असमानताओं को दूर किए बिना कोई देश सच्चे लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता: सीजेआई

सीजेआई बीआर गवई ने एक कार्यक्रम में कहा कि किसी भी देश के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय राष्ट्रीय प्रगति का एक महत्वपूर्ण पहलू है. यह सुनिश्चित करता है कि विकास समावेशी हो, और सभी व्यक्ति, चाहे उनकी सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, सम्मान और स्वतंत्रता के साथ रह सकें.

भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने बुधवार (18 जून) को कहा कि समाज के बड़े हिस्से को हाशिए पर रखने वाली संरचनात्मक असमानताओं को दूर किए बिना कोई भी राष्ट्र वास्तव में प्रगतिशील या लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता है.

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दीर्घकालिक स्थिरता, सामाजिक सामंजस्य और सतत विकास प्राप्त करने के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय एक व्यावहारिक आवश्यकता है.

समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, मिलान में ‘देश में सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने में संविधान की भूमिका: भारतीय संविधान के 75 वर्षों से चिंतन’ विषय पर आयोजित एक समारोह में बोलते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्याय कोई अमूर्त आदर्श नहीं है और इसे सामाजिक संरचनाओं, अवसरों के वितरण और लोगों के रहने की स्थितियों में जड़ें जमानी चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘समाज के बड़े हिस्से को हाशिए पर रखने वाली संरचनात्मक असमानताओं को दूर किए बिना कोई भी राष्ट्र वास्तव में प्रगतिशील या लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता. दूसरे शब्दों में, सामाजिक-आर्थिक न्याय दीर्घकालिक स्थिरता, सामाजिक सामंजस्य और सतत विकास प्राप्त करने के लिए एक व्यावहारिक आवश्यकता है.’

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह केवल पुनर्वितरण या कल्याण का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने, अपनी पूर्ण मानवीय क्षमता का एहसास करने और देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में समान रूप से भाग लेने में सक्षम बनाने के बारे में भी है.

उन्होंने कहा, ‘इस प्रकार, किसी भी देश के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय राष्ट्रीय प्रगति का एक महत्वपूर्ण पहलू है. यह सुनिश्चित करता है कि विकास समावेशी हो, अवसर समान रूप से वितरित हों, और सभी व्यक्ति, चाहे उनकी सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, सम्मान और स्वतंत्रता के साथ रह सकें.’

इस विषय पर भाषण देने के लिए उन्हें आमंत्रित करने के लिए चैंबर ऑफ इंटरनेशनल लॉयर्स को धन्यवाद देते हुए मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा कि सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने में पिछले पचहत्तर वर्षों में भारतीय संविधान की यात्रा महान महत्वाकांक्षा और महत्वपूर्ण सफलताओं की कहानी है.

उन्होंने कहा, ‘भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि भारतीय संविधान के निर्माता इसके प्रावधानों का मसौदा तैयार करते समय सामाजिक-आर्थिक न्याय की अनिवार्यता के प्रति गहराई से सचेत थे. इसका मसौदा औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता के लिए एक लंबे और कठिन संघर्ष के बाद तैयार किया गया था.’

उन्होंने कहा कि शिक्षा में सकारात्मक कार्रवाई की नीतियां, जिनका उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना तथा अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, संविधान की समानता और सामाजिक-आर्थिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता की ठोस अभिव्यक्ति हैं.

‘समावेशिता के संवैधानिक दृष्टिकोण के कारण ही सीजेआई बना’

उन्होंने कहा, ‘मैंने अक्सर कहा है, और मैं आज यहां दोहराता हूं कि समावेशिता और परिवर्तन के इस संवैधानिक दृष्टिकोण के कारण ही मैं भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में आपके सामने खड़ा हूं. ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़ी पृष्ठभूमि से आने के कारण मैं उन्हीं संवैधानिक आदर्शों की उपज हूं, जो अवसरों को लोकतांत्रिक बनाने और जाति और बहिष्कार की बाधाओं को खत्म करने की मांग करते हैं.’

विस्तार से बताते हुए मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा कि संविधान ने लोगों को दृष्टि, उपकरण और नैतिक मार्गदर्शन दिया है और यह दिखाया है कि कानून वास्तव में सामाजिक परिवर्तन के लिए एक उपकरण, सशक्तीकरण के लिए एक शक्ति और कमजोर लोगों का रक्षक हो सकता है.

मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा कि 26 जनवरी, 1950 को अपनाया गया भारतीय संविधान केवल शासन के लिए एक राजनीतिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए एक वादा, एक क्रांतिकारी वक्तव्य और गरीबी, असमानता और सामाजिक विभाजन से पीड़ित, लंबे समय के औपनिवेशिक शासन से बाहर आने वाले देश के लिए आशा की किरण है.

उन्होंने कहा, ‘यह एक नई शुरुआत का वादा था, जहां सामाजिक और आर्थिक न्याय हमारे देश का मुख्य लक्ष्य होगा. अपने मूल में भारतीय संविधान सभी के लिए स्वतंत्रता और समानता के आदर्शों को कायम रखता है.’

उन्होंने कहा कि पिछले 75 वर्षों में भारत के संविधान ने अपने नागरिकों के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई है और वास्तव में इस लक्ष्य की ओर सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण कदम भारतीय संसद द्वारा उठाए गए थे.

उन्होंने केशवानंद भारती मामले में 1973 के ऐतिहासिक फैसले की पृष्ठभूमि को याद करते हुए कहा, ‘संसद और न्यायपालिका के बीच तनाव, विशेष रूप से संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति के दायरे के संबंध में एक बुनियादी सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है: संवैधानिक संशोधन किस हद तक हो सकते हैं? हालांकि इस प्रकरण को अक्सर न्यायपालिका और संसद के बीच संस्थागत प्रतिद्वंद्विता के रूप में याद किया जाता है, लेकिन यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि यह सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को साकार करने के प्रयासों की पृष्ठभूमि में सामने आया.’

उन्होंने कहा कि गरीबी कम करने, रोजगार सृजन बढ़ाने तथा भोजन, आवास और स्वास्थ्य सेवा जैसी बुनियादी सेवाएं प्रदान करने के प्रयास भी हाल के दशकों में भारत की सामाजिक नीति परिदृश्य के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘मैं कह सकता हूं कि संसद और न्यायपालिका दोनों ने 21वीं सदी में सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के दायरे का विस्तार किया है.’

मुख्य न्यायाधीश गवई ने संरचनाओं के विध्वंस के मुद्दे पर हाल के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें अदालत ने राज्य के अधिकारियों द्वारा एक आरोपी के घरों और संपत्तियों को ध्वस्त करने के फैसले की जांच की.

उन्होंने कहा, ‘यहां, न्यायालय ने माना कि इस तरह के मनमाने ढंग से किए गए विध्वंस, जो कानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हैं, कानून के शासन और अनुच्छेद 21 के तहत आश्रय के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं. कार्यपालिका एक साथ न्यायाधीश, जूरी और जल्लाद नहीं बन सकती है.’

उन्होंने कहा कि उक्त निर्णय ने पुष्टि की है कि संवैधानिक गारंटियों को न केवल नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति, विशेष रूप से कमजोर लोगों की गरिमा, सुरक्षा और भौतिक कल्याण को भी बनाए रखना चाहिए.