नई दिल्ली: लंबे इंतज़ार के बाद मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप की लंबित राशि जारी कर दी गयी है. गुरुवार (17 जुलाई) को केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने इसकी घोषणा की. दिलचस्प यह है कि इस मंत्रालय के मंत्री किरेन रिजिजू बकाया राशि जारी करने की घोषणा को किसी उपलब्धि की तरह पेश कर रहे हैं.
यह घोषणा करते हुए रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा है:
एक छोटा कदम, जो बहुतों के लिए बहुत मायने रखता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हम ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ के लिए प्रतिबद्ध हैं. ‘भागीदारी से भाग्योदय’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि हमारा मिशन है.
मंत्री के इस बयान पर मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप स्कॉलर्स एसोसिएशन ने तीखी टिप्पणी की है. मंत्री को संबोधित एक सोशल मीडिया पोस्ट में एसोसिएशन ने कहा है:
फेलोशिप जारी करना एक ज़िम्मेदारी है — कोई एहसान नहीं. सात महीने से भी अधिक समय तक चुप्पी छाए रहने के दौरान शोधार्थियों ने भूख, कर्ज़ और हताशा झेली. इसे ‘सशक्तिकरण’ नहीं कहा जा सकता — यह विलंबित न्याय है, जो निरंतर और सामूहिक संघर्ष के ज़रिए हासिल हुआ. इसके अलावा, यूजीसी मानकों के अनुरूप मकान किराया भत्ता (एचआरए) में अब तक संशोधन नहीं हुआ है, जिससे देशभर के स्कॉलर्स को और अधिक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. हम उम्मीद करते हैं कि आगे से फेलोशिप हर महीने समय पर और बिना देरी के वितरित की जाएगी.
द वायर हिंदी की पिछली रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि इस फेलोशिप के तहत पीएचडी कर रहे ज्यादातर शोधार्थियों का दिसंबर 2024 से वजीफा नहीं आया है. कुछ शोधार्थियों को उसके पहले का भी वजीफा नहीं मिला.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई है कि लंबित भुगतान जारी करने की घोषणा का शोधार्थी स्वागत तो कर रहे हैं लेकिन उनकी मांग है कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि आगे से कोई देरी न हो और हर महीने फेलोशिप समय से मिले.
साथ ही यह मांग लगातार उठाई जा रही है कि यूजीसी-जेआरएफ/एसआरएफ स्कॉलर्स की तरह ही मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप के स्कॉलर्स को भी संशोधित मकान किराया भत्ता (एचआरए) मिले.
गौरतलब है कि दिसंबर 2022 में केंद्र सरकार ने इस फेलोशिप को बंद कर दिया था, लेकिन जिन शोधार्थियों को यह पहले से मिल रही थी, उन्हें फेलोशिप की अवधि पूरी होने तक सहायता देने की बात कही गई थी.
यह फेलोशिप अल्पसंख्यक समुदायों (मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी) के शोधार्थियों को दी जाती है.
क्यों हो रही थी देरी?
पिछले हफ्ते इंडियन एक्सप्रेस ने जब रिजिजू से वजीफे में देरी का सवाल पूछा था तो उन्होंने कहा था:
मुझे भी ऐसी शिकायतें मिली हैं. हम इसकी समीक्षा कर रहे हैं. आपको पूरी बात को समझना होगा. एक तरफ अल्पसंख्यकों के लिए छात्रवृत्ति है, और दूसरी तरफ अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए छात्रवृत्तियां हैं. करीब तीन-चार साल पहले फंड का बड़े स्तर पर दुरुपयोग हुआ था. अल्पसंख्यक संस्थानों में हज़ारों फर्ज़ी नाम भेजे गए थे और छात्रवृत्ति के नाम पर पैसे ले लिए गए. इसके बाद कई राज्यों में केस दर्ज हुए. अब ये मामले अंतिम चरण में हैं….
तब द वायर हिंदी को भेजे एक बयान में शोधार्थियों ने साफ कहा था कि मंत्री ने जो आरोप लगाए हैं वे न केवल भ्रामक हैं बल्कि ज़मीनी सच्चाई से मेल नहीं खाते. स्कॉलर्स ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार जानबूझकर देरी कर रही है और मौजूदा फेलोशिपधारकों को भी फंसा रही है, जबकि उनके हक की रकम बजट में आवंटित की जा चुकी है.
संघर्ष से हासिल हुआ वजीफा
वजीफा जारी करने की घोषणा करते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने भले ही नारों से नत्थी सोशल मीडिया पोस्ट में अपनी सरकार की वाहवाही की हों. लेकिन हकीकत यह है कि वजीफा न मिलने से हताश शोधार्थियों ने पिछले कुछ महीनों में जीतनी बार उनके मंत्रालय से गुहार लगाई, कभी भी स्पष्ट जवाब नहीं मिला.
फेलोशिप रिलीज़ करने की मांग को लेकर शोधार्थियों का एक समूह 15 मई को अल्पसंख्यक मंत्रालय भी गया था. जामिया के एक शोधार्थी ने बताया कि अधिकारियों ने उनसे मिलने से भी इनकार कर दिया.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक शोधार्थी ने आरटीआई के जरिये जानना चाहा कि छात्रवृत्ति कब जारी होगी, लेकिन मंत्रालय ने अस्पष्ट उत्तर दिया.

परेशान शोधार्थियों ने कई विपक्षी सांसदों से आग्रह किया था कि वह उनकी बात सरकार तक पहुंचा दें. कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद (बिहार) ने हाल ही में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर फंड के वितरण में देरी की ओर उनका ध्यान आकर्षित भी किया था.
संभल सांसद जिया उर रहमान, चेन्नई दक्षिण सांसद टी. सुमति और किशनगंज सांसद मोहम्मद जावेद ने किरेन रिजिजू को भी पत्र लिख तत्काल संज्ञान लेने को कहा था. इसके अलावा शोधार्थी लगभग हर सप्ताह सोशल मीडिया पर सैंकड़ों पोस्ट कर अपनी तकलीफ सरकार तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे.
द वायर हिंदी ने भी वजीफे में देरी को लेकर मंत्रालय को सवाल भेजा था. हमने कुल सात सवाल भेजे थे, जिनमें ये दो सवाल भी थे:
मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप के वितरण में इतनी लंबी देरी क्यों हुई है?
इस देरी के लिए ज़िम्मेदार कौन है?
लेकिन मंत्रालय ने किसी सवाल का स्पष्ट उत्तर नहीं दिया था.
परेशानियों से जूझ रहे थे शोधार्थी
द वायर हिंदी ने देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों से बात की थी. कोलकाता के प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग के शोधार्थी कालू तमांग ने बताई था, ‘मैं क़रीब छह महीने से जूझ रहा हूं. आर्थिक बोझ के कारण रिसर्च करना मुश्किल हो रहा है.’ इस फेलोशिप के लिए तमांग का चयन साल 2021 में हुआ था. तमांग बौद्ध हैं. उनकी किरेन रिजिजू से मांग है कि फेलोशिप जल्द से जल्द रिलीज़ किया जाए.
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) पीएचडी कर रहे एक शोधार्थी ने कहा था, ‘पीएचडी का चौथा साल चल रहा है और फेलोशिप आना बंद हो गयी है. आर्थिक कठिनाई ने मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला है. रेंट का पैसा नहीं दे पा रहे हैं. दोस्तों से उधार लिया और लगातार टाल रहे कि आज देंगे-कल देंगे.’
कलकत्ता विश्वविद्यालय के फिजोओलॉजी विभाग से पीएचडी कर रहीं रजिया ख़ातून ने कहा था कि लगातार गुहार लगाने के बावजूद अधिकारियों की तरफ़ से कोई जवाब नहीं मिल रहा है. ‘कई शोधार्थी लगातार आर्थिक मुसीबत से जूझ रहे हैं. लगातार तनाव के कारण मेरी तबीयत ख़राब हो चुकी है.’
किसे मिलती है यह फेलोशिप?
मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप भारतीय विश्वविद्यालयों से पीएचडी करने वाले अल्पसंख्यक समुदायों के शोधार्थियों को मिलती है. इसके लिए नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट) पास करना अनिवार्य है. यह फेलोशिप उन शोधार्थियों को मिलती है, जिनके परिवार की वार्षिक आय छह लाख रुपये से कम हो.
मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप अल्पसंख्यक मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आती है. अक्टूबर 2022 से इसकी नोडल एजेंसी नेशनल माइनॉरिटीज़ डेवलपमेंट एंड फाइनेंस कॉरपोरेशन (एनएमडीएफसी) है. यही लंबित भुगतान और प्रशासनिक मामले देखती है. पहले यह जिम्मेदारी यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन) के पास थी. शोधार्थियों का मानना है कि यूजीसी के अधीन यह फेलोशिप अधिक सुचारू रूप से चल रही थी.
