हिंदी साहित्य और समाज में अभिलेखागार की परंपरा किंचित अनुपलब्ध है. हमारे मूर्धन्य रचनाकारों के दस्तावेज़ या तो बिसरा दिये जाते हैं, या अध्येताओं के लिये प्रायः अनुपलब्ध रहते हैं. अद्वितीय कवि-गद्यकार व्योमेश शुक्ल के नेतृत्व में हाल ही काशी की नागरीप्रचारिणी सभा ने अपने अभिलेखागार को संवारने का महत्वपूर्ण उद्यम शुरू किया है. इस सिलसिले में सभा को प्रेमचंद की दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं. हिंदी भाषा और समाज को समृद्ध करती इस ऐतिहासिक खोज पर पढ़ें उनका लेख.
एक
हिंदी भाषा-साहित्य और नागरी लिपि की सबसे पुरानी संस्था नागरीप्रचारिणी सभा के साथ उपन्यास-सम्राट प्रेमचंद का संबंध बहुत गहरा है. इस ख़ुशनुमा तथ्य को सिद्ध करनेवाले तमाम ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं; लेकिन इतिहास की इस रौशन किताब का जो अल्पज्ञात पृष्ठ पिछले दिनों हमारी आंखों के सामने उद्घाटित हुआ, वह काशी-निवासियों के लिये ही नहीं, हिंदी के अध्येताओं के लिये भी अप्रत्याशित है. पिछले दिनों सभा-परिसर में उपेक्षित-तिरस्कृत पड़े अभिलेखों को इकठ्ठा करते हुए हमें प्रेमचंद की हस्तलिपि में भी कुछ दस्तावेज़ मिले.
हमें यह जानने और जांचने में देर नहीं लगी कि ये उनकी कहानियों की पांडुलिपियां हैं, जो उन्होंने हिंदी की कालजयी पत्रिका ‘सरस्वती’ के संपादक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को पिछली सदी के आरंभिक दो दशकों में भेजी थीं. अब तक प्रेमचंद के ऐसे दो हस्तलेख हमें मिले हैं. पहला हस्तलेख अधूरा—चार पृष्ठों का—‘पंच परमेश्वर’ का है; जबकि दूसरा पूरा—41 पृष्ठों का—उनकी कहानी ‘ईश्वरीय न्याय’ का है. ये दोनों हिंदी में उनकी आरंभिक कहानियों में से हैं. जीर्णोद्धार का कार्य अभी चल ही रहा है तो यह भी संभव है कि सभा के अक्षय कोश में से प्रेमचंद की कुछ अन्य कहानियों और पत्रों के भी हस्तलेख हमें मिल जाएं. उम्मीद पर दुनिया क़ायम है.
‘पंच परमेश्वर’ के कलात्मक और ऐतिहासिक महत्व के बारे में कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है. इसके पहले हिंदी में प्रेमचंद की दो-तीन ही कहानियां प्रकाशित हुई थीं. एक कहानी ‘प्रताप’ के विजयादशमी अंक (1914) में प्रकाशित हुई थी, जिसका ज़िक्र 4 सितंबर 1914 को ‘ज़माना’ के संपादक मुंशी दयानारायण निगम को लिखे प्रेमचंदजी के एक पत्र में है. वह लिखते हैं : ‘प्रताप के इसरार से मजबूर होकर एक मुख़्तसर-सा किस्सा हिंदी में उसके विजयादशमी नंबर के लिए लिखा है. हिंदी लिखनी तो आती नहीं मगर कुछ कलम तोड़-मोड़ दिया है.’
हालांकि, ‘कलम का सिपाही’ (प्रेमचंद की जीवनी; लेखक : अमृत राय) के परिशिष्ट में प्रेमचंद की समस्त कहानियों की जो सूची दी गई है, उसमें ‘प्रताप’ में प्रकाशित किसी कहानी का नाम नहीं है.
बहरहाल, ‘पंच परमेश्वर’ (जून 1916) के पहले ‘सौत’ (दिसंबर 1915) और ‘सज्जनता का दंड’ (मार्च 1916) ‘सरस्वती’ में छपी थीं. द्विवेदीजी ने अपने संपादन-काल की ‘सरस्वती’ की सभी प्रकाशित-अप्रकाशित रचनाओं की फ़ाइलें क़ायदे से रखने के लिए नागरीप्रचारिणी सभा को दे दी थीं; लेकिन कालांतर में सभा के संचालक इन पांडुलिपियों को संभाल न सके और बहुत सी चीज़ें समुचित रखरखाव के अभाव में नष्ट या इधर-उधर हो गईं. हमें उम्मीद है कि कुछ सामग्री अभी भी शेष होगी, और देर-सवेर ‘सौत’ और ‘सज्जनता का दंड’ के हस्तलेख भी मिल जाएंगे.
लेकिन इतना तय है कि आज की तारीख़ में ‘पंच परमेश्वर’ का हस्तलेख हिंदी में लिखित प्रेमचंदजी का शायद सबसे पुराना उपलब्ध दस्तावेज़ है. इसकी मूल प्रति सभा के अभिलेखागार में संरक्षित और सुरक्षित है.
सभा ने हाल ही ‘पंच परमेश्वर और ईश्वरीय न्याय’ शीर्षक से इसका पुस्तकाकार प्रकाशन भी किया है और अब यह सबके लिए उपलब्ध है. नई सभा ने अनुपलब्ध, दुर्लभ और विशिष्ट को उपलब्ध, सर्वसुलभ और साधारण बना दिया है.

दो
इन पांडुलिपियों पर लौटने से पहले हम प्रेमचंद और सभा की सहयात्रा का स्मरण कर लें, ताकि जाना जा सके कि आख़िर ये अनमोल दस्तावेज़ किस रास्ते से चलकर उपन्यास-सम्राट के अध्ययन कक्ष से नागरीप्रचारिणी सभा तक पहुंचे.
एक दौर में प्रेमचंद का छापाख़ाना विश्वेश्वरगंज, वाराणसी-स्थित सभा-परिसर के पड़ोस में था. वे लगभग रोज़ अपने प्रेस में दोपहर के खाने की छुट्टी होने पर सभा आ जाते थे. विश्वप्रसिद्ध कला संग्रहालय—भारत कलाभवन—तब तक जगह बदलकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय नहीं गया था; सभा के परिसर में स्थित था. उस संग्रहालय के संस्थापक-अभिभावक राय कृष्णदास भी यहीं मिल जाते थे. दोनों मूर्धन्यों की बैठकी जम जाती थी. कभी-कभी नारियल बाज़ार से उठकर जयशंकर प्रसाद भी बैठकी में शामिल हो जाते थे. प्रेमचंदजी के प्रेस मैनेजर थे प्रवासीलाल वर्मा. बहुत चलते-पुर्ज़े आदमी. उन्हें लेकर मित्रों की मंडली में व्यंग्य-विनोद होता रहता था. प्रवासीलाल वर्मा और राय कृष्णदास में मुक़दमेबाज़ी भी ख़ूब हुई. तब के बनारस में पतंगबाज़ी और गहरेबाज़ी की तरह मुक़दमेबाज़ी भी एक व्यसन था. मुक़दमाजन्य विवाद की कटुता कचहरी तक सीमित रहती थी, निजी संबंधों में नहीं घुसने पाती थी. ऐसी ही बैठकी राय कृष्णदास के रामघाट वाले मक़ान पर प्रायः रोज़ शाम को लगती थी, जिसमें अनिवार्यतः भांग छानी जाती थी. हिंदी के यशस्वी समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य केशवप्रसाद मिश्र कई वर्षों तक उस बैठक के स्थायी सभासद थे.

आगे चलकर प्रेमचंद के साथ सभा का एक रिश्ता और बना. उनकी मृत्यु के क़रीब बीस बरस बाद, यानी पचास के दशक में उनके छोटे भाई महताब राय नागरीप्रचारिणी सभा में ‘प्रेस मैनेजर’ के पद पर काम करने लगे. अनेक पुराने प्रकाशनों पर आज भी लिखा मिल जाता है—‘मुद्रक : महताब राय, नागरी मुद्रण, वाराणसी’. आगे चलकर महताब राय ने प्रेमचंद के लमही-स्थित घर के आगे की पुश्तैनी ज़मीन सभा को अर्पित कर दी जहां उपन्यास-सम्राट का जन्म हुआ था. वह अर्पण-पत्र सभा के पास है.
8 जुलाई 1958 को बनारस कचहरी में हुई अर्पण-पत्र की रजिस्ट्री के काग़ज़ात पर महताब राय के पुत्रों—सर्वश्री रामकुमार, कृष्णकुमार, विनयकुमार, नंदकुमार और कौशलकुमार के भी हस्ताक्षर हैं. ध्यान दें—1470 स्क्वायर फ़ीट का यह भूखंड प्रेमचंदजी के भाई ने बेचा नहीं, सभा को निःशुल्क अर्पित किया था. हालांकि इसके कुछ ही दिनों बाद प्रेमचंद-परिवार के कुछ दूर के रिश्तेदार सर्वश्री श्यामलाल और संजीवन राय ने उस भूखंड से लगी हुई 4580 स्क्वायर फ़ीट ज़मीन सभा को 1500 रुपये में बेची थी. इस प्रकार सभा के पास स्मारक के लिये कुल 6050 स्क्वायर फ़ीट का इकट्ठा भूखंड हो गया. यह सब कुछ श्री महताब राय की उदारता और सभा के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजबली पांडेय के सत्प्रयत्नों का प्रतिफल था. 9 अक्टूबर 1959 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने उस स्मारक का शिलान्यास किया. बांग्ला के सुप्रसिद्ध कथाशिल्पी ताराशंकर वंद्योपाध्याय ने उस कार्यक्रम की अध्यक्षता की थी.
शिलान्यास के बाद सभा प्रतिवर्ष 31 जुलाई और 8 अक्टूबर को उस पुण्यभूमि पर विचार-गोष्ठियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करती रही. लेकिन संसाधनों की कमी से सभा के कार्यकर्ता उस स्थल को अपने संकल्पों के अनुरूप विकसित न कर सके. हां, चबूतरे पर प्रेमचंदजी की आवक्ष प्रतिमा ज़रूर प्रतिष्ठित हो गयी थी. अगले ही वर्ष—सन् 1960 में—इस स्मारक का उद्घाटन बनारस के यशस्वी नागरिक, राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल और सभा के हितैषी बाबू संपूर्णानंद ने किया. लंबे अंतराल के बाद, सन् 2006 में उत्तर प्रदेश सरकार ने लमही के समग्र सांस्कृतिक उत्थान का मानचित्र बनाकर नागरीप्रचारिणी सभा से वह ज़मीन अनुरोधपूर्वक मांगी. सभा ने आगे बढ़कर वह भूखंड निःशुल्क सरकार को दे दिया.

तीन
लेकिन प्रेमचंदजी के साथ सभा का एक रिश्ता और है जो आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के द्वार से घूमकर सभा तक आता है. अब तक इस रास्ते पर ज़्यादा रौशनी नहीं पड़ी है. यह 1916 के शुरुआती महीनों की बात है जब प्रेमचंद का ध्यान पहली बार हिंदी की ओर गया. उर्दू अख़बारों से आमदनी कुछ ख़ास नहीं थी, आर्थिक हाल भी बुरा था. उर्दू की ऐसी हालत वह एक अर्से से देखते आ रहे थे, और हिंदी की तरफ़ उनका झुकाव बढ़ता जा रहा था. भारतेंदु, केशव और बिहारी वाले लेख; कालिदास की कविता पर एक लंबा लेख, ‘मेघदूत’ और ‘विक्रमोर्वशी’ के उर्दू पद्यानुवादों की लंबी समीक्षाएं भी इसी समय में, इसी प्रवाह में लिखी गईं और इन सबका उद्देश्य एक ही है— हिंदी-संस्कृत की परंपरा से उर्दू पाठकों को परिचित कराना.
इसी दौरान उन्होंने हिंदी में कहानियां लिखकर प्रकाशित कराना शुरू किया था. 1903 से 1920 के दरम्यान आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ‘सरस्वती’ के संपादक थे. इस अवधि में प्रेमचंदजी की सात कहानियां पहले-पहल वहां प्रकाशित हुईं—‘सौत’ (दिसंबर 1914), ‘सज्जनता का दंड’ (मार्च 1916), ‘पंच परमेश्वर’ (जून 1916), ‘ईश्वरीय न्याय’ (जुलाई 1917), ‘दुर्गा का मंदिर’ (दिसंबर 1917), ‘बलिदान’ (मई 1918) और ‘पुत्र प्रेम’ (जून 1920). आगे चलकर प्रेमचंदजी की और भी कहानियां ‘सरस्वती’ में छपीं—तब तक द्विवेदीजी संपादन-कार्य से निवृत्त हो चुके थे.
हम कह आए हैं कि द्विवेदीजी ने ‘सरस्वती’ में प्रकाशनार्थ आए लेखों, अनुवादों, कथा-कहानियों और कविताओं का हस्तलेख-संग्रह नागरीप्रचारिणी सभा के पुस्तकालय को दे दिया था. वह सामग्री साहित्येतिहास की अमूल्य निधि थी, लेकिन 1970 से 2023 के बीच सभा के संचालकों की लापरवाही से उस संग्रह की ज़्यादातर सामग्री नष्ट या इधर-उधर हो गई.
अलबत्ता प्रेमचंदजी की दो कालजयी कहानियों—‘पंच परमेश्वर’ और ‘ईश्वरीय न्याय’— के हस्तलेख कुछ महीने पहले सभा-परिसर की व्यापक साफ़-सफ़ाई के दरम्यान हमें किसी सौभाग्य की तरह मिल गए. सफ़ाई का ज़िम्मा हमारी नौजवान टीम के पास था. इस काम में जोख़िम और सावधानी दरकार थी. कुछ कमरे 90 साल से बंद थे. इन कमरों में सांप, अजगर और बिच्छू तक घर बना चुके थे. एक साथी को सांप ने काट भी लिया.
एक इमारत के भीतर बरगद और पीपल के वृक्ष उग आए थे. उसी इमारत के कमरों में काग़ज़ों का अंबार लगा हुआ था, जिन पर कम से कम सत्तर बरस पुरानी धूल जमी थी. मज़दूर वहां जाने से इंकार कर दे रहे थे, लेकिन सभा के युवजनों ने उत्साह और जतन के साथ इन जगहों को ख़ाली किया. एक-एक पुर्जे की जांच की. व्यर्थ-अव्यर्थ को अलगाया. बहुत सी मूल्यवान वस्तुएं काल के गाल में बिला गईं, लेकिन तक़रीबन साल भर चले इस दुस्साहसिक उद्यम की शक्ति से बहुत सी चीज़ें बच भी गईं.

इन दो कहानियों के हस्तलेख वैसा ही उपहार हैं. सातवें आसमान से प्रेमचंद जी इन युवकों को पसीना बहाते देख रहे थे. उन्होंने अपनी प्रायः तीन सौ कालजयी कहानियों के संग्रह में से दो अनुपम कहानियों के हस्तलेख इन किशोरों को सौंप दिए. क्या ही संयोग है कि आज से 132 वर्ष पहले इन्हीं नवयुवकों की उम्र के तीन किशोरों—बाबू श्यामसुंदरदास, रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह— ने इस संस्था की स्थापना की थी; और आज—जब लंबे अंधकार के बाद भाषा और साहित्य का यह महान संस्थान अपनी ही राख से जी उठा है— इस पुनर्नवता के पीछे भी किशोर ही हैं. यों, नागरीप्रचारिणी सभा और युवता के नाभिनाल संबंध को समय ने फिर से सत्यापित कर दिया है.
आज से 110-111 वर्ष पहले लिखी गई कहानी ‘पंच परमेश्वर’ का हस्तलेख अधूरा है, लेकिन ईश्वरीय न्याय’ का हस्तलेख संपूर्ण है. आगे चलकर ‘पंच परमेश्वर’ प्रेमचंदजी की सात कहानियों के संग्रह ‘सप्तसरोज’, (प्रथम संस्करण, 1927, प्रकाशक : हिंदी पुस्तक एजेंसी, 203, हरिसेन रोड, कलकत्ता) में पुस्तकाकार प्रकाशित हुई. ‘ईश्वरीय न्याय’ सात कहानियों के एक अन्य कहानी संग्रह ‘सप्तसुमन’ (द्वितीय संस्करण, 1931, प्रकाशक : नंदकिशोर एंड ब्रदर्स, बुकसेलर्स एंड पब्लिशर्स; बनारस सिटी) में छपी, जो हाईस्कूल के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा सकने योग्य सरल, बोधगभ्य और स्पष्ट नैतिक संदेश देने वाली कहानियों का संग्रह था। उस संग्रह की भूमिका में प्रेमचंदजी कहते हैं :
संसार के वर्तमान साहित्य में कहानी या गल्प का विशेष स्थान है और उसे यह स्थान पिछले दस-पांच वर्षों में ही प्राप्त हुआ है। साहित्य की प्रायः सभी परीक्षाओं में कहानियों का कोई-न-कोई संग्रह अवश्य रक्खा जाता है। मध्यमा और बी. ए. की परीक्षाओं में मेरा एक संग्रह पढ़ाया जाता है। पर हाईस्कूलों के उपयुक्त ऐसा कोई संग्रह नहीं था। उसी कमी को पूरा करने के लिये यह संग्रह प्रकाशित किया गया है।
हरेक काल में साहित्य का कोई अंग जनरुचि का मुख्य स्रोत बन जाया करता है। एक समय समस्या-पूर्तियों के आधिपत्य का था। नाटकों का भी बहुत दिनों तक साहित्य पर आधिपत्य रहा। फिर उपन्यासों का ज़माना आया। अब गल्पों का काल है। उन पत्रिकाओं में जिन पर किसी विशेष संप्रदाय की छाप नहीं होती, गल्पों ही का प्राधान्य रहता है। युवक ही नहीं, साहित्य के मर्मज्ञ भी कहानियों को अपने संदेशों और अनुभवों के प्रचार का साधन बना लेते हैं। आज संसार का ऐसा कोई बड़ा साहित्यसेवी नहीं है, जिसने कहानियाँ लिखकर अपनी प्रतिभा का परिचय न दिया हो। मुझे आशा है कि इन कहानियों को पढ़ने से कुमारों में सुरुचि उत्पन्न होगी और वे संसार के बड़े-बड़े गल्प-लेखकों की रचनाओं का रसास्वादन करेंगे।
स्पष्ट है कि यह कहानी प्रेमचंदजी के ही शब्दों में, ‘हाईस्कूलों के उपयुक्त’ बोधगम्य और किशोरों का नैतिक उद्बोधन करने वाली रचना है. भाषा की स्वच्छता और सरलता का यह आदर्श प्रेमचंद के साथ-साथ उनके युग का भी लक्ष्य था.

उनके संपादक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा उनकी कहानियों में किए गए संशोधनों के आलोक में इस आदर्श को पहचाना जा सकता है—जहां द्विवेदीजी ने प्रेमचंदजी के ‘कालांतर’ को ‘धीरे-धीरे’, ‘स्वामिभग्त’ को ‘स्वामिभक्त’, ‘धर्म’ को ‘ईमान’, ‘विचार’ को ‘ख़याल’, ‘सशस्त्र’ को ‘शस्त्रसज्जित’, ‘केवाड़’ को ‘किवाड़’, ‘बिर्ला’ को ‘बिरला’, ‘अल्गू’ को ‘अलगू’, ‘सक्ता’ को ‘सकता’, ‘हुवा’ को ‘हुआ’ और ‘बन्ने’ को ‘बनने’ में बदला है. ऐसी अनेक तब्दीलियां की गई हैं और हरेक संशोधन के पीछे कोई न कोई मूल्यवान अंतर्दृष्टि है. ‘पंच परमेश्वर’ कहानी का तो नाम ही द्विवेदीजी ने रखा. हस्तलेख में कहानी का नाम है ‘पंच भगवान’. द्विवेदीजी ने ‘भगवान’ को काटकर ‘परमेश्वर’ कर दिया. दुर्भाग्यवश, उस कहानी के हस्तलेख को हम समग्रत: प्रकाशित नहीं कर सके. लेकिन यह अधूरा हस्तलेख सभा द्वारा प्रकाशित ‘पंच परमेश्वर और ईश्वरीय न्याय’ शीर्षक पुस्तक में पहली बार हिंदी साहित्य-संसार के सम्मुख आया है.
हमने इस पुस्तक में दोनों कहानियों के साथ-साथ प्रेमचंदजी द्वारा ‘सरस्वती’ में प्रकाशनार्थ भेजे गए प्रारूपों और उन प्रारूपों में द्विवेदीजी द्वारा किए गए संशोधनों को भी टंकित रूप में प्रकाशित किया है, ताकि पाठक देख-समझ सकें कि परवर्ती पीढ़ी के लेखक-संपादक किस तरह परस्पर संवादमग्न रहते थे और इस संवाद से भाषा और विचार में कितनी समृद्धि आई.
आप कह सकते हैं कि सभा का यह उपक्रम विरले साहित्यिक प्रकाशनों में शुमार किया जाने योग्य है. कुछ उदाहरण तुरंत याद आते हैं. कालजयी कवि-आलोचक टी. एस. इलियट की कविता ‘द वेस्ट लैंड’ का पहला प्रारूप एज़रा पाउंड द्वारा किये गये संशोधनों के साथ 1971 में प्रकाशित हुआ था. वेलेरी इलियट द्वारा संपादित और फेबर एंड फेबर द्वारा प्रकाशित उस दस्तावेज़ी पुस्तक में कुछ फुटकर कविताएं और पत्रों के साथ संपादकीय पाद टिप्पणियां भी हैं.

यह भी संयोग नहीं कि इस किताब में प्रकाशित दोनों ही कहानियों के केंद्र में न्याय है; चाहे गांव की पंचायत हो या शहर की कचहरी. न्याय-भावना प्राणिमात्र का आदिम आदर्श है और सृष्टि का अनिवार्य नियम. प्रेमचंदजी न्याय-भावना पर इसरार करते हैं और याद दिलाते हैं कि रोज़ाना की रगड़घस की ओट में स्पंदित वह एक अनिवार्य जीवन-मूल्य है.
नागरीप्रचारिणी सभा भी इसी भावना से संचालित होती है. हमारा संकल्प है कि सभा अपने प्रकाशनों के माध्यम से साहित्य के अनुशीलन की भिन्न-भिन्न प्रविधियां प्रस्तावित करे और समय-समय पर साहित्य की धरोहर को नए उपयोगी शिल्प में आपके सामने ले आए.
(व्योमेश शुक्ल इन दिनों नागरीप्राचरिणी सभा के प्रधानमंत्री हैं.)
