सुप्रीम कोर्ट ने अपने ग़ैर-न्यायिक कर्मचारियों के लिए आरक्षण नीति लागू की

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अपने ग़ैर-न्यायिक कर्मचारियों की सीधी भर्ती और पदोन्नति में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण की औपचारिक नीति लागू की है. यह ऐतिहासिक कदम 23 जून 2025 से प्रभावी हुआ.

सीजेआई बीआर गवई. (फोटो साभार: द वायर/Wikipedia)

नई दिल्ली: देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने अपने कर्मचारियों की सीधी भर्ती और पदोन्नति में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षण की औपचारिक नीति लागू की है. 

यह ऐतिहासिक कदम 23 जून 2025 से प्रभावी हुआ है और देश की शीर्ष अदालत के आंतरिक प्रशासन में एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार, पदोन्नति में एससी कर्मचारियों को 15% और एसटी कर्मचारियों को 7.5% आरक्षण दिया जाएगा.

किस पदों पर लागू होगी आरक्षण नीति?

नई नीति के तहत सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार, सीनियर पर्सनल असिस्टेंट, असिस्टेंट लाइब्रेरियन, जूनियर कोर्ट असिस्टेंट और चैंबर अटेंडेंट जैसे गैर-न्यायिक पदों पर आरक्षण लागू किया जाएगा.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, मॉडल रोस्टर में सभी कर्मचारियों को तीन श्रेणियों- एससी एसटी और अनारक्षित में बांटा गया है.

24 जून को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी सर्कुलर में कहा गया, ‘सक्षम प्राधिकरण के निर्देशानुसार, यह सूचित किया जाता है कि मॉडल आरक्षण रोस्टर और रजिस्टर को सुपनेट (कोर्ट का आंतरिक नेटवर्क) पर अपलोड कर दिया गया है और यह 23 जून, 2025 से प्रभावी माना जाएगा.’

सर्कुलर में यह भी कहा गया है कि यदि किसी कर्मचारी को रोस्टर या रजिस्टर में कोई गलती दिखाई दे तो वह अपनी आपत्ति रजिस्ट्रार को भेज सकता है.

इस पहल से न्यायपालिका सामाजिक रूप से और भी उत्तरदायी बनेगी: सीजेआई

यह ऐतिहासिक बदलाव मुख्य न्यायाधीश- जस्टिस बीआर गवई के कार्यकाल में हुआ है, जो एससी समुदाय से आने वाले केवल दूसरे ऐसे जज हैं जो देश के मुख्य न्यायाधीश बने हैं.

उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा, ‘सभी सरकारी संस्थानों और कई हाई कोर्ट में पहले से ही एससी और एसटी के लिए आरक्षण की व्यवस्था है, तो फिर सुप्रीम कोर्ट अपवाद क्यों हो? सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और सकारात्मक कार्रवाई पर कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं, और अब संस्थान के तौर पर उसे इन्हीं सिद्धांतों को लागू भी करना चाहिए. हमारे कार्य हमारी सोच का प्रतिबिंब होने चाहिए.’

सीजेआई गवई ने आगे कहा, ‘मैं हमेशा मानता हूं कि समानता और प्रतिनिधित्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि संविधान की दिशा में साथ चलने वाली शक्तियां हैं. सकारात्मक कार्रवाई समानता का अपवाद नहीं, बल्कि उसकी सच्ची अभिव्यक्ति है. यह पहल न्यायपालिका को और अधिक सामाजिक रूप से उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक संकेत है.’