इस बरस प्रेमचंद जयंती और गोस्वामी तुलसीदास जयंती एक साथ पड़ गई; यानी 31 जुलाई और श्रावण शुक्ल सप्तमी एक ही दिन; अर्थात् प्रश्न के भीतर प्रश्न. प्यास के भीतर प्यास.
समसामयिक हिंदी साहित्य में प्रेमचंद और गोस्वामी तुलसीदास को ध्रुवांतों पर रखकर सोचा गया—इन दोनों मूर्धन्यों को नदी के दो किनारों की तरह मान लिया गया है. इस पार गोस्वामीजी, उस पार मुंशीजी. उभयतटतीर्थ; यानी तीर्थ नदी के दोनों तरफ़ है—कुछ भक्तों का इधर और कुछ का उधर. थोड़े से बहुदेववादियों का दोनों ओर. यह मान लिया गया है कि अपनी वैचारिक भूमि पर दोनों रचनाकार एकदूसरे का विलोम हैं. लेकिन इस सर्वमान्य धारणा की विधिवत आलोचनात्मक जांच नहीं की गई है.
ऐसे में, यह अनुमान लगाना दिलचस्प है कि अपने जीवन-काल में प्रेमचंदजी की राय इस तिथि—जिसे तुलसी-जयंती भी कहा जाता है—के बारे में क्या रही होगी ? ‘हंस’ के जुलाई, 1933 अंक के संपादकीय में वह लिखते हैं—
जन्म-दिन का जो उत्सव मनाया जाता है, उसको ‘जयंती’ कहते हैं. उसी को ‘वर्षगांठ’ या ‘सालगिरह’ भी कहते हैं. श्रावण शुक्ला सप्तमी तो गोस्वामी तुलसीदास जी की निधन-तिथि है, इसलिए उस दिन ‘जयंती’ नहीं, ‘पुण्य-स्मृति-तिथि’ मनाई जानी चाहिए. ‘तुलसी-जयंती’ की जगह ‘तुलसी-पुण्यतिथि’ का ही प्रयोग और प्रचार होना अच्छा है. जब गोस्वामी जी के जन्म संवत् का ही ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो सका है, तब उनके जन्म-दिन का ठीक पता लगाना कैसे संभव हो सकता है? चूंकि वे स्वयं एक दोहे में अपनी निधन-तिथि अंकित कर गए हैं, इसलिए उसमें शक़ करने की कोई गुंजाइश नहीं है. ऐसी दशा में ‘तुलसी-तिथि’ शब्द ही सर्वथा उपयुक्त मालूम होता है. हिंदी-साहित्य सम्मेलन और काशी नागरी प्रचारिणी सभा को चाहिए कि ‘तुलसी-जयंती’ शब्द का प्रयोग और प्रचार रोकने की कोशिश करें. हिंदी-पत्र संपादकों को इस नियंत्रण में अधिक सफलता मिल सकती है. हिन्दी-प्रेमियों को यह भूल सुझाने का यही उपयुक्त अवसर है.

गोस्वामी तुलसीदास के व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रति इतनी गहन संसक्ति और रामलीला—जो एक अर्थ में गोस्वामीजी के ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ से निकला एक अनुपम प्रदर्शनकारी कलारूप है—के लिए इतना प्रबल आकर्षण उस युग के लेखकों में भी प्रेमचंदजी की तरह कम ही लोगों में था. प्रेमचंदजी के सरोकार बहुत विस्तृत थे. तुलसी से जुड़ा कोई भी प्रसंग उन्हें आंदोलित करता था. ‘हंस’ के उसी अंक में प्रकाशित एक अन्य संपादकीय टिप्पणी में वह बनारस में गोस्वामीजी की स्मृति से जुड़े हुए स्थलों का हाल बताते हुए और हिंदीभाषी समाज का आह्वान भी करते हैं—
इस महीने (जुलाई, श्रावण) में जगह-जगह तुलसी-तिथि मनाई जायगी. 29 जुलाई (शनिवार) को इस देश के अनेक नगरों और ग्रामों में विशेष रूप से तुलसीदास-संबंधी उत्सव मनाया जाएगा. यों तो नित्य ही असंख्य स्थानों में तुलसीदास जी का गुणगान हुआ करता है, पर उस दिन उनके निमित्त कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य होना चाहिए.
…तुलसीदास जी से संबंध रखने वाले अनेक स्थान काशी में हैं और सबकी दशा शोचनीय है. गोपाल मंदिर के अहाते में एक कोठरी है जिसे लोग गोस्वामी जी का निवास स्थान बतलाते हैं, वह साल भर में एक बार सिर्फ श्रावण शुक्ला सप्तमी को खुलती है. क्या उस अंधेरी (!!!) कोठरी का इतना ही सम्मान पर्याप्त है? जिस स्थान में महीनों और बरसों रहकर गोस्वामीजी ने ‘विनय पत्रिका’ के समान अपूर्व विनय ग्रंथ लिखा, उस स्थान की दुर्दशा हिंदीवालों के लिए घोर लज्जाप्रद है.
यही हाल अस्सी घाट वाले तुलसी मंदिर का है. जिस भाषा में हिमायती करोड़ों हों, उस भाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि के प्रति ऐसी उदासीनता. अभाग्य तुलसीदास का जो हिंदुस्तान में हिंदी के कवि हुए.
यह 1933 का मज़मून है. तब से अब तक गंगाजी में बहुत पानी बह चुका है. महामना मालवीय और उनके बाद बाबू संपूर्णानंद के नेतृत्व और संरक्षण में तुलसीघाट सहित काशी के सभी पक्के घाटों की हालत बहुत पहले ही दुरुस्त हो चुकी है; बल्कि उनके एक बार फिर ‘मेंटेनेंस’ का समय आ पहुंचा है. पर्यटक महज़ एक या दो घाटों तक महदूद न रहें; सभी घाटों तक पहुंचें; उनका इतिहास और महत्व जानें; इस दिशा में काम करने की ज़रूरत है. अस्सी घाट—दरअसल तुलसीघाट—वाला तुलसी मंदिर संकट मोचन निधि के हाथों में सुरक्षित-संरक्षित है. गोस्वामीजी द्वारा संस्थापित अखाड़ा भी संकट मोचन मंदिर के महंत विश्वंभरनाथ मिश्र के प्रयत्नों से आधुनिकतम उपकरणों से सज्जित हो चुका है. वहां व्यायाम करने वाले पहलवान राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित हो रहे हैं और लंबे अंतराल के बाद स्त्रियों को भी अखाड़े में प्रवेश मिला है. वे भी बनारस और तुलसीदास का नाम आगे बढ़ा रही हैं.
जयंती आदि के नाम पर जो कथित साहित्यिक या धार्मिक अनुष्ठान तब से अब तक अनवरत होते चले आ रहे हैं, प्रेमचंद ने उन पर भी सम्यक टिप्पणी की है. वह लिखते हैं—
‘हर साल लोग जगह-जगह तुलसी जयंती के नाम से तुलसी-तिथि मनाते हैं. करते क्या हैं? गांव वाले दो-चार सेर घी आग में झोंक देते हैं. हवन के साथ-साथ ब्राह्मण-भोजन तो चाहिए ही? वह भी थोड़ा-बहुत हो ही जाता है. इसके बाद ढोलक झाल लेकर लोग तुलसी-कृत रामायण गाने लगते हैं. चार-छह घंटे लोग गला फाड़कर चिल्लाते हैं. बस, हो गए तुलसीदास से उऋण. शहर वाले एक नोटिस छपवाकर बंटवा देते हैं. लोग निश्चित स्थान पर जुटते हैं. भाषण होते हैं. लेख पढ़े जाते हैं. कविताएं सुनाई जाती हैं. सबमें यही कहा जाता है कि गोस्वामी जी की कविता ऐसी है वैसी है. उनके उपकारों का हम बदला नहीं दे सकते; इत्यादि. बस, एक ही तरह की बातें हर साल! नया कोई कहेगा कहां से? कोई रिसर्च तो करता नहीं और जो करता है वह उस उत्सव में आता नहीं. इस तरह एक रस्म-सी पूरी कर दी जाती है. यह तो एक तरह से बला टलना है, इससे कुछ ठोस काम नहीं हो सकता.
इस समय आवश्यकता इस बात की है कि जहां-जहां तुलसी-तिथि मनाई जाए, वहां तुलसी-निधि के लिए थोड़ा-घना, जो मिल सके, अर्थ-संग्रह किया जाए और वह द्रव्य महामना मालवीयजी को इस निवेदन के साथ भेज दिया जाए कि वे इसे तुलसीदास से संबंध रखने वाले स्थानों के जीर्णोद्धार में लगावें.
इस तरह अगर कुछ साल भी हर जगह काम हो तो तुलसी-निधि में यथेष्ट धन एकत्र हो सकता है. उससे राजापुर, काशी और अयोध्या में तुलसीदास जी के जितने स्मृति-चिह्न हैं, सबकी रक्षा और पूजा-प्रतिष्ठा का प्रबंध किया जा सकता है.
काशी में अन्यत्र एक तुलसीदास जी का मंदिर भी है, जिसके विषय में कहा जाता है कि वह काशी-नरेश की सहायता से बना है. उसमें गोस्वामी जी की एक शुभ्र प्रस्तरमूर्ति स्थापित है, जो उनके असली चित्र के आधार पर तैयार की गई है. सुनते हैं, उसी असली चित्र को काशी-नागरी-प्रचारिणी सभा ने प्रकाशित किया है. लेकिन हमने आज तक उस मंदिर को तीर्थ का रूप नहीं दिया. राजापुर की तीर्थयात्रा के लिए हम कभी उत्साहित नहीं हुए.
…फिर हम तुलसी-तिथि क्यों मनाते हैं?
शेक्सपियर की जन्मभूमि को अंग्रेजी ने स्वर्ग बना डाला है और हमारी भाषा के शेक्सपियर की जो दशा है, वह सामने है.
तुलसीदास के ग्रंथों से कितने ही लोग लखपती हो गए, बहुतों ने करोड़ों रुपये कमाकर घर में डाल दिए, और न जाने कब तक यह क्रम जारी रहेगा. किंतु ऐसे लोगों में कोई ऐसा माई का लाल आज तक आगे आता नहीं दिखाई दिया जो तुलसीदास के नाम पर एक परसेंट रॉयल्टी की रक़म भी ख़ुशी से निकालकर देता. सच तो यह है कि हममें अभी अपनी भाषा के रत्नों की परख करने की योग्यता ही नहीं है, हम सिर्फ लक़ीर पीटने में ही बहादुर हैं. किंतु सिर्फ़ पुरानी लक़ीर पीटकर तुलसीदास जैसे महाकवि को श्रद्धांजलि देने से कोई लाभ नहीं.’

मुंशीजी के कथन की आख़िरी कुछ पंक्तियों पर ध्यान दें. ‘रॉयल्टी की एक परसेंट रक़म’ की उम्मीद वह किससे कर रहे हैं? किस व्यक्ति से? किस संस्था से? यह लेख 1933 में लिखा गया है. उस समय जो प्रकाशन-गृह तुलसी-साहित्य के विक्रय से लाभ अर्जित कर रहे होंगे, उनमें से दो प्रमुख संस्थाओं का नाम तत्काल ज़ेहन में आता है—पहली ‘नागरीप्रचारिणी सभा’ और दूसरी ‘गीता प्रेस’. हालांकि वेंकटेश्वर प्रेस से काशिराज के प्रकाशन तक सब लोग रामचरितमानस के विक्रय से लाभान्वित हुए, लेकिन उपन्यास-सम्राट का संकेत किस ओर है, समझना कठिन नहीं है.
प्रेमचंद कहते थे कि साहित्य ‘जीवन की आलोचना’ है. सच में, उत्तर भारतीय जीवन के वह अनन्य आलोचक थे.
(व्योमेश शुक्ल इन दिनों नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री हैं. प्रेमचंद पर उनका हालिया लेख यहां पढ़ें.)
