रतन थियम आधुनिक भारत में उस रंगधारा के रंगकर्मी थे जिन्होंने अपनी रंगपरंपरा से कई तत्व समाहित करते हुए अपनी आधुनिकता गढ़ी थी, जिन्होंने एक तरह से परंपरा को आधुनिक और आधुनिकता को पारंपरिक एक साथ बनाया था. ऐसा ही रंगकर्म हबीब तनवीर ने, बव कारन्त ने और कावलस नारायण पणिक्कर ने क्रमशः हिन्दी अंचल, कन्नड, अंचल और मलयाली अंचल में किया था. रतन ने यह मणिपुरी अंचल से ऊर्जस्वित होकर किया. इन सभी की असंदिग्ध आधुनिकता परंपरा से समरस थी और दोनों को निरन्तरता में देख-समझ-बरत पाती थी.
रतन थियम के रंगकर्म में युद्ध, हिंसा, सौंदर्य और लालित्य सबकी जगह थी. उनके द्वारा किए गए अनेक नाटक युद्ध की विभीषिका और उसके उत्तरराग पर केंद्रित रहे हैं. वे गतियों, प्रकाश और लालित्य को अद्भुत कौशल और कल्पनाशीलता से साधते थे. रंगस्पेस को कैसे स्पन्दित किया जाए यह हुनर उन्हें आता था. हमारे समय में जो हिंसा-हत्या है जो इधर विकराल रूप धारण करती और हमारे लोकप्रिय खेल जैसी होती जा रही है, उसे थियम ने सीधे नहीं ऐसे प्रस्तुतियों से संबोधित किया जो शास्त्रीय कथानकों पर आधारित थीं. ‘चक्रव्यूह’, ‘उत्तरप्रियदर्शी और ‘मैकबेथ’ ऐसी ही प्रस्तुतियां थीं. उनका रंगमंच नाटकीयता के अलावा नृत्य, संगीत और प्रकाश का रंगमंच भी था. उनके हर दृश्य को एक चित्र के रूप में देखा-सराहा जा सकता था. दृश्य लगातार गतिशील चित्रावली बनते रहते थे.
दशकों पहले जब मैं संस्कृति के क्षेत्र में मध्यप्रदेश में सक्रिय था तो कालिदास अकादेमी के अंतर्गत यह तय किया गया कि कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक के चौथे अंक को तीन निर्देशकों द्वारा अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया जाये. यह अंक सामान्य अर्थ में क्रियाहीन प्रसंग है जिसमें पुरूरवा सिर्फ़ विलाप करता है. थियम तीन निर्देशकों में थे, पणिक्कर के साथ. उन्होंने जो प्रस्तुति तैयार की, मणिपुरी में, वह विस्मयकारी थी क्योंकि उन्होंने पुरूरवा की स्मृतियों को अद्भुत दृश्यता में सजीव कर दिया था.
थाईलैंड में भारत महोत्सव
कई बरसों बाद और आज से कुछ दशक पहले मैं थाईलैंड में भारत महोत्सव का संयोजक बना था. उन दिनों मैं भारत सरकार के संस्कृति विभाग में कार्यरत . मुझे लगा कि थाईलैंड बौद्ध देश है तो वहां कोई बौद्धनाटक ले जाना चाहिये. मुझे याद आया कि अज्ञेय के एकमात्र नाटक ‘उत्तरप्रियदर्शी’ की तब तक कोई सार्थक प्रस्तुति नहीं हुई थी. मैंने थियम से सम्पर्क किया, उन्हें नाटक की एक प्रति भेजी. उसे प्रस्तुत करने के लिए वे तैयार हो गए. उसका पहला प्रदर्शन बैंकाक में हुआ और बाद में भारत में कई जगहों के अलावा अमरीका आदि में भी. बाद में उन्होंने धर्मवीर भारती की लंबी कविता ‘कनुप्रिया’ को भी नाटक में परिवर्तित किया.
पर थियम के यहां दृश्यकाव्य का सबसे उत्कट और उत्कृष्ट रूप प्रगट हुआ जब उन्होंने कालिदास के ‘ऋतुसंहार’ को नाटक में बदलकर प्रस्तुत किया. षट्ऋतुचक्र को, जिसमें उन्हें बांंधनेवाला कोई कथानक नहीं है, थियम ने इस क़दर लालित्य और सौन्दर्य से भर दिया कि वह बहुत ही सरस और नयनाभिराम हो गया. बिंबों की मानवाकृतियों द्वारा छटा बनती है और हम लगभग एक आश्चर्यलोक में प्रवेश कर इस प्रस्तुति को मंत्रमुग्ध देखते हैं- मंत्रमुग्ध, कथाबद्ध नहीं.
पिछले कुछ दिनों से मणिपुर जल रहा है और अब दो साल होने आये वहां सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय हिंसा थम ही नहीं रही है. मणिपुर के नागरिक होने के कारण रतन थियम बहुत दुखी और क्षुब्ध थे. उन्होंने मुझे बताया था कि उन्होंने वहां शांति स्थापित करने के लिए विभिन्न समुदायों से संवाद कर मनाने की पहल करना चाहा था और इसका सुझाव केन्द्र सरकार को भेजा था. इस पर सरकार की कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आई. थियम ने अपना रंगकर्म मणिपुरी में, अपनी मातृभाषा में किया और सारे भारत और विश्व में मणिपुरी रंगमंच को व्यापक प्रतिष्ठा दिलायी. उनके देहावसान से उस धारा का दुखद समापन हो गया है जिसमें रह कर हबीब तनबीर, बव कारन्त, पणिक्कर और रतन ने रंगमंच में वैकल्पिक भारतीय आधुनिकता को विन्यस्त और प्रभावशाली किया था.
मूर्धन्यों का अभूतपूर्व समूह
यह सुखद संयोग है कि कृष्ण खन्ना हाल ही में सौ के हुए हैं: उनके कई समवयसी भी, अगर जीवित होते तो सौ के हुए होते. उनमें तैयब मेहता हैं जिनकी जन्मशती उपयुक्त ढंग से मनाने की शुरूआत इसी 26 जुलाई से मुम्बई में हो रही है. मूर्धन्यों का ऐसा समूह, जिसके तैयब एक सदस्य थे, न पहले हुआ न बाद में. उसमें, जैसा अब हम जानते हैं, मक़बूल फ़िदा हुसेन, सैयद हैदर रज़ा, फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा, रामकुमार, कृष्ण खन्ना, अकबर पदमसी, बाल छाबड़ा शामिल थे, तैयब को मिलाकर. यह भी अनोखी बात थी कि इन सभी में दृष्टि-शैली-सरोकारों आदि की अपार बहुलता थी. वे एक-दूसरे के गहरे मित्र और आलोचक भी थे: उनमें जब-तब गंभीर असहमतियां और झगड़े भी होते रहे पर लगभग सभी आजीवन एक-दूसरे के मित्र रहे, एक-दूसरे की चिन्ता करते रहे.
तैयब मेहता आकृतिमूलक चित्रकार तो थे पर उनकी आकृतियां किसी आख्यान से नहीं निकलती थीं और न ही कोई आख्यान गढ़ती थीं. वे कई बार अतियथार्थ रचती लगती थीं और कई बार अमूर्तन के निकट भी जाती. कलालोचक रिचर्ड बार्थोलोम्यू ने कई दशकों पहले तैयब की विषय-वस्तु के बारे में कहा था: ‘विक्षोभ के बाद, न तो उम्मीद से न ही भय से, न स्वीकार और न ही अस्वीकार लेकिन वह सब कुछ होना जो कि सामने लाया गया है.’ तैयब की मानव और पाशविक दोनों क़िस्म की आकृतियां अकसर उनकी हैं जिन्हें छोड़ दिया गया है, जिनके पास अपने अलावा कुछ और नहीं बचा है. वे एक तरह के आख्यान-शून्य में तैरती सी हैं- तैरती नहीं बल्कि विजड़ित.
यह काफ़ी व्यापक रूप से पहचाना गया है कि तैयब के चित्रों में आधुनिक मानवीय विडंबना अपने को विभाजन, पतन और हिंसा के रूपों में प्रगट करती है. उत्तरकाल के उनके प्रायः सभी चित्रों में स्पेस विभाजित है- तिर्यक् रेखा से. बिंब भी वैसे ही विखण्डित-विभाजित हैं. इसने उन्हें अपने समवयसियों में शायद सबसे राजनैतिक चित्रकार बनाया. पर उनकी कला सीधे राजनीति के बारे में नहीं है. विभाजन और पतन के माध्यम से वह जिस मानवीय विडंबना का अहसास कराते हैं, उनके आशय ऐतिहासिक और राजनैतिक, शाश्वत और समकालीन एक साथ हैं.
भारतीय परंपरा में, विशेषतः उसके मूर्तिशिल्पों में, देवताओं-मनुष्यों और पशुओं को एकीकृत किया गया है. यही हम तैयब के यहां देख सकते हैं. वृषभ, काली, पशु और मनुष्य सब एकत्र हैं और सब किसी न किसी पतन में शामिल हैं. यह भी अलक्षित नहीं जा सकता कि तैयब के यहां न तो किसी क़िस्म की वाचालता है, न बहुत कुछ कहने का आग्रह है, न ही किसी क़िस्म की अधीरता है. उनकी आधुनिक कला इस अर्थ में क्लैसिक है कि वह अपनी बेचैनी में भी धीरोदात्त है. जो गिर रहा है उसके उनका रंगविद्ध होना जैसे ऊपर उठाता है. ये आकृतियां गरुत्वाकर्षण से मुक्त लगती हैं और एक तरह से विभाजित-विच्छिन्न आधुनिकता का चित्रण किसी आध्यात्मिक शून्य में करती हैं. अधिकांश चित्रों में पृष्ठभूमि बिलकुल सादी-सपाट है, अकसर एक रंग की. तैयब आपको कोई सन्दर्भ देना नहीं चाहते- क्योंकि वे आप पर कोई आख्यान नहीं थोपना चाहते.
तैयब का रंगबोध बहुत संयमित रहा है. वे सपाट पृष्ठभूमि और विखण्डित आकृतियों को ऐसे साधते हैं कि दोनों के बीच याने पृष्ठभूमि की सपाटता और अग्रभूमि की रंगविकलता के बीच नाटकीय तनाव साफ़ महसूस होता है. यह नाटकीयता उनके कथ्य को, जो किसी आख्यान से मुक्त है, और उनके शिल्प को तदात्म और समरस कर देती है. उनका रंगकौशल समझ और संवेदना से बना है और उसमें सूक्ष्मता के अलावा अचूक संयम है: चित्र में उतना ही दिखेगा जितना कि चित्रकार ने ज़रूरी माना है. उनके ज़्यादातर चित्रों में वस्तुजगत् या प्रकृति की कोई उपस्थिति नहीं है. वे अपने समय की मानवीय विडंबना को मानों बेराहत ढंग से खोजना और विन्यस्त करना चाह रहे हों. वे उस विडंबना को मानों पूरी तरह से मनुष्य पर एकाग्र करना चाहते हैं. सच तो यह है कि अपने अन्य समवयसियों से उलट तैयब ने बहुत कम चित्र बनाये. कम कहा, अधिक कहने से बचे, बाज़ार के प्रति आकर्षित नहीं हुए. पर मनुष्य के विभाजन और पतन से उनकी कला कभी विरत या उदासीन नहीं हुई.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
