नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लेकर बनाए एक कार्टून के मामले में कार्टूनिस्ट मंजुल को ‘टेकडाउन नोटिस’ मिला है.
राजनीतिक कार्टून बनाने वाले मंजूल ने 18 जून को सोशल मीडिया पर बताया कि उन्हें एक्स (पहले ट्विटर) से एक ‘टेकडाउन नोटिस’ मिला है, जो पश्चिम बंगाल साइबर क्राइम विंग की ओर से भेजे गए अनुरोध पर आधारित है.
एजेंसी ने एक्स से मंजुल द्वारा 2019 में पोस्ट किए गए दो कार्टून हटाने को कहा है. एजेंसी मुताबिक़, मंजूल के कार्टून भारतीय कानून का उल्लंघन करते हैं.
जिन कार्टूनों की बात की जा रही है, उनमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दिखाया गया है. ये कार्टून तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से बड़े पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) गए नेताओं और राज्य में हुए चिटफंड घोटालों में टीएमसी की कथित भूमिका पर व्यंग्य करते हैं.
In a setback to #MamataBanerjee, two #TMC MLAs, and over 50 municipal councillors, most of them from her party, joined #BJP.#LokSabhaElection2019 #loksabhaElections2019results #MamataMeme
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द वायर के लिए लिखे एक लेख में पत्रकार अपर्णा भट्टाचार्य इसे पश्चिम बंगाल में विरोध के प्रति असहिष्णुता का चिंताजनक संकेत मानती है. वह लिखती हैं, ‘वर्षों पहले पोस्ट किए गए दो कार्टूनों को सोशल मीडिया से हटाने की कोशिश अपने आप में इस बात को दर्शाती है कि आलोचनात्मक टिप्पणियों को लेकर असहजता कितनी गहरी है – भले ही वो व्यंग्य या कलात्मक अभिव्यक्ति के ज़रिये ही क्यों न की गई हो.’
मंजुल का मामला अकेला नहीं है.
भट्टाचार्य अपने लेख में कई उदाहरण से यह बताती हैं कि मंजुल का मामला अकेला नहीं है. पिछले कई वर्षों से पश्चिम बंगाल में ऐसा होता आ रही है.
सबसे पहले वह 2024 का उदाहरण देती हैं, जब बंगाल पुलिस ने सीपीआई(एम) के पूर्व पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम और भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय के खिलाफ एफआईआर दर्ज की. शिकायत का कारण था कि दोनों ने एक्स पर एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें उत्तर दिनाजपुर के चोपड़ा इलाके में एक स्थानीय तृणमूल नेता द्वारा एक महिला को सार्वजनिक रूप से पीटते हुए दिखाया गया था. इस घटना ने पूरे राज्य में भारी जनाक्रोश पैदा किया था. मंजुल के मामले की तरह ही राज्य पुलिस ने इन पोस्टों को हटाने का अनुरोध एक्स से किया था.
इसके बाद वह 2012 की एक घटना याद दिलाती हैं, जब जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र को इसलिए गिरफ़्तार कर लिया गया था क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री का व्यंग्यात्मक चित्रण करने वाला एक ईमेल फॉरवर्ड किया था. महापात्र को इसके बाद लगभग दस साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी और अंततः उन्हें बरी किया गया.
उसी साल, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक किसान — शिलादित्य चौधरी — के खिलाफ भी सार्वजनिक मंच से कार्रवाई के आदेश दिए थे, जब उसने उनसे खाद की कीमतों पर सवाल पूछ लिया था. उन्होंने किसान को ‘माओवादी’ करार दिया, जिसके बाद उसे कई साल तक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा.
भट्टाचार्य 2019 की एक उदाहरण देती हैं, जब ममता बनर्जी और उनके भतीजे की मुखर आलोचक रहे कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता सन्मय बनर्जी को उनके घर से गिरफ्तार किया गया था. सरकार की आलोचना करने के लिए उन पर भारतीय दंड संहिता की कई गंभीर धाराएं लगाई गईं, जिनमें जालसाजी और मानहानि जैसे आरोप शामिल थे. जेल से रिहा होने के बाद उन्हें अस्पताल में इलाज कराना पड़ा था.
इसी तरह, 2023 में कांग्रेस के एक और पूर्व प्रवक्ता और वकील कौस्तव बागची को मुख्यमंत्री के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. बाद में सन्मय बनर्जी और कौस्तव बागची – दोनों ही भाजपा में शामिल हो गए.
जून 2022 में, विवादास्पद यूट्यूबर अनिर्बाण रॉय, जिन्हें ‘रॉड्डुर रॉय’ के नाम से जाना जाता है, को कोलकाता पुलिस ने गोवा के एक रिज़ॉर्ट से गिरफ्तार किया. उन पर मुख्यमंत्री और उनके भतीजे के खिलाफ कथित तौर पर अपशब्द कहने का आरोप था.
ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी
कार्टूनिस्ट मंजुल ने एक्स पर ‘टेकडाउन नोटिस’ शेयर करते हुए लिखा है, ‘उनके लिए जिन्हें लगता है कि ममता बनर्जी भाजपा से अलग हैं…’
For those who think Mamata is different from the BJP… pic.twitter.com/VA4BU7ihCT
— MANJUL (@MANJULtoons) June 18, 2025
ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी की तुलना नई नहीं है. बहुत साल पहले स्टैंड-अप कॉमेडियन, गीतकार, लेखक और फिल्म निर्देशक वरुण ग्रोवर ने अपने कॉमेडी शो में ममता बनर्जी की तुलना नरेंद्र मोदी से करते हुए कहा था, ‘ममता बनर्जी कॉटन साड़ी में नरेंद्र मोदी हैं.’
अपने लेख में अपर्णा भट्टाचार्य लिखती हैं, ‘इस तरह की सूक्ष्म लेकिन प्रभावशाली दमन की प्रवृत्ति अब पश्चिम बंगाल में एक सामान्य बात होती जा रही है, जो सांस्कृतिक स्वतंत्रता, कलात्मक स्वायत्तता और आलोचनात्मक सोच को धीरे-धीरे खत्म करती जा रही है. यह डर और सेल्फ-सेंसरशिप का एक ऐसा माहौल तैयार करती है, जो केंद्र में नरेंद्र मोदी के शासन की याद दिलाता है.’
