रचनाकार का समय: ‘अतीत हमें सताता है और वर्तमान जीने नहीं देता’

क्या पीड़ित समुदाय कभी उनकी तरह बेफ़िक्र हो कर लिख पाएंगे जिनकी ज़िंदगी उन शिकारियों की तरह रही, जिन्होंने पीड़ितों की गाथाएं एक शिकारी के नज़रिए से लिख दी और जंगल से उनके पैरों के निशान तक मिटा डाले... रचनाकार का समय में पढ़ें कवि-कथाकार अनिता भारती को.

/
अनिता भारती. (दाएं) (फोटो साभार: सोशल मीडिया/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

‘जब तक हिरण अपना इतिहास खुद नही लिखेंगे, तब तक हिरणों के इतिहास में शिकारियों की ही शौर्य गाथाएं गायी जाती रहेंगी.’
~ चिनुआ अचेबे

मैं क्यों लिखती हूं या मैंने क्यों लिखना शुरू किया या आज लिखने का समय क्या है, यह बात उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना हमारा होना या हो सकने के लिए दम साधे पूरी ताकत लगाए रखना. हम रचनाकार हैं भी या सिर्फ अपने होने मात्र के कारण भोगे दुख, पीड़ा और संत्रास को अपने दिल पर रखे एक पत्थर के समान ढोये जा रहे हैं -हमारे सीने पर रखा ऐसा भारी पत्थर जो कभी हटता नहीं. लाख कोशिश करो, खूब छटपटाओ, कितने भी हाथ-पैर मारो पर उस बेरहम पत्थर पर एक निशान तक नही उभरता. शरीर का एक-एक अंग लहुलुहान पड़ा है.

सोचती हूं क्या हमारे लिखने का समय कभी था भी या नहीं, क्या कभी हम उनकी तरह बेफ़िक्र हो कर लिख पाएंगे जिनकी ज़िंदगी उन शिकारियों की तरह रही, जिन्होंने हमारी गाथाएं एक शिकारी के नज़रिए से लिखने की कोशिश की और एक निरीह प्राणी समझ जंगल से हमारे पैरों के निशान तक मिटा डाले. क्या इसलिए चिनुआ अचेबे ने उपरोक्त उक्ति कही. सालों दमन-शोषण सहने के बाद क्या हमारी कलम इस लायक छोड़ी गई कि हम कुछ लिख पाएं.

अपने दुख-दर्द से उबर कर कलम पकड़ना आसान नही होता, वो भी तब जब आपको पता हो कि आपके भाई-बहनों, बच्चों, बूढ़े-बुज़ुर्गों के साथ आज भी वही क्रूरता बरती जा रही हो जो सदियों से चली आ रही है. चारों ओर पतझड़ में सूखे पत्तों की तरह अमानवीय हिंसक खबरें बिखरी पड़ी हों कि फलां जगह से किसी दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया या किसी बच्ची का बलात्कार सिर्फ इसलिए कर दिया गई वह एक गरीब की बेटी थी जिसकी जाति जन्म के साथ उसके माथे पर चिपका दी गई या किसी समुदाय को इसलिए गांव से बेदख़ल कर दिया या उनकी झोपड़ियों में इसलिए आग लगा दी गई कि वे अपनी वाजिब मज़दूरी व हक मांग रहे थे. जहां किसी का साफ कपड़े पहनकर सुंदर दिखना या केवल मूंछ भर रख लेना भी इतना बड़ा अपराध होता कि उसकी जान ही ले ली जाए.

यही कहानी हमारे बाबा की भी थी जो अपने पैतृक गांव से जान बचाकर अपने दोनों बच्चों को, जिनमें मेरे पिता भी थे, लिए दिल्ली पलायन कर गए थे. पिता सारी उम्र एक भय और जातीय दंश के साथ जीते हुए कभी अपने पैतृक गांव नहीं जा पाए और न अपने बच्चों को कभी गांव जाने दिया, शायद यही सोचकर कि जो उन पर बीती कहीं वही उनके बच्चों के साथ भी न घटित हो जाए.

पर उन्हीं पैतृक गांवों का हिरण के शिकारियों द्वारा महिमामंडन किया जाता रहा है. उनके पक्के घर, खुला आंगन, बड़े खेत, बड़े बाग-बगीचे और उसमें काम करते तमाम नौकर- चाकर, हलवाहे, गरीब दलित महिलाएं.

बासी अतीत, दुखदाई अतीत जिसमें इंसान पीड़ा में गल जाता है, पर वंचित समाज के एक हिस्से ने उससे लड़कर, कलम को हथियार बनाकर ज़ुल्म की ज़ंजीर को तोड़ना सीखा. रचनाकार जब लिखता है तो वह मात्र लिखता ही नही है, वह कुछ बदलना भी चाहता है. अगर कुछ बदल जाए तो वह उसकी निजी सफलता कतई नहीं कही जाएगी, क्योंकि वह अपने समाज के कंधे पर चढ़कर बड़ा हुआ है.

अनिता भारती की पुस्तकें. (साभार: संबंधित प्रकाशन)

रचनाकार अपने साथ अपने आस-पास की घटनाओं को देखकर और महसूस कर बड़ा होता है. जितना उसने महसूस किया होगा, दिल-दिमाग के स्तर पर अन्वेषण किया होगा व जिसकी इस अन्वेषण के साथ भविष्य पर आंखें टिकी होंगी, वह उतना बड़ा रचनाकार होगा.

अंदर से लोकतांत्रिक होने के साथ-साथ एक अच्छे रचनाकार के लेखन में भी लोकतांत्रिक मू्ल्य निहित होते हैं. आखिर यह लोकतांत्रिक मूल्य समता-समानता-स्वतंत्रता-बंधुत्व-भाईचारा ही तो हैं. सभी समान हैं, सभी बराबर हैं, बिना किसी लिंग,जाति,धर्म,भाषा,रंग के विभेदों के. इन सिद्धांतों के बिना कोई भी रचना प्राणहीन है, कुसंस्कृति की पोषक है और उसका रचनाकार शोषण और अन्याय के साथ खड़ा है.

रचनाकार के लिए यह समय बहुत कठिन है. कबीर की भाषा में कहें तो आज सच के साथ खड़ा होना वस्तुतः अपने घर फूंकने जैसा है. बहुत सारे रचनाकार सच को छोड़कर, अन्याय के साथ जा खड़े हुए हैं.

सच की नाव में बैठा रचनाकार तो हमेशा ख़तरे से खेलता रहा है पर अब तो लड़ाई कठिन से कठिनतर होती जा रही है. एक समय ऐसा था जब सब परिवर्तनगामी शक्तियां एकत्र हो रही थीं. हर तरह के वर्चस्वाद के खिलाफ लोग लामबंद हो रहे थे. पर हम उस समय को पकड़कर नही रख पाए. अधिकांश परिवर्तन कामी, मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में  की तरह इकट्ठे होकर अपने स्वार्थ और सुविधाभोगी जीवन की ओर दौड़ पड़े. एक सजग रचनाकार के लिए ऐसे समय में बने रहना कितना कठिन है जबकि उसे पता हो सत्ता के सारे साधनों पर ऐसे रीढ़हीन लोगों की पैंठ हो गई है.

पर आज भी सजग-सचेत रचनाकार अपने कर्तव्यपथ से हटा नहीं है. जो कुछ भी इस समय अच्छा बच रहा है वह उसके कारण ही है. इसलिए कहीं-कहीं से अच्छी खबर या अच्छी रचना, थोड़ा हौसला, थोड़ी बहादुरी हम तक पहुंच रही है. हमारे जैसे रचनाकार के पास भी ऐसा समय आएगा जब किसी बच्चे को उसकी जाति के कारण स्कूल में पानी पीने के लिए न मार दिया जाए या मटका छूने भर से उनकी उंगलियां न तोड़ दी जाएं. जब मास्टरों और जातिख़ोरों के मुंह से जहरीले झाग जैसी गालियां निकलनी बंद हो जाएंगी और बच्चे बेफ़िक्र हो किसी तितली के साथ खेलते हुए शुद्ध नीले आकाश के नीचे विचरेंगे.

उस समय को लाने की भरपूर कोशिश जारी रहनी चाहिए.

(अनिता भारती कवि-कथाकार हैं.)

(इस श्रृंखला के सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)