‘मैं एक बदतमीज़, बदकलाम, बदज़बान, बदनसीब, बदख़याल, बदमिज़ाज बूढ़ा बनता जा रहा हूं. लेकिन अब मैं अपना तौर-तरीका बदल नहीं सकता. लाख कोशिश करूं तब भी नहीं. मुझे अपने गु़स्से और ग़म को अपने काम में ढालते रहना चाहिए, अपने किरदार और व्यवहार में नहीं. जैसा जीता-सोचता हूं क़रीब-क़रीब वैसा ही लिखता हूं, जैसा लिखता हूं क़रीब-क़रीब वैसा ही जीता-सोचता हूं.’
यह एक इंदराज़ है कृष्ण बलदेव वैद की डायरी में दर्ज़ और प्रकाशित. जिस समय की यह डायरी है, उस समय वैद 80 बरस के होने जा रहे थे और इस 27 जुलाई को वे 98 बरस के हो गए होते.
इस छोटे से इंदराज़ में वह सब कुछ है जिसके लिए वैद अपने ढंग के अप्रतिम लेखक थे: बेबाकी, आत्म की निर्मम चीरफाड़, गद्य में कविता की लय. परम वेध्यता और अपने लिखे-जिये पर भरोसा भी.
वैद ने अपने उपन्यासों, कहानियों, नाटकों और अन्य गद्य द्वारा में बीहड़ असह्य यथार्थ रचा जिसने उनके समवर्ती साहित्य में प्रचलित और स्वीकार्य यथार्थ के लालित्य को चुनौती दी. हिंदी की सुप्रतिष्ठित साहित्य-संस्कृति ने उनकी अवहेलना की; उन्हें एक तरह से जमात-जात बाहर रखा. वैद के काव्यशास्त्र के केंद्र में रहा अतिक्रमण, अतिरेक, विडंबना और नकार. उन्होंने एक बिलकुल नयी और अप्रत्याशित, इसलिए ज़्यादातर अस्वीकार्य कथाभाषा गढ़ी.
उन में यह दुस्साहस अदम्य रहा कि जो कुछ भी दिया हुआ है भाषा, यथार्थ, कल्पना, लक्ष्य आदि उनसे अलग रास्ता खोजना है. वे हिंदी के सबसे विपथगामी, गोत्रहीन और वंशहीन लेखक बने. उनकी दृष्टि मूलतः ट्रैजिक है पर उसमें एक तरह की खिलवाड़ भी हमेशा है- कथा के अहाते में ऐसी शब्द-क्रीड़ा शायद ही किसी और ने की हो. ट्रैजिक में कॉमिकल भी.
वैद नाउम्मीदी के ध्रुवान्त तक जाने वाले कथाकार थे और उनके लिए लिखना ही उम्मीद करना था. कई बार लगता है कि उनकी रची दुनिया बहुत अंधेरी है. पर फिर याद आती है रूमी की यह उक्ति ‘अंधेरा तुम्हारी कन्दील है’. यह दुनिया बेहराहत है और उसमें किसी यूटोपिया या व्यवस्था में भाग सकने का कोई रास्ता नहीं है. उसका सच ही उसका रास्ता है. सचाई अपने मूल और विस्तार में निर्मम है.
डायरी की पुस्तक ‘अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है’ में, जिसे रज़ा पुस्तकमाला में प्रकाशित किया गया था, कुछ और इंदराज़ ग़ौरतलब हैं:
‘देशप्रेम अक्सर एक प्रकार के पागलपन में बदल जाता है, इसलिए इसे शक़ की निगाह से देखना ज़रूरी और सही है. देशभक्ति प्रेम के बहाने अक्सर ग़रीबों को ही पीसा जाता है, उन्हें ही कुर्बान किया जाता है, उन्हें ही दूसरे देशों के ग़रीबों से लड़ाया जाता है. देशप्रेम और धर्मान्धता सत्ताधारियों के हित में इस्तेमाल होते आए हैं, होते रहते हैं. देशप्रेम के अतिरेक का ही एक रूप: सारे जहां से अच्छा हमारा देश, हमारी अच्छी सभ्यता, हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा. आजकल हमारे देश में यही हवा चल रही है.’
एक और इंदराज़:
‘मैं शायद एक ही बात पर कुछ गर्व कर सकता हूं कि मैंने यथासम्भव अपने आपको धोखा नहीं दिया. बतौर लेखक और इंसान, यह भ्रम नहीं पलने दिया कि मैं भ्रममुक्त हूं, कि मैं दोष-मुक्त हूं, कि मैं मुक्त हूं. मैंने अपनी कमज़ोरियों को कभी अपने आप से नहीं छिपाया. यही मेरी ताक़त है, यही मेरी कमज़ोरी.’
ये सभी इंदराज़ 2002-2005 के बीच लिखे गए हैं- आज से 20-22 बरस पहले.
कवि का विदागीत
पिछले पचास वर्षों में संसार में, विभिन्न भाषाओं में, जो बड़े कवि हुए हैं उनमें फ्रेंच कवि ईव बोनफ़ुआ एक हैं. 1923 में जन्मे इस कवि का देहावसान 2016 में हुआ. उनकी असंदिग्ध उत्कृष्टता शेक्सपीयर के अनुवादों और कला पर विपुल लेखन से भी पहचानी गई.
सीगल से अंग्रेज़ी अनुवाद में उनकी अंतम कविताओं का संग्रह ‘टुगैदर स्टिल’ प्रकाशित हुआ है. इसी शीर्षक की कविता दरअसल तीन कविताओं का एक समुच्चय है जिसे उनका विदागीत भी कहा जा सकता है. उसके कुछ मार्मिक अंशों का हिंदी अनुवाद देखिए:
मुझे याद हैं वे जगहें जो हमने साझा की थीं:
क्या हम वहां थे जहां हम होना चाहते थे?
एक घास का मैदान, और आकाश के सामने वे ऊंचे वृक्ष
चट्टानों से कुछ दबे हुए, छांह में.
मुझे याद है, पर क्या है जिसे याद किया जाए?
रेतघड़ी में रिक्त तेज़ी से दमकता है.
स्मृति यह प्रपात है. सब तरफ़ ग्रीष्म,
एक ख़ाली भूभाग, झाड़-झंखाड़ और पत्थर का. मैं वहां हूं:
मैं उठाता हूं लोहे का ढकना, पानी से जंग खाया हुआ
एक दूसरी शताब्दी का, दूसरे आकाश का
मैं झुकता हूं: यह तुम हो
एक मुस्कान इतने सारे वर्षों की उस रात.
कविता लम्बी है. उसके कुछ अंश ही दिये जा रहे हैं:
मेरे मित्रो, मेरे प्रियजनो,
तुमने जो उपहार दिए मैं उनकी तुम्हारे नाम वसीयत करता हूं
यह पृथ्वी, आकाश के निकट, एक-दूसरे से जुड़े
उन असंख्य हाथों द्वारा, क्षितिज.
मैं तुम्हारे नाम वसीयत करता हूं वह आग
जो हम निहारते थे,
जलती हुई सूखी पत्तियों के धुए में
अदृश्य के माली ने कुरेदी थी
एक छूट गए मकान की दीवार के सहारे.
मैं वसीयत करता हूं तुम्हारे नाम यह पानी
जो कहता लगता है कि
अदृश्य में- खड्ड के खोखल में-
जो शून्य सम्हालते हैं वह देववाणी है
और देववाणी एक प्रतिज्ञा. वचन
मैं वसीयत करता हूं तुम्हारे नाम
यह राख बुझ गए चूल्हे की,
उसकी चिंगारियों के साथ जो अब छितरी हुई हैं.
मैं तुम्हारे नाम वसीयत करता हूं
परदों में विदीर्णता
खिड़कियां जो खड़खड़ाती हैं
पक्षी जो बंद पड़े घर में फंसा है.
फिर कवि जिज्ञासा करता है:
वसीयत में देने को मेरे पास क्या है?
मैंने जो चाहा: एक दहलीज का पत्थर
नंगे पैरों के नीचे गरम;
ग्रीष्म अपनी अचानक बारिश में सीधे खड़ा,
हमारे अंदर का देवता जिसे हमने अपनाया नहीं.
कुछ फ़ोटोग्राफ़ में वसीयत मैं दे सकता हूं:
उनमें से एक में- उल्लसित
जैसे तुम अंदर वापस आती हो एक युवा स्त्री
अपने बच्चे के साथ, उस दिन की अचानक मूसलाधार में;
तुम उस मूर्ति के पास से गुज़रती हो जो कभी
हमारे स्वीकार का साझा संकेत थी;
और है, एक ख़ाली घर में, हमारा सामान
जो अभी हमारे पास रखा है, ज्यों वह प्रतीक्षा करता है
हमें उसकी ज़रूरत पड़ेगी, आख़िरी दिन पर.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
