रचनाकार का समय: पाठक मिट रहे हैं, उपभोक्ता दृश्य पर काबिज़ हैं

यह दुर्भाग्य है कि आज के लेखक के समक्ष पढ़ने का अभिनय करने वाले लोगों का हुजूम है - लेकिन पाठक नहीं. आज लेखक पाठक नहीं, उपभोक्ता की तलाश में भटक रहा है. एक चमकती हुई किताब और धुआं छोड़ते पिज़्ज़ा में बहुत कम अंतर रह गया है. 'रचनाकार का समय' में पढ़ें कवि अच्युतानंद मिश्र को.

अच्युतानंद मिश्र. (दाएं) (फोटो साभार: सोशल मीडिया/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

‘फ़र्ज़ कीजिये आप कहीं पहुंचने के लिए निकले हैं और बीच रास्ते में आपको यह बताना पड़े कि सफ़र कैसा रहा तो आप खुद को दुविधापूर्ण स्थिति में पायेंगे? ज़ाहिर-सी बात है कि किसी लेखक को अगर यह बताना पड़े कि वह क्यों लिखता है या उसके लिखने का कारण क्या है तो वह खुद को इसी तरह की स्थिति में पायेगा, लेकिन फिर भी यदा-कदा उसको इस प्रश्न से जूझना पड़ता है और सफ़र के बीच में ही मंजिल पर पहुंचने के अनुभव को बताना पड़ता है.

वैसे भी लिखना कभी अंतिम नहीं होता. लेखक का सफ़र कभी ख़त्म नहीं होता. वह हमेशा बीच में ही रहता है और इस लिए लेखक का संघर्ष बीच में रहते हुए मंजिल पर पहुंचने के अनुभव के बखान की जटिलता को अपने में लिए रहता है.

उसका अनुभव कभी पूर्ण नहीं होता. वह अपूर्णता और अधूरेपन की पूंजी के साथ ही उम्र भर लिखता रहता है. वह इस अधूरेपन और अपूर्णता से उबरने के संघर्ष में लगा रहता है और यहीं से लेखक का बाहरी और भीतरी संघर्ष चलता रहता है. कोई लिखना सीखकर नहीं आता. लिखते हुए सीखना पड़ता है. पर अक्सर ही सीखा हुआ लेखन, ज़रा भी काम नहीं आता. उसे लगता है सबकुछ फिर से शुरू करना होगा. सबकुछ समाप्त हो चुका है और सबकुछ फिर से शुरू करना होगा, यह वाक्य और इसकी अनुगूंज किसी भी लेखक के भीतर कभी समाप्त नहीं होती. हर बार नए सिरे से शुरू करना लिखने की अनिवार्य शर्त है, चाहे आप प्रेमचन्द हों, निराला हों या मुक्तिबोध.

अब सवाल है कि यह शुरुआत, यह हर बार का आरंभ किस तरह होता है? इसी सवाल के जवाब को ढूंढते हुए लेखक, समाज और समय के अंतर्संबंधों को पहचान सकते हैं. सबसे पहली बात किसी बुनियादी प्रश्न के, कसक के या ख़लिश के बगैर कोई लिखने की दुनिया में नहीं आ सकता. लिखना ता-जिंदगी उस प्रश्न का, उस कसक का अथवा उस ख़लिश का जवाब ढूंढना है. लेकिन मज़ेदार बात यह है कि वह ज्यों-ज्यों लिखता जाता है, वह उत्तर के नहीं प्रश्न के करीब आता जाता है. लिखना दवा नहीं है, मर्ज़ को पहचाने की असमाप्त कोशिश है.

जैसे-जैसे लेखक परिपक्व होता जाता है, प्रश्न भी अपना स्वरुप विस्तृत करता जाता है. और प्रश्न का पीछा करते-करते उसका संबंध समय-समाज से गहरा होता जाता है. आरम्भ में ज़्यादातर किसी निजी अनुभूति या प्रश्न से शुरू करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे लेखक का जुड़ाव समय-समाज से होता जाता है.

लेखक के तौर पर विकसित होने का अर्थ है- आत्म का, निज का विस्तार. एक ऐसे आत्म की खोज, जो निजता की सीमाओं का अतिक्रमण करे. हमारे आत्म में संसार का बोध या जिसे मुक्तिबोध विश्व-दृष्टि कहते हैं, का परिलक्षित होना. बाह्य संसार का हमारे अंतःकरण में घटित होना लेखन की अनिवार्य शर्त है.

कोई भी सच्चा लेखक अपने इर्द-गिर्द से, अपने परिवेश से, अपने लोगों से मुक्त होकर लिख नहीं सकता. इसी अर्थ में हर लेखक को अपने समय-समाज से साक्षात्कार करना ही होता है. इस तरह एक लेखक आकार लेता है, आरंभिक स्वप्न से जागते हुए वह यथार्थ की दुनिया में प्रवेश करता है. यही वह बिंदु है, जहां स्वप्न की दुनिया में ही जीते रहने वाले, लेखक होने से इनकार कर देते हैं. जो बच जाते हैं, वे अपना रास्ता खोजते हैं. यह कोई बना बनाया रास्ता नहीं है हर लेखक को अपना रास्ता खोजना होता है.

अच्युतानंद मिश्र की पुस्तकें. (साभार: संबंधित प्रकाशन)

आज लिखना पिछले किसी भी समय से अधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण हो चला है. समाज के साथ हमारा संबंध अधिक जटिल एवं बहुयामी हो गया है. समाज हमें कई स्तरों पर नियंत्रित करता है, लेकिन सामाजिक हुए बगैर मनुष्य की कोई सार्थकता नहीं. मनुष्य समाज के बगैर अपनी समस्त रचनात्मकता और विवेकशीलता को खो देगा. दूसरी तरफ मनुष्य-मनुष्य के बीच मौजूद ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संबंध एक ऐसे मुकाम पर हैं, जहां सूचना और तकनीकी माध्यम उसे निर्धारित और नियंत्रित कर रहें हैं. इसलिए आज एक लेखक का संघर्ष बहुआयामी हो गया है. उसे सामाजिक नियंत्रण का अतिक्रमण भी करना है और सामाजिक संबंधों का निर्वाह भी. यह जटिलता आज के लेखक की सच्चाई है .

लेखकीय विवेक को सबसे बड़ा संकट यहीं से शुरू होता है. मनुष्य ने सामाजिक होने की प्रक्रिया में भाषा और साहित्य की खोज की. जब वह पेड़ों से मैदान पर आया तो उसके हाथ स्वतंत्र हुए और इन स्वतंत्र हाथों ने उसके भीतर स्वतंत्रता, सहभागिता एवं सहयोग की भावना को भरा. यह परिघटना ही मनुष्य के उद्भव की परिघटना है. इस भावना ने उसके भीतर उदात्त की चेतना को जन्म दिया. उदात्तता का यह भाव मनुष्यता के मूल में है. उदात्तता ही उसे शब्दों तक ले गई.

उदात्त होने का अर्थ ही कवि (कलाकार) होना था. इसलिए मुझे हमेशा लगता है कि काव्यबोध के वशीभूत होकर उसने अभिव्यक्ति की बेचैनी को महसूस किया और भाषा की खोज की. कविता से वह भाषा की तरफ आया, न कि भाषा से कविता तरफ. ध्वनि और कंठ तो अन्य प्राणियों के पास भी हैं. ख़ूबसूरत घोंसला तो चिड़ियां भी बुनती है. लेकिन कंठ में मौजूद ध्वनि को शब्द और भाषा में बदलना बग़ैर किसी काव्यात्मक प्रेरणा के संभव नहीं. यह प्रेरणा, यह शक्ति मनुष्य ही का हासिल है.

रचनात्मक होने की यह मूल दृष्टि ही उसे संसार को बदलने के लिए प्रेरित करती है. असली बात है परिवर्तन. और वह परिवर्तन सबसे पहले दृश्य में घटित होता है. इस संसार को मनुष्य की आंख उसी काव्यात्मक प्रेरणा के तहत देखती है, इसीलिए मनुष्य संसार को सतत रूपांतरित करता चलता है. वह प्रकृति से मिली हर चीज़ को अपनी कसौटी पर कसता है, रूपांतरित करता है और फिर उसे उपयोग में लाता है. यह मानवीय प्रक्रिया है. लेकिन यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि इस प्रक्रिया में मनुष्य के स्वतंत्र हाथ लगे हैं, उन हाथों की अपनी गति है, अपना अनुशासन है.

हाथों की गति का संबंध, उसके मष्तिष्क, उसके विवेक, उसके हृदय से है. लिखना भी यही है. दिल-दिमाग के बीच एक रचनात्मक संतुलन, जिसमें मानवीय गति अंतर्भूत रहती है. मनुष्य जब देखता है, दृश्य को आत्म में रूपांतरित करता है और फिर जब शब्दों में उसे व्यक्त करता है, इन सबके बीच, इन प्रक्रियाओं के बीच मौजूद अंतराल, ठहराव उसे रचनात्मक बनाते हैं. सूचना माध्यमों ने, तकनीक के साधनों ने इस मानवीय गति को बदल दिया है. वे दृश्य, अनुभव और अभिव्यक्ति के मध्य मौजूद तमाम रचनात्मक अंतरालों को नष्ट कर देते हैं. और इस अर्थ में वे मानवीय रचनाशीलता को ,उसकी रचनात्मक प्रतिभा को नष्ट करते हैं.

नीत्शे का यह कहना कि जब हम धीरे-धीरे कविता पढ़ रहे होते हैं तो हम आधुनिकता को चुनौती दे रहे होते हैं, दरअसल इसी रचनात्मक प्रक्रिया को साकार करने की कोशिश है. पढ़ना भी रचनाशीलता का ही आयाम है. पढ़ते हुए हर पाठक लेखक में तब्दील होता है. इसीलिए हमारे यहां पाठक और लेखक के बीच भेद नहीं किया गया है, उसे सहृदय कहा गया है. सहृदय का होना किसी रचनात्मक संस्कृति के मौजूद होने का प्रमाण है.

सूचना और तकनीक के इस युग ने लेखकों के साथ पाठकों को भी अंत के कगार पर ला खड़ा किया है. लेखन के साथ-साथ पाठकीयता को भी चुनौती मिल रही है. सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या पाठक की मृत्यु हो चुकी है? क्या अब भी वह सहृदय के रूप में, रचनात्मक प्रक्रिया का साक्षी है? क्या पढ़ना अब भी उसी अर्थ में रचनात्मकता से पूर्ण और आनंददायी रह गया है?

यह दिलचस्प है कि इस सबके बीच लिखित वस्तुओं का भौतिक-अभौतिक उत्पादन अबाध गति से हो रहा है. पिछले दो दशकों में जितनी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं उतनी दो सदियों में नहीं हुई होंगी. इसका क्या अर्थ है? पाठकीय विमुखता और लेखकीय विपुलता के बीच क्या संबंध है?

दरअसल लेखन अपनी रचनात्मक प्रक्रिया से अलग होकर वस्तु उत्पादन की प्रक्रिया में बदल गया है. लेखक उत्पादक है और पाठक उपभोक्ता. एक पुस्तक को पढ़ना किसी खाद्य पदार्थ को खाने की प्रक्रिया में तब्दील हो चुका है. लेखकीय मूल्यों का न सिर्फ हृास हुआ है, बल्कि लेखक स्वयं उत्पाद, उसका विक्रेता और उसका प्रचारक बन गया है.

हम अपने इर्द -गिर्द आए दिन लेखकों की इस रूपांतरित भूमिका को देख रहे हैं. हम देख रहे हैं कि एक पुस्तक को एक तस्वीर में -एक पाठक द्वारा पढ़े जाने की तस्वीर में- बदला जा रहा है. इस प्रक्रिया में पढ़ना एक मृत प्रक्रिया है और पाठक मृत्यु को पा चुका है. आए दिन हमारा सामना सोशल मीडिया पर ऐसी अनगिनत तस्वीरों से होता है, जिसमें लेखक के आग्रह पर उसकी पुस्तक को पढ़ने का अभिनय करता हुआ एक व्यक्ति तस्वीर लगाता है. लेखक प्रसन्नता का अभिनय करता है? या संभव है कि वह प्रसन्नता को महज़ उपभोग समझ रहा हो और उसे लगता है कि उसने बहुत कम दाम चुकाकर एक बेहतरीन खाद्य पदार्थ पा लिया है. सबकुछ सतह पर घटित होता है.

यह भयावह दृश्य है. इस दृश्य में पाठक की मृत्यु हो चुकी है और इसमें लेखक की आत्मा का सिसकना और लेखकीय चेतना से उसके विलगाव को देखा जाना चाहिए.

क्या यह दुर्भाग्य है कि आज के लेखक के समक्ष पढ़ने का अभिनय करने वाले लोगों का हुजूम है – लेकिन पाठक नहीं? वह किसके लिए लिख रहा है? वह किसके विरुद्ध लिख रहा है? उसके लिखने का उद्देश्य क्या है? ये प्रश्न निःशेष हो चुके हैं. उसकी जगह लेखक है जो उत्पादक में बदल रहा है. वह कीमत चुका रहा है.

खाने की मेज़ पर किताबें बिखरी हुई हैं. कोई पाठक उसे खा रहा है. लेखक का उद्देश्य सिर्फ किताबों का उत्पादन है. इस उत्पादन को तीव्र गति से भकोसने वाले पाठक की उसे खोज है. ये दोनों, किसी प्रकाशक, किसी व्यापारी, किसी संस्था, किसी पूंजीपति के हाथों नाच रहे हैं. आज का लेखक पाठक की खोज में नहीं उपभोक्ता की तलाश में भटक रहा है. एक चमकती हुई किताब और धुआं छोड़ते पिज़्ज़ा में बहुत कम अंतर रह गया है.

(अच्युतानंद मिश्र कवि-आलोचक हैं.)

(इस श्रृंखला के सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)