नई दिल्ली: भारत के चुनाव आयोग ने सोमवार को चार राज्यों में 19 जून को हुए विधानसभा उपचुनावों के नतीजे घोषित कर दिए, जिसमें आम आदमी पार्टी (आप) ने दो और कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने एक-एक सीट हासिल की.
पंजाब में सत्ता विरोधी लहर के अटकलों के बीच आम आदमी पार्टी (आप) के उम्मीदवार संजीव अरोड़ा ने लुधियाना पश्चिम विधानसभा सीट पर जीत हासिल की. 14वें और अंतिम दौर की मतगणना के बाद अरोड़ा ने 10,676 वोटों से जीत हासिल की.
पांच सीटों- केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल में एक-एक और गुजरात में दो – पर उपचुनाव हुए थे. लुधियाना में आप विधायक गुरप्रीत बस्सी गोगी की जनवरी में लाइसेंसी पिस्तौल से सिर में गोली लगने से मौत के बाद यह सीट खाली हो गई थी. राज्य की 117 सीटों वाली विधानसभा में अब आप विधायकों की संख्या 94 हो गई है.
भाजपा गुजरात में केवल अपने गढ़ कादी से ही जीत पाई, जबकि आप ने विसावदर (गुजरात) जीती. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने कालीगंज सीट बरकरार रखी और कांग्रेस ने केरल में नीलांबुर सीट मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चे से छीनकर सबको चौंका दिया.
फरवरी में दिल्ली चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से हारने के बाद यह आम आदमी पार्टी का पहला बड़ा चुनावी प्रदर्शन है.
दो सीटों पर जीत के तुरंत बाद आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने कहा कि विसावदर में पार्टी की जीत राज्य में उसकी दीर्घकालिक उपस्थिति का प्रमाण है. उन्होंने कहा कि राज्य के विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी के निर्वाचित दलबदलुओं द्वारा खाली की गई सभी पांच सीटों पर भाजपा से हार गई. कांग्रेस ने 17 सीटें जीती थीं, लेकिन पांच विधायक भाजपा में शामिल हो गए.
केजरीवाल ने कहा कि आप के पांच विधायकों में से केवल एक, विसावदर के विधायक भूपेंद्र गंडूभाई भयानी, भाजपा में शामिल हो गए, लेकिन पार्टी ने उपचुनाव में फिर से सीट जीत ली, जिससे पता चलता है कि गुजरात के लोग अब बदलाव चाहते हैं.
कांग्रेस
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने केरल के नीलांबुर में 10,000 से ज़्यादा वोटों से जीत हासिल करके सबको चौंका दिया. इसके उम्मीदवार आर्यनदान सौकाथ ने वामपंथ के उभरते सितारों में से एक एम. स्वराज और वामपंथ समर्थित निर्दलीय विधायक पीवी अनवर को हराया, जिन्होंने हाल ही में मुख्यमंत्री के साथ मतभेद के बाद इस्तीफा दे दिया था.
इस जीत के साथ, कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले अपनी कथित बिखरी हुई रणनीति के बारे में कई अटकलों पर विराम लगा दिया है.
नीलांबुर की हार वाम लोकतांत्रिक मोर्चे के लिए निराशा का सबब बन सकती है, खास तौर पर मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के लिए, जिन्होंने पहले ही यह दावा करते हुए अभियान शुरू कर दिया है कि उनकी सरकार के खिलाफ कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं है.
भाजपा
भाजपा सभी सीटों पर चुनाव लड़ा और अपनी पूरी ताकत और पैसे से चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल अपने गढ़ कादी को ही बचा पाई और कहीं और उल्लेखनीय प्रदर्शन भी दर्ज नहीं कर पाई.
नीलांबुर में इसके उम्मीदवार मोहन जॉर्ज को केवल 8,000 से कुछ ज़्यादा वोट ही मिल पाए, जबकि जीतने वाले को लगभग 80,000 वोट मिले. विसावदर में इसके उम्मीदवार किरीट पटेल लगभग 18,000 वोटों से हार गए – यह काफी बड़ा अंतर है, क्योंकि गुजरात इसका सबसे मजबूत राज्य है. लुधियाना पश्चिम में यह तीसरे स्थान पर रही, जबकि कालीगंज में यह दूसरे स्थान पर रही, जहां पश्चिम बंगाल के द्विध्रुवीय राजनीतिक माहौल में टीएमसी से 50,000 से ज़्यादा वोटों से हार गई.
यह बात स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को आक्रामक तरीके से प्रदर्शित करने के बावजूद भी यह पार्टी कमजोर पड़ रही है. सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद यह लोकसभा में 303 सीटों से 2024 के लोकसभा चुनावों में 240 सीटों पर सिमट गई.
