साझी आत्मा, साझा भविष्य: भारत और नेपाल की कथा

भारत और नेपाल ने साथ तप किया, साथ सीखा और साथ आगे बढ़े. आज जब सीमाएं दीवारों में बदल रही हैं और राष्ट्रवाद रिश्तों की स्मृति को धुंधला कर रहा है, तब यह साझा संघर्ष हमें याद दिलाता है कि भारत और नेपाल दो राष्ट्र नहीं हैं. वे एक ही अधूरी कथा के दो पात्र हैं.

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लुंबिनी, नेपाल – बुद्ध का जन्मस्थान (फोटो साभार: Freepik)

हमारा लोकतंत्र के लिए संघर्ष उस सहयोग और एकजुटता की भावना से अलग नहीं है, जो हमने भारत के साथ साझा की है. 

ये शब्द नेपाल के लोकतांत्रिक आंदोलन के अग्रदूत कृष्ण प्रसाद कोइराला ने कहे थे. यह कथन भारत–नेपाल संबंधों की आत्मा को समेटे हुए है. यह संबंध केवल कूटनीतिक बैठकों या आर्थिक समझौतों का परिणाम नहीं है; यह साझा राजनीतिक आकांक्षाओं, सांस्कृतिक और भौगोलिक निकटता से उपजा है.

जब कृष्ण प्रसाद कोइराला ने भारत और नेपाल को लोकतंत्र के साझेदार कहा, तो वह उस ऐतिहासिक साझेदारी की बात कर रहे थे, जो दोनों देशों ने उपनिवेशवाद और निरंकुशता के खिलाफ साझा संघर्षों में अर्जित की. आज भी जनकपुर से दिल्ली, या लुंबिनी से वाराणसी की यात्राएं केवल दूरी तय नहीं करतीं, वे सभ्यता, आस्था और आत्मीयता का अनुभव कराती हैं.

भारत और नेपाल का सबंध केवल समझौतों और सम्मेलनों का यक़ीनन नहीं है. यह संबंध यात्राओं, धार्मिक स्थलों, मेलों, त्योहारों, और सीमावर्ती जीवन की रोज़मर्रा की गतिविधियों में बसा है. यह सबंध उन आवाज़ों में है जो मंदिरों में ध्वनित हैं, उन रास्तों में है जिन पर साधु, छात्र, व्यापारी और मजदूर चलते हैं. यह संबंध साझा इतिहास, संस्कृति और संघर्षों से बना है.

फणीश्वरनाथ रेणु ने ‘नेपाली क्रांति की कथा’ में लिखा, ‘नेपाल और भारत के बीच की सीमा रेखा भले ही नक्शों में खिंची हो, लेकिन दोनों देशों की आत्माएं एक ही धरती पर सांस लेती हैं.’

यह पंक्ति आज भी उतनी ही सटीक लगती है जितनी वह उस समय थी. सीमा पार करने वाले तीर्थयात्री, कामगार, छात्र और व्यापारी इस रिश्ते की असली पहचान हैं. कभी खुली सीमा अब निगरानी और संदेह की भाषा में देखी जा रही है. जबकि इतिहास बार-बार याद दिलाता है कि यह संबंध नियंत्रण नहीं, सहयोग से पनपा है.

आज जब दोनों देश एक जटिल और बहुध्रुवीय क्षेत्रीय परिदृश्य में प्रवेश कर रहे हैं, ज़रूरी है कि इस संबंध को केवल भावना नहीं, रणनीति की दृष्टि से भी समझा जाए. अब सवाल यह है, क्या वे ढांचे जो दशकों से इस रिश्ते को परिभाषित करते आए हैं, भविष्य की ज़रूरतों को पूरा कर पाएंगे?

और क्या यह संबंध, जलवायु संकट, डिजिटल बदलाव और बदलते वैश्विक समीकरणों के दौर में, रिश्ते को पुनः कल्पित किया जा सकता है, जो इसे कभी अनोखा बनाती थी?

सीमा पर नहीं, संबंधों में जीता भारत – नेपाल

इसी वर्ष 2025, जनवरी की एक सर्द सुबह मैं बिहार के मधुबनी से नेपाल के जनकपुर में प्रवेश कर रहा था. जलेश्वर से जनकपुर तक का रास्ता सरसों के खेतों, गन्ने से लदे ट्रैक्टरों और मैथिली-भोजपुरी गीतों से भरा था. किसी सीमा चौकी ने हमें नहीं रोका, किसी अधिकारी ने दस्तावेज़ नहीं मांगे. यहां सीमाएं प्रशासनिक नहीं, सांस्कृतिक थीं, बोली, भूगोल और जीवनशैली हर ओर एक जैसी बह रही थी.

स्थानीय लोगों के लिए यह सीमा पार करना कोई अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि रोजमर्रा का हिस्सा है. शादियां जनकपुर में होती हैं तो अंतिम संस्कार सिमरिया में; व्यापार बिराटनगर में होता है तो शिक्षा दरभंगा और गोरखपुर में. 1950 की भारत-नेपाल मैत्री संधि ने इस खुलेपन को औपचारिक मान्यता दी, पर इसका आधार उससे कहीं पुराना है, एक ऐसी सांस्कृतिक निरंतरता जो आधुनिक राष्ट्र-राज्य की कल्पना से कहीं पहले की है.

फिर भी आज दोनों देशों में इस खुलेपन पर सवाल उठाए जा रहे हैं. काठमांडू में इसे भारत के प्रभाव का प्रतीक माना जाता है, तो दिल्ली में इसे सुरक्षा के नजरिए से देखा जाने लगा है. लेकिन यदि इस भरोसे को रोका गया, तो हम उस पारंपरिक विश्वास को नुकसान पहुंचाएंगे जो इस रिश्ते की सबसे बड़ी पूंजी है.

(फोटो साभारः ट्विटर)

ऐतिहासिक निकटता और साझा स्मृति

सीमाओं के बनने से पहले कहानियां और परंपराएं दोनों देशों को जोड़ती थीं. जनकपुर की सीता और अयोध्या के राम का विवाह एक सांस्कृतिक सत्य था. यह राजनीतिक नहीं, आध्यात्मिक संबंध था. महाभारत में किरातों का ज़िक्र यह दिखाता है कि नेपाल की पहाड़ियों के लोग भी इस क्षेत्र की मुख्य कहानी का हिस्सा रहे हैं.

बुद्ध लुंबिनी में जन्मे, बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया और सारनाथ में उपदेश दिया. उनकी यात्रा भारत और नेपाल दोनों को जोड़ती है. आज जब दोनों देशों में नई सीमाएं बन रही हैं, बुद्ध का यह मार्ग याद दिलाता है कि विचार सीमाओं में नहीं बंधते.

नेपाल की काठमांडू घाटी में भारतीय प्रभाव और स्थानीय परंपराओं के मेल से सुंदर वास्तुकला, धार्मिक विचार और शिल्पकला विकसित हुई. मैथिली, भोजपुरी, अवधी जैसी भाषाएं दोनों देशों में समान रूप से बोली जाती हैं. दशहरा, तिहार, दीपावली जैसे त्योहार दोनों जगह एक ही उत्साह से मनाए जाते हैं.

नेपाली साहित्यकार जैसे देवकोटा, परिजात और भूपी शेरचन भारत में भी पढ़े जाते हैं. वहीं प्रेमचंद, महादेवी वर्मा जैसे भारतीय लेखक नेपाल में लोकप्रिय हैं. यह सांस्कृतिक संबंध अब भी जीवंत है.

राजनीतिक एकता और साझा संघर्ष

बीसवीं सदी—जो असंभव उम्मीदों और गहरे विश्वासघातों की सदी थी—में भारत और नेपाल ने एक-दूसरे के साथ चलने के नए रास्ते तलाशे.

जब भारत में उपनिवेशवाद ढह रहा था और नेपाल में राणा शासन की पकड़ धीमी पड़ने लगी थी, तब उन रास्तों पर, जहां पहले साधु- संत और व्यापारी चलते थे, अब क्रांतिकारी आने-जाने लगे. बनारस, जो सदियों तक अध्यात्म और विचार का केंद्र रहा, अब एक राजनीतिक प्रयोगशाला भी बन गया. वहीं से ‘गोरखाली’ और ‘जन्मभूमि’ जैसे नेपाली भाषा के समाचारपत्रों ने जन्म लिया, जिन्होंने वर्षों से दबाई गई नेपाल की आवाज़ को पहली बार सार्वजनिक मंच दिया.

1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, उसी वर्ष बनारस में नेपाली कांग्रेस की भी नींव रखी गई. यह शहर अब आत्मा की शरणस्थली भर नहीं था, बल्कि प्रतिरोध की कल्पना का घर भी बन चुका था.

इन आंदोलनों में समानता भले न रही हो, पर एक आत्मीयता ज़रूर थी. पुष्पलाल श्रेष्ठ ने नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की शुरुआत कलकत्ता में की. इससे साफ हुआ कि दोनों देशों के क्रांतिकारी एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और अपने विचार साझा कर रहे थे.

नेहरू ने नेपाल में लोकतंत्र का समर्थन किया. उन्हें लगता था कि भारत की आज़ादी तब तक अधूरी है जब तक उसके पड़ोसी देश भी स्वतंत्र न हों. गांधी की अहिंसा की सोच नेपाल तक पहुंची और वहां भी लोगों ने बिना हिंसा के बदलाव की राह चुनी.

बिश्वेश्वर प्रसाद कोइराला, मातृका प्रसाद कोइराला, गिरिजा प्रसाद कोइराला और मनमोहन अधिकारी जैसे नेताओं ने भारत में पढ़ाई की, जेल गए और आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय उनके लिए सीखने और सोचने की जगह बना.भारत छोड़ो आंदोलन का असर नेपाल के युवाओं पर भी पड़ा. यह एक साझी चेतना थी, जिसमें लोग विचार, संघर्ष और सपने बांट रहे थे.

बेशक, आगे के दशकों में कई उतार-चढ़ाव आए. लेकिन एक बात साफ़ रही—भारत और नेपाल ने साथ तप किया, साथ सीखा और साथ आगे बढ़े.

आज जब सीमाएं दीवारों में बदल रही हैं और राष्ट्रवाद रिश्तों की स्मृति को धुंधला कर रहा है, तब यह साझा संघर्ष हमें याद दिलाता है कि भारत और नेपाल केवल दो राष्ट्र नहीं हैं. वे एक ही अधूरी कथा के दो पात्र हैं. एक ऐसी कथा जिसमें स्वतंत्रता हर पीढ़ी के लिए फिर से परिभाषित होनी है, और एकजुटता को सिर्फ इतिहास नहीं, भविष्य की राजनीति में भी अर्जित करना होगा.

 समकालीन चुनौतियां और सामंजस्य की ज़रूरत

1950 की भारत-नेपाल संधि उस समय एक ऐतिहासिक साझेदारी की नींव थी, जब दोनों देश उपनिवेशवाद और निरंकुशता से निकल रहे थे. पर आज नेपाल में इसे एक असमान समझौते के रूप में देखा जाता है, जिसे भारत की रणनीतिक पकड़ का प्रतीक माना जाता है. भारत, इसके उलट, इस संधि को भाईचारे और परस्पर सहयोग का आधार मानता रहा है. यह विरोधाभास दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर को दर्शाता है और संबंधों की संवेदनशीलता को रेखांकित करता है.

खुली सीमा, गोरखा सैनिकों की भागीदारी और सांस्कृतिक जुड़ाव भारत-नेपाल संबंधों को राजनीतिक से आगे सामाजिक और भावनात्मक आधार देते हैं. वहीं, आर्थिक असंतुलन, जल संसाधनों पर मतभेद और बढ़ती व्यापारिक निर्भरता संबंधों में तनाव पैदा करते हैं.

चीन और नेपाल के बीच हुई एक द्विपक्षीय वार्ता. (फाइल फोटो साभार: parliament.gov.np)

चीन का प्रवेश, संबंधों में कसमसाहट 

इस पूरे परिदृश्य में चीन की सक्रियता ने नए आयाम जोड़ दिए हैं. बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत नेपाल में बुनियादी ढांचे की भारी निवेश योजनाएं, चीनी राजनयिक संपर्कों का विस्तार, और सांस्कृतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिशें अब केवल विकास का मसला नहीं हैं. वे एक वैकल्पिक भू-राजनीतिक ढांचा प्रस्तुत कर रही हैं.

ऐसे में भारत को यह समझना होगा कि नेपाल की संप्रभुता की आकांक्षा उसकी लोकतांत्रिक चेतना का हिस्सा है. वहीं नेपाल को भी भारत की सुरक्षा और रणनीतिक चिंताओं को अनदेखा नहीं करना चाहिए, खासकर जब सीमा पर संवेदनशीलता और बाहरी ताकतों की मौजूदगी तेज़ हो रही हो.

समाधान पुराने ढांचों को नकारने में नहीं, बल्कि उन्हें समयानुकूल रूप देने में है. भारत और नेपाल की सरकारों को एक दूसरे को भागीदार की तरह देखना होगा. ऐसा भागीदार जो भरोसे, पारदर्शिता और भविष्य की साझा कल्पना से बंधा हो. आज ज़रूरत है कि दोनों देश अपने संबंधों को एक समग्र दृष्टिकोण से देखें. जहां रणनीति और भावना, परंपरा और नवाचार, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता.सभी पहलुओं को एकसाथ साधा जाए.

भविष्य की राह

भविष्य की कड़ी नई पीढ़ी है. भारत और नेपाल के युवाओं को साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में जोड़ना समय की मांग है. शोध परियोजनाएं, कला कार्यक्रम और छात्र विनिमय जैसे ठोस अनुभव ही संबंधों को ज़मीन पर मजबूती देते हैं. भारत की विकास यात्रा में नेपाल को केवल पड़ोसी भर नहीं, सक्रिय और समान भागीदार बनकर आगे आना चाहिए—ऐसा भागीदार जो अपनी आकांक्षाओं और क्षमताओं के साथ इस साझा भविष्य को आकार दे.

मैं जब जनकपुर से लौट रहा था, तब रास्ते में यह सोच रहा था कि यह देश कितना शांत, कितना ऐतिहासिक और कितना युवा है. मधुबनी में पले-बढ़े मेरे लिए नेपाल कभी ‘विदेश’ नहीं था. भाषा वही थी, मैथिली. कथाएं वही थीं, और पर्व भी एक ही पंचांग से चलते थे. आज भी जब जनकपुर जाता हूं, मुझे मंदिरों या परंपराओं में ही नहीं, बल्कि उस सहजता में निरंतरता दिखती है, जो सीमाओं को अवरोध नहीं मानती.

जवाहरलाल नेहरू ने कभी कहा था, ‘हमारे दो देशों के बीच की मित्रता इतिहास से भी पुरानी है.‘ वास्तव में यह केवल भावना नहीं, सांस्कृतिक यथार्थ था, जिसे हर बार तनाव और असहमति के बाद संवाद की वापसी ने साबित किया है.

हिमालय चाहे जितनी भी लंबी छाया डाले, वह उस रिश्ते को नहीं ढक सकता जो हमेशा एक नदी की तरह बहता रहा है, कभी तेज़, कभी धीमा, पर अंततः अपने मूल की ओर लौटता हुआ.

जैसा दलाई लामा ने कहा है, ‘भारत बुद्ध के ज्ञान का स्थल है, नेपाल उसका जन्म स्थान. साथ मिलकर वे एशिया की आध्यात्मिक भूगोल रचते हैं.‘ यह संबंध कभी केवल रणनीतिक नहीं रहा, यह अस्तित्व का रिश्ता है.

2025 और उसके आगे की असली परीक्षा यह नहीं होगी कि भारत और नेपाल कोई नई संधि करते हैं या नहीं, बल्कि यह होगी कि क्या दोनों देश यह याद रख पाते हैं कि यह संबंध मूल रूप से क्यों महत्वपूर्ण था. यह संबंध बड़े-छोटे भाई की भावना पर नहीं, बल्कि साझा सभ्यता के समान उत्तराधिकार और संयुक्त भविष्य की साझी जिम्मेदारी पर आधारित होना चाहिए, जो हमारे इतिहास की गरिमा के अनुरूप हो.

(आशुतोष कुमार ठाकुर पेशे से मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं और साहित्य तथा संस्कृति पर लेखन करते हैं.)