2012 का साल था और जनवरी का महीना था. हवा में पर्याप्त ठंड थी लेकिन दिल्ली के कमानी सभागार के बाहर गर्मी बढ़ने लगी थी. शाम साढ़े छह का वक्त रहा होगा. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तेरहवें भारत रंग महोत्सव (भारंगम) का उद्घाटन होने वाला था. कमानी के भीतर लोग जा चुके थे लेकिन उद्घाटन समारोह का कार्ड लिए (और कुछ बिना कार्ड भी) लोग अभी भी दरवाजे पर टिके थे. उनकी संख्या ठीक-ठाक थी और मुख्य दरवाजा बंद कर दिया गया था.
सभागार भर चुका था. जो नहीं जा पाए थे वो हंगामा करने लगे, गेट पर दबाव बनने लगा था. सुरक्षाकर्मियों और नाट्य विद्यालय के कर्मचारियों की मुश्किल बढ़ रही थी. लोग किसी भी कीमत पर दरवाजा छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे और अंदर जाना चाहते थे. यह रवींद्रनाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं जयंती का साल भी था. उनके साहित्य पर आधारित प्रस्तुतियों का एक सेक्शन भारंगम में लगा हुआ था.
भारंगम की उद्घाटन प्रस्तुति देखने के लिए उतनी भीड़ मैंने फिर कभी नहीं देखी, न सुनी. मेरे पास कार्ड था और एकदम प्रस्तुति के समय पर पहुंचने की आदत से लाचार मैं बाहर ही रह गया था. दर्शकों के हंगामे में मैं भी शामिल हुआ, शोर भीतर के कार्यक्रम को प्रभावित करने लगा होगा. कुछ देर बाद अंदर से खबर आई कि प्रस्तुति का दूसरा शो होगा. भीड़ शांत हो गई थी, समय की घोषणा हो गई. कुछ लोग इधर-उधर चले गए, कुछ लोग वहीं डटे रहे. प्रस्तुति थी रतन थियाम निर्देशित ‘राजा’ की मणिपुरी भाषा में.
पहली प्रस्तुति खत्म होने के कुछ देर बाद दूसरी प्रस्तुति शुरू हुई, दर्शक मंत्रमुग्ध थे. किसी प्रस्तुति और किसी निर्देशक के लिए दीवानगी देखने का यह पहला अनुभव था…
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लेकिन मैं पहली बार रतन थियाम निर्देशित कोई प्रस्तुति नहीं देख रहा था. उनकी पहली प्रस्तुति देखी थी ‘व्हेन वी डेड अवेकन’. हेनरिक इब्सन के नाटकों की प्रस्तुतियों पर आयोजित इस महोत्सव को 2008 नार्वे दूतावास ने आयोजित किया था.

भारतीय निर्देशकों को इसमें आमंत्रित किया गया था. आमाल अल्लाना और निसार अल्लाना का समूह इसमें सहयोगी था. कमानी में नीचे आखिरी पंक्ति में बैठकर मैंने रतन थियाम की वह प्रस्तुति देखी थी, भाषा कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रही थी लेकिन दृश्य-रचना समझ आ रही थी.
प्रस्तुति में मंच पर एक बार नाव आती है जो उसी तरह से मंच पर तैरती है जैसे पानी में, यह अदभुत था. बाद में रंगकर्मियों की चर्चा में सुना कि ऐसे चमत्कार उनकी प्रस्तुतियों में आते थे जिसकी वजह से उनपर आरोप लगता कि उनकी रंगभाषा में गिमिक बहुत है और संसाधन का बेजा इस्तेमाल होता है. मेरे भीतर भी थोड़ा पूर्वाग्रह आया था…
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2012 के नवंबर में हैबिटेट सेंटर के समन्वय महोत्सव में मैंने उन्हें करीब से देखा था. कार्यक्रम के बाद मैं उनके करीब गया. वह सहज थे और बातचीत करने को उत्सुक. मेरी तैयारी नहीं थी उनसे बात करने की. वह भाषा पर अपने विचार रखने आए थे और मंच से अपनी बात रखते हुए आखिर में उन्होंने अपील की थी…
‘मैं आप लोगों से एक अपील करना चाहूंगा कि भारत बहुभाषाओं का देश है. मैं चाहूंगा कि आप सब चीजों को एक-दूसरे की भाषा में भी मुहैया कराएं क्योंकि सबसे बड़ा सवाल है कि हम एक दूसरे को कितना और कैसे जान पाते हैं. इसलिए जरूरत है कि अनुवाद हों, प्राचीन ग्रंथों से ले कर आधुनिक साहित्य, सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हों. चुप हो जाने से पहले मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं. क्या हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था युवा पीढ़ी को इस तरह से शिक्षित कर पाती है कि वो अपने मातृभाषा में साहित्य, संस्कृति और कला का आनंद ले सकें और अपनी पहचान से अवगत हो सकें? ऐसा कहा जा रहा है कि आज से तीस साल के अंदर मनुष्य अति दक्ष कंप्यूटर विकसित कर लेगा, जो मनुष्य की सम्मिलित क्षमताओं से भी अधिक होगा. इसके विकसित हो जाने के बाद मनुष्य को किसी और अविष्कार की आवश्यक्ता नहीं होगी. अकल्पनीय और समझ के परे भी वह हो सकता है. तब हम क्या करें, हम उस स्थिति पर बात कर सकते हैं जहां मानवीय बौद्धिकता और कृत्रिम बौद्धिकता को एकमएक करके सोचने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं ? और एक चमकीले भविष्य की आशा करें.’
क्या यह कहना होगा कि वह भविष्य को देख पा रहे थे…

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मेरा पूर्वाग्रह पूरी तरह टूटा 2016 में जब मैंने शेक्सपियर के नाटक ‘मैकबेथ’ की प्रस्तुति देखी. मैकबेथ के रूपांतरण में आदिवासी पृष्ठभूमि के साथ आधुनिक अस्पताल का दृश्य भी रचकर इसे आधुनिक स्थितियों से रतन थियाम ने जोड़ दिया था. महत्त्वाकांक्षा और लालच में घिरा मैकबेथ पागलपन की अवस्था में है. थियम ने इस चरित्र को व्यक्ति से अधिक एक प्रवृति के रूप में व्याख्यायित किया जिससे आज समस्त विश्व आक्रांत दिख रहा है.
ब.व. कारंत ने ‘मैकबेथ’ के बरनम वन को केंद्र में रखकर उसे महत्त्वाकांक्षाओं का बढ़ता जंगल कहा था, थियाम ने इस जंगल के फैलाव को उभारा. महत्त्वाकांक्षा, लालच और सत्ता को किसी कीमत पर पाना और उसके खो जाने के भय से उपजी असुरक्षा विश्व को एक होड़ में और निरंतर अंधकार की तरफ़ ठेल रही है. इसलिये प्रस्तुति का अधिकांश हिस्सा अंधेरा में घटित हुआ. लेकिन अंधेरा ही विकल्प नहीं है, विकल्प है इन प्रवृतियों की सफ़ाई कर उसे दफना देना जो अंत में नर्सें करती है. मैकबेथ की कब्र के साथ उसकी प्रवृति की भी साफ़ कर देती हैं.
(क्या थियाम वर्तमान अंतरराष्ट्रीय हलचलों की प्रतिध्वनि तब सुन पा रहे थे?)
कमानी के खाली मंच पर उन्होंने दृश्यों को इस तरह नियोजित किया था कि स्पेस किसी असीम का बोध देने लगा. ब्लाकिंग, किरदारों को आमने सामने खड़ा करना, उनका प्रवेश प्रस्थान, उनकी गति और वेशभूषा, पृष्ठ ध्वनि प्रस्तुति को गहराई दे रहे थे.
चार साल बाद एक फिर भारंगम के उद्घाटन सत्र में थियाम थे. शुरुआत में दर्शकों की भीड़ थी, दर्शक कमानी के भीतर आईल में बैठे थे… लेकिन इन दर्शकों का मन ‘मैकबेथ’ की इस प्रस्तुति में नहीं रमा… प्रस्तुति के दरम्यान सभागार खाली होता रहा. क्या चार साल में दिल्ली बदल गई थी?
लेकिन एक कट्टर दर्शक की तरह दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अंत तक जमी रही थीं और थियाम से व्यक्तिगत रूप से मिलकर बधाई देने के बाद ही लौटी. मैंने सभागार के बाहर उनसे बात की थी उन्होंने कहा था कि भाषा कोई बाधा नहीं है और ‘मैकबेथ’ की यह अद्भुत व्याख्या थी.

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रतन थियाम की आखिरी प्रस्तुति मैंने देखी ‘लाइरेम्गीबी एशाई’(अप्सराओं के गीत). यह 2020 के भारंगम की समापन प्रस्तुति थी. इन दिनों थियाम लगातार प्रकृति की बात करने लगे थे, और अपनी समस्त चिंता इस प्रस्तुति में उतार दी थी.
इस प्रस्तुति के एक दृश्य में अभिनेत्रियां काले बक्से में से निकलती हैं चश्मा पहने हुए, ये अप्सराएं हैं अतीत से भविष्य की यात्रा पर हैं. सदी की यात्रा में मनुष्य ने तकनीक के साहचर्य में समय की अनिवार्यता का हवाला देकर जिस विकास का रास्ता चुना है उसमें वह वैश्विक तो हुआ है लेकिन अपने बक्से में बंद भी. उसका दुनियावी संपर्क जीवंत कम आभासी अधिक है. और इस क्रम में प्रकृति से असंबद्धता के कारण संस्कृति के जैविक तत्वों से दूर होता गया है.
चूंकि यह काला बक्सा एक संकीर्ण दुनिया का प्रतीक है, बाद में एक अलग दृश्य बिंब में सीढ़ियों में बदल जाता है जो अप्सराओं को बाइसवीं सदी में ले जाता है. वो दुनिया कैसी होगी?
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उनके द्वारा निर्देशित आखिरी प्रस्तुति थी धर्मवीर भारती लिखित ‘कनुप्रिया’. जिसे अब तक नहीं देख सका. इसके अलावा हिंदी के दो नाटकों की उन्होंने प्रस्तुति की: धर्मवीर भारती का ‘अंधा युग’ और अज्ञेय का ‘उत्तर- प्रियदर्शी’, जिसे हिंदी में भी बहुत नहीं खेला गया. दोनों ही प्रस्तुतियों के दर्शक अभी तक याद रखते हैं प्रस्तुति के बिंबों को.
सन्नाटा और अंधेरा उनकी रंग रचना के अहम तत्व रहे और अभिनेताओं के एक दल के साथ निरंतर प्रयोग करना. यह अभिनेता कोरस रेपर्टरी में एक साथ रहते भी थे.

आलोचक कहते हैं कि उनके नाटकों के लिए बहुत संसाधन चाहिए लेकिन वह कहते थे कि संसाधनों की कमी की वज़ह से वे आज तक वैसी प्रस्तुति नहीं कर पाये जैसी वे सोचते हैं. हमेशा वे विकल्पों की तलाश में रहते हैं जिससे न्यूनतम संसाधनों में प्रस्तुति हो सके.
अपने उत्तर जीवन में रतन थियाम जैसे रंगकर्मियों की मुश्किलें बढ़ गई थी. अपना रंग दल प्रबंधित करना कठिन होने लगा था. अनुदान में अनियमितता थी, कोविड के बाद प्रस्तुतियों की संख्या में कमी होने लगी थी. संसाधन के श्रोत सिमटने लगे. उनका और उनके कलाकारों का जीवन रंगमंच से चलता था. वे उद्विग्न रहते थे और पीड़ा में भी जिसे वे अपने शिष्य प्रवीण शेखर से साझा करते थे.
सरकार और समाज के पास ऐसे महान व्यक्तियों के उत्तर समय के लिए या उनकी संस्था के लिए कोई योजना है?
मणिपुर की एक बड़ी रंग विभूति कन्हाईलाल और उनके काम को बाइनरी में देखा गया लेकिन आज उनकी अंतिम यात्रा का प्रसारण कलाक्षेत्र मणिपुर के फेसबुक पेज से हुआ, जो कन्हैयालाल और सावित्री जिसने की संस्था है.
कन्हाईलाल और रतन थियाम, दोनों के काम को मणिपुर की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों ने प्रभावित किया. कन्हाईलाल भाषा के कारण रानावि छोड़ गए थे, रतन थियाम रानावि से उत्तीर्ण मणिपुर के पहले स्नातक थे. रतन थियाम की रंग भाषा में मणिपुरी नृत्य, संगीत, और युद्ध कला का स्पष्ट प्रभाव है. मणिपुरी भाषा में रंगकर्म करते हुए दोनों ही ने अपने रंगकर्म को ऐसा बनाया जिसके दर्शक केवल मणिपुरी भाषा को जानने वाले नहीं थे बल्कि वैश्विक थे. अपनी जमीन पर कायम रहते हुए उनका संवाद दुनिया से था.
रतन थियाम ने देखा था कि मणिपुर जल रहा था.
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और फिर एक दिन मैंने उन्हें स्क्रीन पर बोलते देखा (आगे उनकी बात का सार रूप में हिंदी अनुवाद है)
– 2500 सालों के रंगमंच के इतिहास में रंगमंच ने हमेशा सत्ता के मनुष्य विरोधी तंत्र से विद्रोह किया है.
मणिपुर जल रहा है और इस देश के सबसे लोकप्रिय और सबसे शक्तिशाली व्यक्ति, जिसकी जिम्मेदारी भी बनती है, उसने चुप्पी साध ली है. वह ऐसे संगीन मसले पर कैसे चुप रह सकते हैं जिसमें कई जानें जा चुकी हैं, संपत्ति का नुकसान हुआ है और समुदाय का आपसी भरोसा टूट गया है.
– इस देश का मीडिया क्या कर रहा है? वह यूपी में एक गुंडे लुटेरे की कोर्ट परिसर में हत्या की खबर का महीनों कवरेज करता है लेकिन पूर्वोत्तर के इस भयावह संकट की उपेक्षा कर देता है. यहां तक कि मौसम के समाचारों में इस तरह उपेक्षा की जाती है मानो इधर मौसम होता ही ना हो.
– इस देश के नागरिक समाज को भी इधर के मसले को समझना चहिए.
करण थापर से द वायर के लिए किए बातचीत में रतन थियाम की पीड़ा और क्षोभ को देखा जा सकता था, महसूस किया जा सकता था. वह ऐसे संस्कृतिकर्मी नहीं थे जो चुप रहकर कला में तल्लीन रहते. भीषण संकट और चुप्पी के इस दौर में भी उन्होंने सत्ता से सच कहने की रंगमंच की रवायत को रंगकर्म के भीतर और बाहर जारी रखा, हस्तक्षेप किया.
जब उन्होंने अंतिम सांस ली तो वह जहनी और शारीरिक दोनों रूप से तकलीफ में थे. अपनी प्रस्तुतियों के बाद वह दर्शकों की तरफ घुटनों के बल बैठकर अभिवादन करते थे. आज अपेक्षा है कि हम दर्शक उनका इसी तरह अभिवादन करें.
(लेखक रंग समीक्षक हैं. उन्होंने हबीब तनवीर के रंगकर्म पर ‘वैकल्पिक विन्यास’ पुस्तक लिखी है. )
