असम सरकार के प्रस्तावित थर्मल प्लांट के लिए धुबरी में 2,000 से ज़्यादा मिया मुस्लिम परिवार बेघर किए गए

8 जुलाई को धुबरी ज़िला प्रशासन ने ज़िले के बिलाशीपारा में असम सरकार के प्रस्तावित 3,400 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट स्थल पर 2,000 से ज़्यादा मिया मुस्लिम परिवारों को हटाने का अभियान शुरू किया. स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस बेदखली अभियान से 10,000 भूमिहीन मिया मुसलमान विस्थापित हो जाएंगे.

कहीं और जाने की जगह न होने के कारण, कई बेदखल परिवारों ने ब्रह्मपुत्र नदी के तटीय क्षेत्रों में अपने रिश्तेदारों के पास अस्थायी रूप से बसने का फैसला किया है. लोग अपने टूटे हुए घरों को नावों पर ले जा रहे हैं. (फोटो: काज़ी शरोवर हुसैन)

बारपेटा, असम: 8 जुलाई को धुबरी ज़िला प्रशासन ने ज़िले के बिलाशीपारा में असम सरकार के प्रस्तावित 3,400 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट स्थल पर 2,000 से ज़्यादा मिया मुस्लिम परिवारों को हटाने का अभियान शुरू किया.

4 जुलाई को एक सार्वजनिक घोषणा की गई. अगले ही दिन 5 जुलाई को चापर सर्कल कार्यालय के अधिकारियों ने चारुआबाखरा जंगल ब्लॉक, चिरकुटा भाग-1, भाग-2 और संतोषपुर सहित गांवों के विभिन्न स्थानों पर बेदखली के नोटिस चिपका दिए, जिससे परिवारों को अपने घर खाली करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

चार गांवों की 5,000 बीघा से अधिक भूमि के बारे में स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस बेदखली अभियान से 10,000 भूमिहीन मिया मुसलमान विस्थापित हो जाएंगे.

पहले थर्मल पावर प्लांट की शुरुआत कोकराझार जिले के एक आदिवासी बहुल इलाके में की गई थी. स्थानीय लोगों के कड़े विरोध के बाद इसे धुबरी जिले के बिलापशीपारा इलाके में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां मुख्यतः मिया समुदाय के लोग रहते हैं.

धुबरी ज़िले के बिलाशीपारा इलाके में 3,400 मेगावाट के प्रस्तावित थर्मल पावर प्लांट स्थल पर बड़े पैमाने पर बेदखली अभियान चल रहा है. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

अपने ध्वस्त घर के परिसर में खड़ी चिराकुटा गांव की 52 वर्षीय अजीरन नेस्सा कहती हैं, ‘अचानक हमें अपना सामान पैक करके सिर्फ़ 50,000 रुपये लेकर जाने को कहा गया. हम कहां जाएंगे?’

वह पूछती हैं, ‘हम नदी के बीचों-बीच कैसे रह सकते हैं जहां सरकार हमें बसाना चाहती है?’

यह नोटिस असम भूमि एवं राजस्व विनियमन, 1886 के तहत जारी किया गया था. इसमें उल्लेख किया गया था कि प्रत्येक भूमिहीन परिवार को 50,000 रुपये दिए जाएंगे, साथ ही धुबरी के अथानी राजस्व मंडल के अंतर्गत बोयजर अल्गा गांव में पुनर्वास का वादा किया गया था.

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा द्वारा 24 जून को प्रस्तावित थर्मल पावर प्लांट स्थल का दौरा करने के बाद बेदखली की प्रक्रिया और तेज़ हो गई.

हालांकि, मियादी पट्टा भूमि वाले परिवार अभी भी इस क्षेत्र में रह रहे हैं, लेकिन चार गांवों के अधिकांश निवासियों – जो ‘सरकारी भूमि’ पर रहते थे – को बेदखली नोटिस के बाद अपने घर खाली करने पड़े.

पुनर्वास स्थल, बोयेजर अल्गा, एक निचला इलाका है जो बाढ़ और कटाव से ग्रस्त है. बेदखल किए गए इलाके के निवासियों का दावा है कि पुनर्वास क्षेत्र में पीने के पानी, सड़क, स्वास्थ्य सेवा और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है.

‘पुलिस ने गोलीबारी की’

एक अनुमान के अनुसार, बेदखली अभियान के दौरान इलाके में 3,000 से ज़्यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं और घरों को गिराने के लिए 100 से ज़्यादा बुलडोज़रों का इस्तेमाल किया जा रहा है. निवासियों का कहना है कि प्रशासन परिवारों पर जल्दी से घर खाली करने का दबाव बनाने के लिए धमकियां और डर दिखा रहा है.

जब लोगों ने बेदखली अभियान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, तो पुलिस ने उन पर कार्रवाई की. चारुआबाखरा गांव में पुलिस के साथ हुई झड़प में कम से कम तीन महिलाएं घायल हो गईं. स्थानीय लोगों ने उनकी पहचान चरुआबाखरा गांव की 40 वर्षीय मसिया खातून, 45 वर्षीय रूमिया खातून और 30 वर्षीय हफ़ीज़ा खातून के रूप में की है.

5 जुलाई को असम के धुबरी में प्रस्तावित थर्मल पावर प्लांट स्थल पर पुलिस गश्त करती हुई. (फोटो: काज़ी शरोवर हुसैन)

चारुआबाखरा निवासी 34 वर्षीय सोफ़िउर रहमान बताते हैं कि 357 भूमिहीन परिवार, जिनमें से 129 मियादी पट्टा धारक और 83 आवंटित भूमिधारक हैं, ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने आगे बताया कि कई भूमिहीन परिवार प्रशासन के दबाव और धमकियों के चलते इलाका छोड़ चुके हैं, जबकि उनके मामले अभी भी लंबित हैं.

गुवाहाटी के एक मानवाधिकार वकील ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मामले की सुनवाई 22 जुलाई को होनी है.

‘भाजपा सरकार लोगों पर अत्याचार कर रही है’

कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं ने बेदखली की निंदा करते हुए इसे भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार की क्रूर और लक्षित कार्रवाई बताया है.

मंगलवार (8 जुलाई) सुबह, रायजोर दल के नेता और विधायक अखिल गोगोई बेदखली स्थल पर पहुंचे. उन्हें चारुआबाखरा में बेदखल किए गए लोगों से बातचीत करते देखा गया. हालांकि, पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया और चापर पुलिस थाने ले गई. कुछ घंटों बाद उन्हें पुलिस वाहन से गोआलपाड़ा जिले में छोड़ दिया गया.

बाद में मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने आरोप लगाया, ‘सिर्फ़ मुसलमान होने के कारण सांप्रदायिक भाजपा सरकार लोगों पर अत्याचार कर रही है. यह उनकी एक राजनीतिक रणनीति है.’

वहीं, माकपा नेता सुप्रकाश तालुकदार ने सरकार पर कॉरपोरेट-समर्थक एजेंडे को बढ़ावा देने और ख़ास तौर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का आरोप लगाया.

तालुकदार ने कहा, ‘यह बेदखली अभियान ज़मीन और सार्वजनिक संसाधनों को कॉरपोरेट हितों के लिए हस्तांतरित करने की एक बड़ी योजना का हिस्सा है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘भाजपा इसे ‘असम को मिया लोगों से बचाने’ के लिए एक देशभक्तिपूर्ण कार्य बता रही है, जबकि राजनीतिक लाभ के लिए सामाजिक विभाजन को गहरा करने के लिए सांप्रदायिक बयानबाज़ी का इस्तेमाल कर रही है.’

काज़ी शरोवर हुसैन उर्फ़ काज़ी नील असम के बारपेटा के एक फिल्मकार, पत्रकार और कवि हैं. वे वर्तमान में इटामुगुर कम्युनिटी मीडिया के प्रमुख हैं – जो एक ऐसा मीडिया प्लेटफ़ॉर्म है जो हाशिए पर पड़े समुदायों की आवाज़ को आगे लाता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)