने की कोशिश कर रही हों.

तभी एक बच्चे की नज़र उन पन्नों पर पड़ी. वह उन्हें उठाकर पढ़ने लगा. उसकी आंखों में आंसू थे, मगर चेहरे पर एक मुस्कान भी थी, वो मुस्कान जो सिर्फ़ उन्हीं के चेहरे पर आती है जो ज़िंदगी की तल्ख़ियों के बीच भी उम्मीद की किरण ढूंढ लेते हैं. उसने पन्नों को सीने से लगा लिया, मानो मरियम की आवाज़ उसके दिल तक पहुंच गई हो. वह समझ गया, जंग ने शब्दों को उड़ा दिया, मगर सपनों को नहीं मार सकी. सपने तो अब भी ज़िंदा थे, हवा में उड़ती उस पतंग की तरह, जो आसमान को छूने का सपना देखती है.

वह पतंग अभी भी आसमान में नाच रही थी. उसके रंग-बिरंगे पंख हवा के साथ मिलकर एक नई कहानी लिख रहे थे. ये कहानी थी ग़ज़ा के उन बच्चों की, जो बमों के शोर के बीच भी खिलखिलाते हैं, जिनकी आंखों में डर नहीं, बस उड़ान भरने की चाहत है. ये कहानी उनकी ज़िद की थी, ज़िंदगी को थामे रखने की, सपनों को मिटने न देने की.

मरियम की डायरी के पन्ने एक बार फिर ज़मीन पर बिखर गए, मगर उन पर लिखे शब्द हवा में गूंजते रहे: ‘जंग ने हमारी आवाज़ छीन ली, मगर सपनों को नहीं…’ ये शब्द अब सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं, हर उस दिल में उतर गए थे जो ज़ुल्म के खिलाफ़ लड़ता है. और वह पतंग अभी भी उड़ रही थी, उस आसमान में जहां सपनों की उड़ान कभी रुकती नहीं.

मगर ज़मीन का मंज़र कुछ और ही कहानी सुना रहा था. उस बच्चे के पैरों के आसपास बमों के गड्ढे फैले हुए थे, जैसे ज़मीन के सीने पर ज़ख़्मों के निशान हों. हर गड्ढे से उठता धुआं आसमान को धुंधला कर रहा था, मानो आग का दीया जलाकर युद्ध ने अपनी मौजूदगी का एलान किया हो. ज़मीन पर बिखरे कागज़ के टुकड़े हवा में उड़ते हुए फिसल रहे थे. ये कोई मामूली कागज़ नहीं थे, बल्कि किसी के दिल के टुकड़े थे, एक डायरी के पन्ने, जिन पर ज़िंदगी के सुख-दुख की दास्तां लिखी थी. हवा ने उन पन्नों को उठाकर इधर-उधर बिखेर दिया, जैसे कोई शैतान इंसानी आवाज़ों को मिटाने पर तुला हो.

एक पन्ना हवा के साथ उड़ता हुआ एक बम के गड्ढे के किनारे जा अटका. उस पर लिखे शब्द धूप में चमक रहे थे: ‘जंग ने हमारी आवाज़ छीन ली, मगर सपनों को नहीं…’ ये लफ़्ज़ किसी बच्चे के थे, जिसने अपनी उम्मीदों को कागज़ के पन्नों में कैद करने की कोशिश की थी. ये डायरी उसकी ज़ुबान थी, उसकी रूह की आवाज़ थी, मगर युद्ध की बर्बरता ने उसे बिखेर दिया था.

पतंग अब भी आसमान में लहरा रही थी. उसके चटख रंग युद्ध के धुएं और ख़ून के दागों के बीच एक तस्वीर बन गए थे, जैसे कोई कलाकार तबाही के बीच भी ख़ूबसूरती रच देता है. मगर नीचे ज़मीन पर, बमों के गड्ढे और उड़ते पन्ने एक सवाल पूछ रहे थे: ‘ये क्यों? क्यों एक बच्चे के हाथ में कलम की जगह आंखों में आंसू? क्यों उसकी डायरी के पन्ने बमों की राख में गिरे हैं?’

हवा के थपेड़ों से डायरी के पन्ने अब धीरे-धीरे ज़मीन पर बिखरने लगे. उन पर लिखे शब्द मिट रहे थे, मगर उनकी आवाज़ गूंजती रही. ये आवाज़ थी मरियम की, एक फिलिस्तीनी लड़की की, जिसने अपने सपनों को कागज़ पर उतारा था. ये कहानी थी उसकी ज़िंदगी की, जहां हर पन्ने पर डॉक्टर बनने की ख़्वाहिश थी, तो हर दूसरे पन्ने पर युद्ध की आग में झुलसते बचपन का दर्द. उसकी डायरी के बिखरे टुकड़े अब हवा में तैर रहे थे, मानो वो दुनिया से एक सवाल पूछ रहे हों: ‘क्या आप सुनोगे?’