फंड की कमी के बीच केवल दो पीएचडी पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करेगा जेएनयू

जेएनयू शैक्षणिक सत्र 2025-26 में केवल दो पीएचडी कोर्स- सिनेमा अध्ययन और कोरियाई अध्ययन के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करेगा. कुछ अन्य विभाग भी प्रवेश परीक्षा आयोजित करने के पक्ष में थे, लेकिन इसमें वित्तीय समस्याएं एक अहम चुनौती के रूप में सामने आई हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो साभार: Wikimedia Commons/GS Meena/CC BY-SA 3.0)

नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) शैक्षणिक सत्र 2025-26 में केवल दो पीएचडी कोर्स- सिनेमा अध्ययन और कोरियाई अध्ययन के लिए प्रवेश परीक्षा (जेएनयूईई) आयोजित करेगा.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, विश्वविद्यालय के कुछ स्कूल जेएनयू द्वारा प्रवेश परीक्षा आयोजित करने के पक्ष में थे, लेकिन इसमें वित्तीय समस्याएं एक अहम चुनौती के रूप में सामने आई है.

स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स (एसएए) की डीन प्रोफेसर पारुल दवे मुखर्जी ने अखबार से कहा, ‘हमें बताया गया कि हमारे लिए इन-हाउस परीक्षा आयोजित करना आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है. इसके बाद डीन यूजीसी-नेट मोड के माध्यम से आगे बढ़ने पर सहमत हुए. कुछ महीने पहले एक बैठक में यह बात हुई थी.’

बताया गया है कि पिछले साल जुलाई 2024 में कुलपति शांतिश्री धुलीपुडी पंडित की अध्यक्षता में एक बैठक हुई थी, जिसमें यह बताया गया था कि जेएनयू में प्रवेश परीक्षा आयोजित करने के लिए केंद्रीय निकायों से कोई वित्तीय सहायता नहीं मिलेगी. इसके बाद डीन और अध्यक्षों से कहा गया कि वे संकाय सदस्यों से परामर्श करें और इन-हाउस परीक्षा पर अपनी स्थिति का विवरण देते हुए प्रस्ताव प्रस्तुत करें.

हालांकि, स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स (एसएए) और स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिटरेचर एंड कल्चर स्टडीज (एसएलएल एंड सीएस) दोनों ने जेएनयू को पत्र लिखकर जेएनयूईई मॉडल पर ही वापसी की मांग की थी.

प्रवेश परीक्षा पर सहमत थे विभाग

इस संबंध में 9 जुलाई, 2024 को लिखे एक पत्र में एसएए की पूर्व डीन उर्मिमाला सरकार मुन्सी ने तर्क दिया था कि नेट-जेआरएफ और एमसीक्यू प्रारूप दृश्य अध्ययन और सिनेमा अध्ययन जैसे क्षेत्रों में आवश्यक शोध के लिए ‘उपयुक्त नहीं’ हैं. पत्र में वित्तीय सीमाओं को स्वीकार करते हुए एक किफायती मॉडल तैयार करने के लिए प्रशासन के साथ सहयोग का प्रस्ताव दिया गया था.

इसमें लिखा था, ‘हम सर्वोत्तम संभव समाधान सुनिश्चित करने के लिए इस पर आगे चर्चा कर सकते हैं…’ इसी तरह, 22 जुलाई, 2024 को एसएलएल एंड सीएस में अध्यक्ष की बैठक में जेएनयूईई के पक्ष में आम सहमति बनी.

बैठक के विवरण में कहा गया है, ‘संकाय सदस्यों की राय है कि जेएनयू को अध्ययन के सभी कार्यक्रमों के लिए अपनी प्रवेश परीक्षा आयोजित करनी चाहिए… इस तरह के कदम से धन जुटाने में मदद मिलेगी.’

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि शिक्षाविद प्रवेश मॉडल का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन वित्तीय तौर-तरीकों का मूल्यांकन सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए.

इस बारे में जब अखबार ने एसएलएल एंड सीएस की डीन प्रोफेसर शोभा शिवशंकरन से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कॉल या संदेशों का जवाब नहीं दिया.

विश्वविद्यालय के आधिकारिक सूत्रों ने कहा, ‘जेएनयू प्रशासन विकेंद्रीकृत और लोकतांत्रिक है. सभी डीन ने सीयूईटी और नेट के माध्यम से प्रवेश के निर्णय को स्वीकार कर लिया है. इस पर उनके हस्ताक्षर हैं, इसलिए इसे लागू किया गया है. जेएनयूईई केवल सिनेमा अध्ययन और कोरियन अध्ययन में पीएचडी प्रोग्राम के लिए आयोजित किया जा रहा है, जैसा कि डीन और अध्यक्षों द्वारा अनुशंसित किया गया है. छात्रों को प्रवेश देने के लिए प्रशासन सभी विकल्पों के लिए खुला है. हम संकाय, केंद्र अध्यक्षों और डीन द्वारा लिए गए निर्णयों का सम्मान करते हैं.’

पहले होती थी प्रवेश परीक्षा, बाद में सीयूईटी लागू हुआ

मालूम हो कि जेएनयू पहले अपने सभी कार्यक्रमों के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करता था. हालांकि, स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी) की शुरुआत के साथ और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के अनुरूप, यह पीएचडी प्रवेश के लिए यूजीसी-नेट स्कोर पर निर्भर हो गया.

पिछले साल विश्वविद्यालय ने यूजीसी-नेट के अंतर्गत शामिल न होने वाले कुछ विषयों – जैसे कोरियाई भाषा, कला और सौंदर्यशास्त्र, और श्रम अध्ययन के लिए जेएनयूईई को बहाल करने की व्यवहार्यता का पता लगाने के लिए एक समिति भी बनाई थी.

जेएनयूईई के लिए दबाव तब शुरू हुआ जब पेपर लीक के आरोपों के कारण यूजीसी-नेट को रद्द कर दिया गया, जिससे कुलपति ने जेएनयूईई को बहाल करने पर हितधारक परामर्श के लिए खुलापन व्यक्त किया.

छात्रसंघ भी चाहता है प्रवेश परीक्षा

इसी बीच, जेएनयू छात्र संघ (जेएनयूएसयू) ने 28 जून को लिखे पत्र में बातचीत के विचार का स्वागत किया, लेकिन जेएनयूईई के लिए विश्वविद्यालय के लागत अनुमान को चुनौती दी. इस मामले को लेकर अध्यक्ष नीतीश कुमार, उपाध्यक्ष मनीषा और महासचिव मुन्तेहा फातिमा द्वारा हस्ताक्षरित एक पत्र में कहा गया, ‘अधिकांश डीन और अध्यक्षों ने जेएनयूईई को बहाल करने का समर्थन किया है.’

इस पत्र में डीन ऑफ स्टूडेंट्स द्वारा बताए गए 5,000 रुपये प्रति छात्र के आंकड़े पर भी सवाल उठाया गया और जेएनयू शिक्षक संघ (जेएनयूटीए) के प्रतिनिधियों और ‘सभी संबंधित अधिकारियों’ के साथ एक संयुक्त बैठक की मांग की गई.

अपने जवाब में कुलपति शांतिश्री धुलीपुडी पंडित ने लिखा, ‘यह आपका संगठन, जेएनयूएसयू और आपकी जिम्मेदारी है कि आप समावेशी बनें, चाहे वे सहमत हों या नहीं. समावेशी होना एक लोकतांत्रिक प्रथा है.’

उन्होंने हितधारक बैठक के लिए सहमति जताई, लेकिन कहा कि अगर जेएनयूटीए के सदस्यों को शामिल किया जाता है, तो संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए छात्र संघ के सभी 4 सदस्यों के साथ जेएनयू शिक्षक फेडरेशन (जेएनयूटीएफ) को भी आमंत्रित किया जाना चाहिए.

जेएनयूएसयू तब से भूख हड़ताल पर है और अन्य मुद्दों के अलावा जेएनयूईई को बहाल करने की मांग कर रहा है.

यह पूछे जाने पर कि एबीवीपी के संयुक्त सचिव वैभव मीना विरोध में क्यों शामिल नहीं हुए, जेएनयूएसयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने कहा, ‘संयुक्त सचिव एनटीए के माध्यम से प्रवेश करने के पक्ष में हैं.’

एबीवीपी के एक सूत्र ने कहा, ‘जेएनयूईई व्यक्तिपरक है और समावेशी नहीं है. परीक्षा में आने वाले प्रश्न भी बहुत पक्षपाती हैं. यही कारण है कि एबीवीपी इनहाउस परीक्षा के पक्ष में नहीं है. यूजीसी नेट तुलनात्मक रूप से अधिक समावेशी है और हमने परिसर में आने वाले छात्रों में बहुत अधिक विविधता देखी है.’

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब छात्र संघ के भीतर वैचारिक मतभेद उभरे हैं. 2015 में भी इसी तरह का मतभेद देखने को मिला था, जब एबीवीपी ने चार सदस्यीय पैनल में एक सीट जीती थी, जिसके बाद सामूहिक निर्णय लेने को लेकर तनाव पैदा हो गया था.