बंगनामा: कर्मचारी संगठन और वो एक रात की नींद…

श्रम विभाग द्वारा बनाई गई नियमावली इतनी औपचारिक थी कि अगर कर्मचारी संगठन अधिकारियों का घेराव भी करना चाहता हो तो उसे नियमानुसार उसकी अग्रिम सूचना देनी पड़ती थी. बंगनामा की 28वीं क़िस्त.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

‘जे हेतु आपनी आमादेर दाबी मानचेन ना, आमरा ऊठते पारची ना (चूंकि आप हमारी मांग नहीं मान रहे हैं, हम लोग उठ नहीं पा रहे हैं)’ ज़िला सरकारी ड्राइवर संगठन के महासचिव ने कहा. मैंने पूछा, ‘ऊठते पारचेन ना, माने? घेराओ कोरचेन (उठ नहीं पा रहे हैं, मतलब? घेराव कर रहे हैं)?’ उन्होंने दोहराया, ‘ना, आमरा ऊठते पारचि ना (नहीं, हम लोग उठ नहीं पा रहे हैं).’

मैं उनकी रणनीति समझ गया. मैंने मुस्कराकर कहा, ‘ताले बोशून, आलोचना कोरी (तब बैठिए, चर्चा करें).’

शाम के कोई पांच बज रहे थे. 1992 का अक्तूबर आरंभ हो चुका था. कुछ महीने पहले ही मैंने अलीपुरद्वार सबडिवीज़न में एसडीओ का पदभार संभाला था. एसडीओ के कक्ष में मेरे समक्ष जलपाईगुड़ी ज़िला सरकारी ड्राइवर संगठन का प्रतिनिधि दल विराजमान था. बैठक तीन बजे आरंभ हुई थी और लग नहीं रहा था कि शीघ्र ख़त्म होगी. ड्राइवर संगठन के मुद्दों की सूची बहुत लंबी थी. प्रारंभिक कई मुद्दों के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा करने के बाद उन पर कमोबेश सहमति बन चुकी थी तथा जैसा मेरा अंदेशा था बात अंतिम मुद्दे पर आकर अटक गई थी.

मेरा अंदेशा पश्चिम बंगाल के ज़िलों में मेरे दो वर्षों के अनुभव पर आधारित था. 1990 में प्रशासनिक सेवा का प्रशिक्षणार्थी बनकर जब मैं पश्चिम बंगाल पहुंचा तब तक ऐसी बैठक, जिसकी विशेष संज्ञा ‘डेप्युटेशन’ थी, की प्रक्रिया निर्धारित हो चुकी थी. एक ओर कर्मी संगठन तथा अधिकारियों या प्रबंधन के बीच बैठकों के लिए राज्य सरकार के श्रम विभाग ने औपचारिक नियमावली बनाई थी जिसके अनुसार अगर कर्मी संगठन अधिकारियों के घेराव करने की मंशा रखता हो तो नियमानुसार उसकी अग्रिम सूचना भी देनी पड़ती थी.

दूसरी ओर बैठक में बातचीत की भी एक अनौपचारिक पद्धति निर्दिष्ट हो चुकी थी. यह बात मैंने ज़िला प्रशिक्षण तथा कांथी में अपने इससे पूर्व एसडीओ कार्यकाल में बीसियों डेप्युटेशन से गुज़रकर समझी और सीखी थी.

ऐसे अनुभवों के पिटारे को साथ लेकर मैं जून में 1992 अलीपुरद्वार पहुंचा. यहां एसडीओ के दफ़्तर में एक भाड़े की गाड़ी भी थी जिसका चालक, सलीम, एक आकस्मिक कर्मी था जिसकी तनख़्वाह का आकलन दैनिक मजदूरी के हिसाब से किया जाता था. ऐसे कर्मियों के काम की प्रणाली तथा पारिश्रमिक का निर्धारण करने के लिए सरकार का एक निर्देश था जिसे उसकी संख्या 1900 ईएमपी के नाम से जाना जाता था.

इस निर्देश के अनुसार किसी भी आकस्मिक कर्मी को तीस दिन लगातार काम करने के बाद एक दिन अवकाश देना अनिवार्य था. ऐसा न करने से 240 दिनों के उपरांत स्थायी नौकरी पर उनका अधिकार बन सकता था. और इस तरह से स्थायी पदों को भरना पूर्णतः प्रतिबंधित था.

अलीपुरद्वार पहुंचने के कई महीने बाद मैंने आकस्मिक कर्मचारियों के हाज़िरी रजिस्टर को पलटते हुए पाया कि अन्य आकस्मिक कर्मियों को तो 30 दिनों तक काम करने के बाद एक दिन का अवकाश मिला है परंतु सलीम को यह अवकाश नहीं दिया गया है. मैंने जब दफ्तर में इस त्रुटि के बारे में छानबीन की तो कोई भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिला. इसलिए मैंने फ़ाइल पर आदेश दिया कि अन्य आकस्मिक कर्मियों की तरह सलीम को भी 30 दिनों तक काम करने के बाद एक दिन की छुट्टी देनी ही पड़ेगी.

मेरे इस आदेश को पारित न करने के आवेदन के साथ पहले सलीम मुझसे मिला, फिर दफ़्तर के ड्राइवर मिलकर मेरे पास आए और फिर अलीपुरद्वार सबडिवीज़न ड्राइवर संगठन ने मुझे डेप्युटेशन दी. उन सभी को मैंने समझाया कि 1900 ईएमपी के निर्देश के सामने मैं असमर्थ हूं. अगले महीने के अंत के पहले जलपाईगुड़ी ज़िला ड्राइवर संगठन ने मेरे पास समय मांगा.

डेप्युटेशन दिन में तीन बजे आरंभ हुआ. सात लोगों के प्रतिनिधि मंडल में मेरी गाड़ी का ड्राइवर बाबलू भी था (जिसने उसी सुबह इस बैठक में उपस्थित होने के लिए मुझसे आधे दिन का आकस्मिक अवकाश लिया था). सूची में कुल ग्यारह मांगें थीं, सलीम से संबंधित मांग सबसे नीचे थी. और फिर जैसा होना था होता गया. आरंभ के कुछ विषय अविवादित थे, फिर कुछ थे जिन पर कार्यवाही हो चुकी थी. इन बिंदुओं पर बातचीत सौहार्दपूर्ण भाव से आगे बढ़ी फिर कुछ मुद्दे आए जिन पर संगठन के प्रतिनिधियों में गर्मी बढ़ी और एक-दो लोगों ने उठ कर मज़दूर क्रांति के नाम पर जोश के साथ अपनी बात रखी. उन मुद्दों को मैंने सरकार के पास भेजने का वादा करके उन्हें शांत किया. अंत में सलीम के महीने में एक दिन की छुट्टी का मामला सामने आया. इस विषय पर एक घंटे से अधिक बातचीत चलती रही.

उन्होंने कई युक्तियां दीं. आकस्मिक ड्राइवर बहुत गरीब होते हैं, उनके काम के दिन कम करना जुल्म है; आकस्मिक कर्मियों को अवकाश न देने की प्रथा बहुत पुरानी है, उसे तोड़ा नहीं जा सकता; ऐसा कोई नियम नहीं है; इत्यादि. मेरे पास उनके सारे तर्कों का सामना करने का एक ही उपाय था, 1900 ईएमपी— जिसकी प्रति मेरे मेज़ पर मौजूद थी. दो घंटे बाद संगठन के ज़िला सभापति, देबू बाबू, ने कह दिया, ‘चूंकि आप हमारी मांग नहीं मान रहे हैं, हम लोग उठ नहीं पा रहे हैं.’ और मैंने उत्तर दिया, ‘तब बैठिए, चर्चा करें.’

फिर बात आरंभ हुई और संगठन ने फिर अपने पुराने तर्क दोहराए. ऐसा जब दो-तीन बार और हुआ तो मैंने कहा कि आप पुरानी बातों को ही दोहरा रहे हैं. अगर आपके पास कोई नया तथ्य है तो दिखाइए, नहीं तो आप बैठिए लेकिन मैं आपसे बात नहीं करूंगा.

इस पर उनकी आपस में कानाफूसी हुई और देबू बाबू ने कहा कि सरकार का एक नया आदेश है जो जलपाईगुड़ी कलेक्टरेट में लागू है. मैंने उनसे कहा कि वे मुझे वह आदेश मंगाकर दिखाएं. उनका एक बंधु कमरे से बाहर जाकर फोन कर के वापस आया और कहा कि जलपाईगुड़ी से कुछ ही देर में कोई वह आदेश पत्र लेकर रवाना होगा. अगर मैं उनकी मांग मान लेता हूं तो वे कल सुबह मुझे आदेश पत्र सौंप देंगे.

मैंने कहा कि आदेश देखने के बाद ही मैं उनकी मांग स्वीकार करूंगा. तब तक हम सब बैठकर उसका इंतजार करेंगे. जलपाईगुड़ी से अलीपुरद्वार पहुंचने में तीन घंटे लगते थे.

शाम के साढ़े छह बज चुके थे. सांझ रात्रि में बदल रही थी. मेरे साथ की मेज़ पर हमारे दफ़्तर के अगले वर्ष के बजट प्रस्ताव का दस्तावेज था. चूंकि मुझे आभास हुआ कि यह बैठक लंबी खिंचेगी, मैंने सोचा कि मैं इस दस्तावेज को सूक्ष्मता से जांच लूं और मैं पंक्ति दर पंक्ति बजट प्रस्ताव को पढ़ने तथा अंकों के हिसाब को जांचने में जुट गया.

आठ बज गए.

क़रीब साढ़े आठ बजे मेरे मित्र सबडिवीज़नल पुलिस अधिकारी ने मुझे टेलीफोन किया और पूछा कि क्या वह पुलिस बल भेजकर मेरा कमरा खाली कराएं. मैंने उनसे कहा कि ऐसा बिल्कुल न करें. मैं जानता था कि ऐसा करने से एक नया मुद्दा जन्म लेगा— कर्मी संगठन का पुलिस द्वारा क्रूरता से दमन तथा मैं और मेरी स्थिति कमजोर पड़ जाएंगे. मेरे दफ़्तर के बाहर ड्राइवर संगठन के सदस्यों की भीड़ भी जुट गई थी.

साढ़े नौ बजे ज़िला मुख्यालय से अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट ने फोन करके फिर यही पूछा कि मैं पुलिस द्वारा इस ग़ैरक़ानूनी घेराव को हटा क्यों नहीं देता. फोन पर ड्राइवरों के सामने मैंने इतना ही कहा कि इसकी आवश्यकता नहीं है.

रात के दस बज गए. कोई आदेश पत्र नहीं आया. न ही मेरे कमरे में एक गिलास पानी या चाय आई.

ग्यारह बज गए. दो प्रतिनिधियों ने आग्रह किया कि वह शौचालय जाना चाहते हैं. मैंने कहा, ‘आपनारा तो ऊठते पारछिलेन ना. जाबेन की कोरे? बोशे थाकुन. केउ बाइरे जाबे ना (आप लोग तो उठने में असमर्थ थे. जाएंगे कैसे? बैठे रहिए. कोई बाहर नहीं जाएगा). मैंने चपरासी को बाहर से दरवाज़ा बंद करने का आदेश दिया. आधे घंटे बाद उन दोनों को कुर्सी में छटपटाते देखकर मुझे तरस आ गया और मैंने उन्हें बाहर जाने की अनुमति दे दी.

बारह बज गए. नया दिन शुरू हुआ. मैं बजट प्रस्ताव की जांच करता रहा और मेरे समक्ष कुर्सी में ड्राइवर संगठन के सारे नेता बैठे रहे. चुपचाप. जब मैंने कुछ लोगों को झपकी लेते देखा तो मैंने कहा कि मेरे दफ़्तर में किसी को भी सोने की अनुमति नहीं है.

एक बज गया. दफ़्तर के बाहर किसी तरह की आवाज़ नहीं आ रही थी. मेरे कमरे में बैठे अधिकतर नेता शौचालय जाने के बहाने बाहर जाकर खाना खाकर आ चुके थे. परंतु सभी को आंख खोलकर चुपचाप बैठना पड़ रहा था.

दो बज गए, फिर तीन, फिर चार. पांच बज गए. दो-तीन नेता तो शौचालय से लौटे ही नहीं. मेरे सामने बैठे अधिकतर नेता प्रौढ़ थे और देबू बाबू तो वृद्ध हो चले थे. उनमें से अधिकतर लोगों के चेहरे मलिन पड़ गए थे.

छह बज गए. कुछ देर में सूर्योदय हो गया. साढ़े सात बजे मेरे कमरे में देबू बाबू और बाबलू के अलावा एक ही नेता रह गया था.

आठ बजे के क़रीब मैंने बजट प्रस्ताव का अंतिम पन्ना पलटने के बाद देबू बाबू से कहा कि ज़िले से कोई आदेश पत्र नहीं आएगा क्योंकि ऐसा कोई आदेश है ही नहीं. दफ़्तर की सफ़ाई का समय हो गया है अब आप लोग मेरे कमरे में नहीं बैठ सकते. जाइए.

देबू बाबू ने उठकर नमस्कार किया और कहा, ‘सार, आपनी खूब कठिन लोक (सर, आप एक बहुत कठिन व्यक्ति हैं).

मैंने एक रात की नींद गंवाई लेकिन पश्चिम बंगाल में पच्चीस वर्ष काम करते हुए मुझे फिर कभी किसी भी कर्मचारी संगठन के साथ परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा.

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

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